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समाज में महिलाओं के प्रति कब बदलेगी सोच? कैसे दूर होगा मानसिक संक्रमण और कब थमेगी यौन हिंसा

Dr.Chitralekha Anshu डॉ.चित्रलेखा अंशु
Updated Mon, 07 Dec 2020 10:37 AM IST
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Society should change their attitude and behavior to women to save new generation from mental transition
क्या यह उत्तर आधुनिकता और सम्पन्नता ही इन अवयस्क किशोरों को स्वच्छंद और यौन रूप से कुंठित बना रही है - फोटो : Pexels

सात या आठ वर्ष पहले की बात है। किसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अमेरिका-इराक के बीच हुए युद्ध से संबंधित एक हॉलीवुड की सिनेमा दिखाई गई थी, नाम था- टर्टल कैन फ्लाई। एक 14 साल की लड़की एक साल के बच्चे को जान से मारने की खातिर ऊंचे पहाड़ी पर ले जाती है, ताकी उसे धक्का दे सके। लेकिन पीछे से लड़की का भाई आ जाता है। एक बार फिर वह कोशिश करती है और बच्चे के पैर से पत्थर बांधकर उसे तालाब में फेक देती है। उस समय भी कोई उसे बचा लेता है। हालांकि फिल्म के क्लाइमेक्स में वह बच्चे को मार ही डालती है। 

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अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी होगी तो सोच रहे होंगे कि आखिर क्यों वह लड़की छोटे बच्चे को मारना चाहती थी। दोनों के बीच क्या रिश्ता था? क्या वे भाई-बहन थे, अड़ोसी-पड़ोसी थे या कोई रिश्तेदार? इस सवाल का जवाब मिलता है, इंटरवल यानी मध्यांतर के बाद। दरअसल, एक साल का वह बच्चा उस 14 साल की किशोरी का बेटा होता है। वह उसे इसलिए मारना चाहती थी क्योंकि वह बच्चा अमेरिकी सैनिकों द्वारा उस इराकी बच्ची के बलात्कार की त्रासदी से पैदा हुआ था। 
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यह वही त्रासदीपूर्ण बलात्कार होता है, जिसमें स्त्री चाहे किसी भी आयु, वर्ग, धर्म, नस्ल या जाति की हो वह एक योनि से अधिक कुछ भी नहीं मानी जाती है। और यह वही रेप कल्चर है जो एक इंसान को वहशी बनाकर स्त्रियों पर यौन हिंसा करने की छूट देता है। आज ‘रेप कल्चर’ नामक शब्द कई कारणों से चर्चित हो रहा है, जिसका इस्तेमाल हर उस संस्था द्वारा होता है जहां स्त्री को हीन और पराधीन समझने की मानसिकता फलती-फूलती है। चाहे वह स्कूल-कॉलेज, सेना, मीडिया, कार्पोरेट जगत, साहित्य या फिर सिनेमा हो।
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फिमेल बॉडी शेमिंग की परंपरा बहुत नई नहीं है। अबतक यह कुंठित किंतु संभ्रांत से दिखने वाले लोगों के भीतर ही भीतर कुलांचे मार रहा था। भले ही कानून की धाराओं और सजा के मद्देनजर लोग इसे अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे थे, लेकिन यह गुप्त तरीके से लोगों के विभिन्न वर्चुअल या रियल इमेजिनेशन का हिस्सा होता था। अबतक यह किसी व्यक्तिगत पुरुष-महिला समूह, पार्टी या गुप्त स्थानों तक सीमित था। लेकिन इंटरनेट, जो आज हमारे घर के हर कोने में मौजूद है, वहां सोशल नेटवर्किंग के विभिन्न माध्यमों ने एक हिडेन स्पेस यानी छिपा हुआ स्थान उपलब्ध कराया है।

'ब्वायज लॉकर रूम' भी इसी तरह का एक हिडेन स्पेस है। यूं तो लॉकर रूम में लोग अपनी व्यक्तिगत और कीमती चीजें रखते हैं, लेकिन इंटरनेट के वर्चुअल हिडेन स्पेस का किशोर और युवा पीढ़ी गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। नई पीढ़ी जिन बातों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त नहीं कर सकती, उस प्लेजर(सुख) को भोगने के लिए लॉकर रूम जैसी जगहों पर अपनी गुप्त बातें करते हैं। 

इसका कारण यह है कि स्त्री संबंधित हिंसा कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है। उन्हें इस बात का भी डर है कि जो बातें वे लॉकर रूम में करते हैं, वह सामाजिक रूप से स्वीकृत नहीं है, बल्कि जघन्य अपराध है। इंस्टाग्राम पर दिल्ली के एक बड़े स्कूल के 16-17 वर्ष के छात्रों द्वारा बनाया गया यह लॉकर रूम कोई बहुत नई और चमत्कारी तथ्य के रूप में हमारे समक्ष प्रकट नहीं हुआ है।

बल्कि  व्हाट्सएप, टिंडर और तमाम हैंगआउट ग्रुप में पुरुष अपने प्लेजर के लिए फीमेल बॉडी शेमिंग से संबंधित अश्लील बातें सालों से करते रहे हैं। नॉन वेज जोक्स, एडल्ट सेक्शुअल बातें, स्त्री शरीर पर की गई टिप्पणियां उनके कंटेंट का हिस्सा रही हैं। ऐसे सोशल ग्रुप में लोग स्त्री देह पर गुप्त तरीके से हंसते हैं, लेकिन सामूहिक दुष्कर्म जैसी योजना नहीं बनाते हैं। इन ग्रुप्स को सभी व्यस्क, अधेड़ या वृद्ध लोग अपने प्लेजर के लिए इस्तेमाल करते हैं। 

ब्यायज लॉकर रूम इससे आगे की एक उत्तर-आधुनिक घटना है। यहां नई पीढ़ी के, छोटी उम्र के अवयस्क लड़के, छोटी-बड़ी उम्र की लड़कियों के सामूहिक बलात्कार की योजना बनाते हैं। यह सबसे अधिक त्रासदी से भरा और दुखद है। अपराध को हमेशा अभावहीनता से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यहां तो सारे बच्चे पढ़े-लिखे संपन्न घरों के हैं। निर्भया केस और अपराधियों को मिली फांसी ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया था कि आर्थिक विपन्नता और अभाव ही अपराधियों को बलात्कार करने के लिए प्रेरित करते हैं। हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार में भी ट्रक चालक और लेबर क्लास के लोगों की भूमिका थी। 

अगर यह सच है तो फिर इतने संपन्न घरों के बच्चे यौन कुंठा से संबंधित अपराध क्यों करते हैं! क्या यह उत्तर-आधुनिकता और सम्पन्नता ही इन अवयस्क किशोरों को स्वच्छंद और यौन रूप से कुंठित बना रही है जो स्त्रियों को चलती-फिरती वेजाइना के रूप में देखते हैं। और उनका बलात्कार करने की वर्चुअल योजना बनाते हैं।

तो फिर समस्या की जड़ क्या है?

Society should change their attitude and behavior to women to save new generation from mental transition
बचपन से ही एक स्त्री और एक पुरुष बच्चे के बीच में तमाम तरह के भेदभाव किए जाते हैं - फोटो : Pexels

किशोरों विशेष रूप से पुरुषों की मानसिक बुनावट ऐसी की जाती है कि वे स्त्रियों के प्रति अपनी सोच को बड़े होकर उसी कंडिशनिंग के तहत अभिव्यक्त करते हैं। मसलन बचपन से ही एक स्त्री और एक पुरुष बच्चे के बीच में तमाम तरह के भेदभाव किए जाते हैं। अभावग्रस्त घरों में जहां यह खानपान, पोशाक, आचरण आदि से जुड़ा है, वहीं संपन्न घरों में यह चकाचौंध भरी भीड़ में फीमेल ऑब्जेक्टिफिकेशन का शिकार है।

बच्चे जो देखते हैं वही सीखते हैं। मेरी एक विवाहित छात्रा बताती है कि उसकी सहेली का आठ वर्ष का बच्चा अपनी मां को सड़क पर खड़ा देखकर कहता है कि 

'मां तुम भीतर जाओ। औरतों को बाहर खड़ा नहीं होना चाहिए '

इस तरह पुरुष बचपन से ही स्त्री को एक कमोडिटी के रूप में देखते रहते हैं। और यह सोचते हैं कि सार्वजनिक स्थान स्त्रियों का नहीं बल्कि पुरुषों का होता है। ये बच्चे मर्द और औरत के बीच श्रम, अर्थ और सामाजिक व्यवहार को लेकर व्याप्त अंतर को अपने-अपने घरों में देखते हैं।

आज भी चाहे वह संपन्न घर हो या अभावग्रस्त, स्त्रियों को रसोई और घर की देखरेख से जोड़कर ही देखा जाता है। या फिर पति-पत्नी के बीच जटिल और हिंसक संबंध, जिसमें घरेलू हिंसा, माता या पिता का बाहर अवैध संबंध, जो लगभग छिपे और दृष्य रूप में लगभग हर जगह मौजूद होता है। यदि ऐसा न हो तो वयस्क पुरुषों द्वारा अपने घर के आसपास की स्त्रियों के प्रति आकर्षण को छोटे बच्चे या किशोर बच्चे ऑब्जर्व कर रहे होते हैं। 

इस आग में घी का काम मनोरंजन के नाम पर परोसे जाने वाले आपत्तिजनक कंटेंट ने किया है। टेलीविजन पर चल रहे 'भाबीजी...' जैसे डेलीसोप को ही देखिए, जिनमें पड़ोसन स्त्रियों के प्रति आकर्षण को लीगलाइज करने की कोशिश की गई है। इतना ही नहीं बेहद संपन्न घरों में तो स्त्रियों की बॉडी शेमिंग और उत्पीड़िन जबरदस्त तरीके से की जाती है, जिसमें स्त्रियों को एक दूसरे से शेयर करने जैसी घटना भी देखी या सुनी जाती है। हाई सोसाइटी में इसे वाइफ स्वैपिंग कहा जाता है, यानी पत्नियों की अदला-बदली। 

समाज में चल रहीं ऐसी तमाम बातें एक 'बाल मन' ऑब्जर्व कर रहा होता है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष बालक। यदि वह लड़की है तो वो जो देख और महसूस कर रही होती है, उसे सच समझने लगती है। यानी स्त्री शरीर को एक स्त्री भी ऑब्जेक्ट के रूप में देखने लगती है। जैसे अपनी साज-सज्जा को खुद की अभिव्यक्ति के इतर पुरुषों के पसंद-नापसंद के अनुसार करना।

सेक्स एजुकेशन कितना जरूरी?

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किशोरों को पता होना चाहिए कि यौन अभिव्यक्ति का सही समय और उम्र क्या है - फोटो : Pexels

इस मुद्दे पर बहुत सारी बहसें हो चुकी हैं कि किशोरों को सेक्स एजुकेशन दिया जाना चाहिए। यह बहुत ही आवश्यक और गंभीर मसला है, भविष्य की पीढ़ी को जागरूक करने के लिए। उन्हें पता होना चाहिए कि यौन अभिव्यक्ति का सही समय और उम्र क्या है। इसके साथ ही विपरीत लिंग की सहमति लेना भी कितना जरूरी है।

इस बात की पुष्टि 'समरहिल' नामक स्कूल के माध्यम से हो सकती है। इस तरह के स्कूलों में बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने के साथ ही एक दूसरे शरीर का सम्मान करना भी सिखाया जाता है। वहां काफी हद तक शरीर को खुला छोड़ दिया जाता है ताकि शरीर को कामुक नहीं बल्कि एक अदद व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जाए।

यह बहुत गूढ़ बात है कि जिस शरीर को जितना छिपाने की बात की जाती है, उसके प्रति आकर्षण उतना ही बढ़ता है। आशय यह है कि जब लड़कियां बड़ी हो रही होती हैं तो उनके शारीरिक उभारों को छुपाने की सलाह उन्हें परिवार में दी जाती है। उन्हें घरों में अपने अंडरगारमेंट्स को छिपाकर रखने और टीशर्ट, टॉप, चुन्नी जैसे दूसरे कपड़ों के अंदर धूप में डालने का आदेश दिया जाता है।

स्त्री उभार कुछ मांसपेशियों और रक्त से बनी एक ग्रंथि है। स्त्री उभारों को शरीर का एक हिस्सा मानने की जगह उसे इस तरह छिपाने की ये गतिविधियां उस शरीर के हिस्से को एक कामुक अंग के रूप में दरसाते हैं। पीरियड्स के दौरान भी कई स्थानों पर स्त्रियों को एकदम अलग-थलग कर देना तथा उन्हें बहुत सारी गतिविधियां करने से रोकना, उनके प्रति असंवेदनशीलता का परिचयक है। रही-सही कसर विज्ञापन, अश्लील साहित्य और मीडिया पूरी कर देते हैं।

किसी विशेष परफ्यूम, बनियान और अंडरवियर पहनने से स्त्री आपकी हो जाएगी

विज्ञापनों का यह कैसा संदेश है? विज्ञापनों में स्त्रियों के चरित्र को जिस तरह गिराया जाता है, वह उनके प्रति एक तरह की हिंसा से कम नहीं है।

इंटरनेट पर फैली आपत्तिजनक सामग्रियों को इसलिए अलग कर रही हूं, क्योंकि इसका प्रसार और इसकी उपलब्धता का कोई अंत नहीं है। पोर्न की बिक्री पर सरकारी प्रॉक्सी के बावजूद किशोरों को इसका काट मालूम है। पोर्न ऐसी जादुई चीज नहीं, जिसे देखकर लोग बहक जाएं क्योंकि यह आत्मनियंत्रण का मामला भी है। ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि पोर्न स्त्री-पुरुष दोनों देखते हैं।

हालांकि स्त्रियों का समाजीकरण ऐसा होता है कि वे इससे व्याकुल होकर किसी का बलात्कार करने के विषय में नहीं सोचतीं। जबकि पुरुषों को बचपन से मर्द बनाया जाता है। मर्द- जो कठोर है, हिंसक है तथा लोगों पर आधिपत्य जमा सकता है। जिसमें दर्द और संवेदना नहीं होती क्योंकि कोमलता और संवेदना तो कथित तौर पर स्त्रियों के गुण माने जाते रहे हैं। पुरुषों की जगह स्त्रियों को सीमाओं में बांधना बहुत हद तक इस समस्या की जड़ में है। 

परिवार का विघटन और नैतिक शिक्षा

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किशोर छात्र ऐसे शिक्षक को पसंद करते हैं जो इनसे दोस्ताना बरतावकरे - फोटो : Pexels

कई लोग आदर्श परिवार के विघटन और एकल परिवार की शुरुआत को किशोरों की मानसिक विकृति का कारण मानते हैं। ये एक हद तक सच हो भी सकता है लेकिन उन्हीं आदर्श परिवार में बाल यौन शोषण और व्यभिचार की समस्या कहीं-कहीं देखी गई है जो इसे आदर्श नहीं बनाती। रही बात नैतिक मूल्य और नैतिक शिक्षा की तो एक उम्र के बाद बचपन में पढ़ी गई बाल कहानियों का प्रभाव कम होने लगता है। या फिर किशोरों में पैदा हो रही यौन कुंठा उन मूल्यजनित शिक्षा को दबा देता है। 

आजकल के एंड्रायड मोबाइल को किशोर लॉक रखते हैं और यहीं से लॉकर रूम का बीजारोपण शुरू होता है। मां-बाप बालपन में तो बच्चों पर ध्यान देते हैं और भले ही व्यक्तिगत स्तर पर कैसे भी हों किंतु बच्चों को नैतिक शिक्षा जरूर देते हैं। जब यही बच्चे किशोर होते हैं तो उनका बाहरी संपर्क और इंटरनेट के मायाजाल से राब्ता होता है। इस तरह माता-पिता के गिरफ्त से छूटकर वो इंटरनेट की दुनिया के वर्चुअल इंसान बन जाते हैं।

जो स्त्री सम्वेदना के मामले में शून्य हो जाता है। 'मॉर्फ्ड फोटो' इसी इमेजिनेशन की उपज है। जिसमें पसंदीदा स्त्री के चेहरे पर न्यूड शरीर चस्पा कर अपनी दबी कामनाओं की पूर्ति करने जैसी चीजें शामिल है। रेप कल्चर को एंजॉय करना उन्हें एक अलग तरह की मर्दवादी प्लेजर देता है। 

प्रश्न यह उठता है कि इसपर नियंत्रण कैसे रखें। चाइल्ड लॉक तथा नजर रखने के तमाम उपक्रम बचपन तक ही सीमित होते हैं। ऐसी स्थिति में किशोरों पर नजर रखना बहुत मुश्किल है। इस अवस्था में पोर्न या यौन कुंठा से उनका ध्यान हटाने के लिए समाजीकरण की रणनीति को थोड़ा मोडिफाई करना होगा। किशोरों के स्वास्थ्य, साहित्य, सकारात्मक सिनेमा, समाज कार्य ही नहीं बल्कि गृह कार्य जैसे चीजों से जोड़ना होगा।  उन्हें उन प्रत्येक कार्य को सिखाना होगा जो उन्हें एक बलात्कारी मानसिकता से निकालकर एक संवेदनशील मानव बनाए। 

इस बात की व्यवहारिक पड़ताल के लिए खेल गांव पब्लिक स्कूल, इलाहाबाद के स्पोर्ट शिक्षक आलोक उपाध्याय से बातचीत की गई जो 11वीं तथा 12वीं के बड़े छात्रों को स्पोर्ट की ट्रैनिंग देते हैं।  किशोर बच्चों को कैसे नियंत्री किया जाए। उनका कहना है कि ये किशोर छात्र ऐसे शिक्षक को पसंद करते हैं जो इनसे दोस्ताना बरताव करे और हंसी-खुशी के वातावरण में इन्हें कुछ सिखाए। यदि कोई  शिक्षक इन्हें मारने-पीटने जैसा कृत्य करता है तो इनके मर्दवादी स्वाभिमान को ठेस पहुंचती है तथा ये स्कूल के बाहर उनसे निपटते की ठान लेते हैं। 

बच्चों का प्राथमिक शिक्षालय उनका घर होता है जहां से उन्हें सही-गलत एवं मर्द-औरत की ट्रेनिंग मिलती है। द्वितीयक शिक्षालय स्कूल होता है। आजकल पब्लिक स्कूल में शिक्षकों का छात्रों के ऊपर जोर-जबरदस्ती एवं मार-पीट पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया है। कई बार यह देखने को मिलता है कि स्कूल में किशोरों द्वारा की गई गलतियों को बाहर न फैल जाने की नीयत से स्कूल में ही दबा दिया जाता है ताकि स्कूल की प्रतिष्ठा न बाधित हो। 

सुझाव जो अमल में लाए जा सकते हैं
माता पिता को बच्चों का दोस्त बनना होगा। बच्चों के लिए समय निकालकर उनसे दोस्ताना रवैया अपनाना चाहिए तथा सही और गलत का फर्क बताना चाहिए। इसके साथ लड़कों को संवेदनशील बनाने के लिए मर्द औरत के काम के भेद को खत्म कर उन्हें घरेलू काम जो उन्हें एक अच्छा इंसान बना सके, सिखाना होगा। चूंकि ये रास्ता बहुत दुरूह और दुष्कर है, अतः किशोरजनित अपराध का डिफेंस भी तैयार करना होगा। अपनी बेटियों को सशक्त बनाना होगा। 

बाल यौन शोषण से बचाव की ट्रेनिंग और उनकी आवाज को बुलंद करने की दिशा में पहल करना होगा। सेक्स एजुकेशन को कंपल्सरी करना होगा। अच्छा तो यह हो कि माता-पिता बच्चों से सीधे या फिर घुमा-फिरा कर सलाह दें। पति-पत्नी के बीच के हिंसात्मक तथा तनावपूर्ण संबंधों पर काम करने की जरूरत है। सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण बात जो कभी अब्दुल कलाम ने कही थी कि

'children don't learn the lesson which we teach them they only learn from our behaviour and attitude'.

इसलिए समाज को महिलाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण और व्यवहार बदलने की जरूरत है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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