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दिल्ली के रंग पटल पर उतरा सिक्किम का रंगमंच

Sun, 05 May 2019 12:10 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Sun, 05 May 2019 12:10 PM IST
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Sikkim culture and its plays in Delhi is an experience
सिक्किम की संस्कृति की बेहतरीन प्रस्तुतियां - फोटो : अमर उजाला

सिक्किम की संस्कृति और वहां के नाटकों को दिल्ली में देखना एक अनुभव है। 30 अप्रैल से हो रहे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वसंत रंगोत्सव के दौरान ऐसी ही कुछ बेहतरीन प्रस्तुतियां रंगमंच प्रेमियों को पसंद आ रही हैं। दिल्ली के श्रीराम सेंटर में हो रहे ये नाटक एनएसडी के सिक्किम इकाई के रंगमंच प्रशिक्षण केन्द्र ने तैयार किए हैं। एनएसडी रंगमंडल की सिक्किम इकाई हर साल वसंत रंगोत्सव करती है। 2016 में इसकी शुरूआत हुई लेकिन यह चौथा उत्सव पहली बार सिक्किम से बाहर निकल कर दिल्ली के दर्शकों और रंग समीक्षकों के बीच किया जा रहा है।

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एनएसडी के प्रभारी निदेशक सुरेश शर्मा के मुताबिक दिल्ली के अलावा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बेंगलुरु, त्रिपुरा, सिक्किम और वाराणसी में जो चार नाट्य प्रशिक्षण केन्द्र हैं, वहां होने वाली गतिविधियों के बारे में आम तौर पर लोगों को पता नहीं चल पाता। इसी मकसद से अब इन्हें भी मुख्य धारा में जोड़ने की ये कोशिश है और इसी कड़ी में यह पहली कोशिश सिक्किम के कलाकारों की प्रस्तुतियों से की जा रही है। इससे एनएसडी की क्षेत्रीय स्तर पर की जा रही कोशिशों को एक नया आयाम और मुख्य धारा के दर्शक मिल सकेंगे। दिल्ली से बाहर सिक्किम ही वह केन्द्र है जहां रंगमंडल मौजूद है और जहां के कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से कम से कम गंगटोक और सिक्किम के दूसरे इलाकों के कलाप्रेमियों के बीच अपनी पहचान बना चुके हैं। यहां एक साल का गहन नाट्य प्रशिक्षण देकर कलाकारों की प्रतिभा को निखारा जाता है।

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Sikkim culture and its plays in Delhi is an experience
‘अब और नाहीं’ का निर्देशन विपिन कुमार ने किया

नेपाल की सीमा से जुड़े होने की वजह से सिक्किम के कई इलाकों में नेपाल का असर है और भाषा भी नेपाली बोली जाती है। वसंत रंग उत्सव के पहले दिन विपिन कुमार के निर्देशन में नेपाली भाषा में खेला गया नाटक ‘हमी नई आफई आफ’ भाषा की दीवार को तोड़ता है और कलाकारों की अभिनय क्षमता और दृश्य संयोजन इसे एक अलग श्रेणी में ला खड़ा करता हैं।

विपिन कुमार एनएसडी के ही पूर्व स्नातक हैं और उनकी शैली उन्हें समसामयिक निर्देशकों में एक अलग जगह देती है। विपिन कुमार के ही निर्देशन में एक और नाटक ‘अब और नाहीं’ भी इस समारोह में खेला जा रहा है। इनके अलावा अभिलाष पिल्लै के निर्देशन में ‘कालो सुनाखरी’, नौशाद मोहम्मद कुंज निर्देशित ‘साहसी आमाला’, संदीप भट्टाचार्य के निर्देशन में‘सुन्तलाको बमान’ औऱ हेश्मान तोम्बा निर्देशित ‘तिर्खा’ जैसे नाटक इस समारोह के दौरान नाट्यप्रेमियों के लिए ताज़ा हवा के झोंके की तरह हैं।

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किसी भी परफॉर्मिंग आर्ट को भाषा के बंधन में नहीं बांधना चाहिए

एनएसडी के पूर्व निदेशक वामन केन्द्रे ने करीब एक साल पहले अमर उजाला के साथ एक इंटरव्यू में कहा था कि किसी भी परफॉर्मिंग आर्ट को भाषा के बंधन में नहीं बांधना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा था कि क्षेत्रीय भाषाओं में जितना बेहतर काम हो रहा है, उसे हिन्दी भाषी इलाकों तक भी पहुंचना चाहिए। नए नाटक भी लिखे जा रहे हैं और प्रस्तुति में नए नए प्रयोग भी हो रहे हैं। हां, अब पहले की तरह विजय तेंदुलकर या गिरीश कर्नाड जैसे जाने माने नाटककारों की तरह नए नाटकों को और भाषाओं में खेले जाने की ललक कम हो गई है। साथ ही अब इन नाटकों का दूसरी भाषाओं में अनुवाद नहीं होता।

थिएटर ओलंपियाड के दौरान वामन केन्द्रे की और भारत रंग महोत्सव के दौरान एनएसडी के हर निदेशकों की ओर से इस दिशा में की गई कोशिशें काबिलेतारीफ हैं। जाहिर है मौजूदा निदेशक सुरेश शर्मा भी वसंत रंगोत्सव के ज़रिए ये एक अहम कोशिश कर रहे हैं। इन नाटकों की पृष्ठभूमि, उनका कथ्य, कलाकारों का अभिनय कौशल और निर्देशक की दृष्टि देखकर ये तो साफ है कि वाकई हिन्दी से इतर देश के तमाम इलाकों में बहुत कुछ हो रहा है, जिसे बेशक देश के दूसरे इलाकों और खासकर हिन्दी भाषी इलाकों को जानना समझना चाहिए।

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