{"_id":"5bfa5dc4bdec22414c64374c","slug":"shivraj-chouhan-impact-madhya-pradesh-assembly-elections-2018","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"मध्यप्रदेश: पहले हुए नजरअंदाज, फिर अपने दम पर भाजपा को मुकाबले में ले आए शिवराज","category":{"title":"Blog","title_hn":"ब्लॉग","slug":"blog"}}
मध्यप्रदेश: पहले हुए नजरअंदाज, फिर अपने दम पर भाजपा को मुकाबले में ले आए शिवराज
Updated Sun, 25 Nov 2018 02:01 PM IST
विज्ञापन
shivraj shingh
- फोटो : PTI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिस दिन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने एलान किया था कि इस बार का विधानसभा चुनाव पार्टी लड़ेगी और किसी चेहरे को नहीं पेश किया जाएगा तो पार्टी में संदेश यह गया कि आलाकमान इस बार शिवराज को भावी मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देख रहा है । इसका असर चुनाव अभियान पर भी पड़ा। शिवराज चौहान के प्रचार अभियान में शिथिलता आई और एक तरह से वे हाशिए पर चले गए। लेकिन मंच से शिवराज की अनुपस्थिति के बाद नाराज नेता कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, प्रभात झा, बाबूलाल गौर, प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह मिलकर भी प्रचार अभियान को गति नहीं दे पाए। इसके बाद पार्टी के हाथ पांव फूल गए और फिर शिवराज को प्रचार अभियान का मुख्य केंद्र बिंदु बनाया गया।
महीनों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के लिए तैयार विज्ञापन अखबारों और चैनलों को दिए गए। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। अब व्यवस्था विरोधी वोट और बागी उम्मीदवारों से निपटना शिवराज सिंह चौहान की बड़ी चुनौती बन गई है। हालांकि दोबारा सक्रिय होने के बाद शिवराज सिंह पार्टी को वापस मुकाबले में ले आए हैं।
जिस तरह से केंद्रीय नेतृत्व ने अभी भी राष्ट्रीय मुद्दे और प्रचार के अनेक संवेदनशील मोर्चे अपने हाथ में ले रखे हैं, वे शिवराज सिंह के लिए राहत का सबब बन गए हैं। अगर पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ता है तो आलाकमान भी उसके लिए उतना ही जिम्मेदार होगा जितना प्रदेश सरकार का कामकाज। इसमें कोई संदेह नहीं कि मध्यप्रदेश में तीन बार लगातार सरकार बनाकर बीजेपी ने एक अनूठा रिकॉर्ड बनाया है। मगर इसके लिए सरकार के प्रदर्शन से अधिक कांग्रेस का लचर अभियान रहा है। नेतृत्व थका हुआ था, संगठन बिखर गया था और कार्यकर्ता निराश था। लिहाजा पार्टी चुनाव दर चुनाव हारती गई।
विज्ञापन
राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को जिस तरह अगुआ बनाया गया उससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है। राजनीतिक पंडित कह रहे हैं कि पंद्रह साल में पहली बार कांग्रेस चुनाव मैदान में आर पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रही है।
विज्ञापन
महीनों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया के लिए तैयार विज्ञापन अखबारों और चैनलों को दिए गए। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। अब व्यवस्था विरोधी वोट और बागी उम्मीदवारों से निपटना शिवराज सिंह चौहान की बड़ी चुनौती बन गई है। हालांकि दोबारा सक्रिय होने के बाद शिवराज सिंह पार्टी को वापस मुकाबले में ले आए हैं।
विज्ञापन
जिस तरह से केंद्रीय नेतृत्व ने अभी भी राष्ट्रीय मुद्दे और प्रचार के अनेक संवेदनशील मोर्चे अपने हाथ में ले रखे हैं, वे शिवराज सिंह के लिए राहत का सबब बन गए हैं। अगर पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ता है तो आलाकमान भी उसके लिए उतना ही जिम्मेदार होगा जितना प्रदेश सरकार का कामकाज। इसमें कोई संदेह नहीं कि मध्यप्रदेश में तीन बार लगातार सरकार बनाकर बीजेपी ने एक अनूठा रिकॉर्ड बनाया है। मगर इसके लिए सरकार के प्रदर्शन से अधिक कांग्रेस का लचर अभियान रहा है। नेतृत्व थका हुआ था, संगठन बिखर गया था और कार्यकर्ता निराश था। लिहाजा पार्टी चुनाव दर चुनाव हारती गई।
विज्ञापन
राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को जिस तरह अगुआ बनाया गया उससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा है। राजनीतिक पंडित कह रहे हैं कि पंद्रह साल में पहली बार कांग्रेस चुनाव मैदान में आर पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रही है।
मालवा-निमाड़ में भाजपा का प्रभाव
राज्य का मालवा-निमाड़ का इलाका भारतीय जनता पार्टी का ठोस किला माना जाता रहा है। अगर पार्टी इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर लेती है तो उसकी सरकार बननी तय हो जाती है। पिछले चुनाव में इस क्षेत्र ने पार्टी को बंपर सफलता दिलाई थी। तय है कि पिछली बार जितनी कामयाबी तो पार्टी को इस इलाके से नहीं मिलेगी। यानि भरपाई के लिए उसे अन्य क्षेत्रों की ओर ताकना पड़ेगा। इनमें सबसे अव्वल महाकौशल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंडला में आदिवासियों की सभा के साथ बहुत पहले अपने प्रचार अभियान का आगाज कर दिया था।
चुनाव से ठीक पहले प्रदेश अध्यक्ष को बदलकर पार्टी ने राकेश सिंह में अपना भरोसा जताया है। जाहिर है मालवा का झटका राकेश सिंह को महाकौशल से पूरा करना पड़ेगा। इसके आसार कम नजर आते हैं। वजह यह कि राकेश सिंह की अपनी स्वीकार्यता उनके अपने क्षेत्र में ही नहीं है। दूसरा कारण यह कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ भी इसी इलाके से आते हैं। दोनों के कद की तुलना करें तो राकेश पिछड़ते हुए नजर आते हैं। अलबत्ता बीजेपी के लिए मध्यभारत और चंबल का इलाका संबल बन सकता है। यहां सिंधिया परिवार का असर है। यह चुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया की भी परीक्षा है। बीजेपी के पक्ष में राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जमीन और उनकी बेटी याने यशोधराराजे का प्रभाव फायदेमंद हो सकता है। वे शिवराज कैबिनेट में मंत्री भी हैं। लेकिन शिवराज ने जिस तरह से अपनी सभाओं में सिंधिया खानदान को अंग्रेजों का हिमायती बताया है उससे पार्टी का अधिक भला नहीं हुआ है। इसके बावजूद बीजेपी को इसी इलाके का ही सहारा है।
बाकी दोनों इलाके बुंदेलखंड और बघेलखंड में दोनों दलों के बीच कांटे की टक्कर है। उत्तर प्रदेश से सटा क्षेत्र होने के कारण यहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का अपना भी जनाधार है। ये दोनों पार्टियां यहां से सीटें पाती रही हैं। दरअसल रीवा से तो बीएसपी को पहला संसद सदस्य मिला था। इस बार कांग्रेस से दोनों दलों का कोई गठबंधन नहीं हुआ है। बुंदेलखंड से दिग्गज कांग्रेसी सत्यव्रत चतुर्वेदी इस चुनाव में पार्टी से आगबबूला हैं। वे अपने बेटे के लिए समाजवादी पार्टी से टिकट ले आए हैं और कांग्रेस के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं।
जाहिर है इन स्थितियों का लाभ बीजेपी को ही मिलने वाला है। हालांकि बीजेपी के दिग्गज और कई बार सांसद रहे रामकृष्ण कुसुमारिया इस बार पार्टी से बगावत कर बैठे हैं। यानि मुकाबला कांटे का है। मध्यप्रदेश में अब प्रचार समाप्त होने में कम समय बचा है। जो भी दल अपने बागी उम्मीदवारों को मना लेगा और अपने समर्पित मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ले आएगा, बाजी उसके हाथ लगेगी।
चुनाव से ठीक पहले प्रदेश अध्यक्ष को बदलकर पार्टी ने राकेश सिंह में अपना भरोसा जताया है। जाहिर है मालवा का झटका राकेश सिंह को महाकौशल से पूरा करना पड़ेगा। इसके आसार कम नजर आते हैं। वजह यह कि राकेश सिंह की अपनी स्वीकार्यता उनके अपने क्षेत्र में ही नहीं है। दूसरा कारण यह कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ भी इसी इलाके से आते हैं। दोनों के कद की तुलना करें तो राकेश पिछड़ते हुए नजर आते हैं। अलबत्ता बीजेपी के लिए मध्यभारत और चंबल का इलाका संबल बन सकता है। यहां सिंधिया परिवार का असर है। यह चुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया की भी परीक्षा है। बीजेपी के पक्ष में राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जमीन और उनकी बेटी याने यशोधराराजे का प्रभाव फायदेमंद हो सकता है। वे शिवराज कैबिनेट में मंत्री भी हैं। लेकिन शिवराज ने जिस तरह से अपनी सभाओं में सिंधिया खानदान को अंग्रेजों का हिमायती बताया है उससे पार्टी का अधिक भला नहीं हुआ है। इसके बावजूद बीजेपी को इसी इलाके का ही सहारा है।
बाकी दोनों इलाके बुंदेलखंड और बघेलखंड में दोनों दलों के बीच कांटे की टक्कर है। उत्तर प्रदेश से सटा क्षेत्र होने के कारण यहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का अपना भी जनाधार है। ये दोनों पार्टियां यहां से सीटें पाती रही हैं। दरअसल रीवा से तो बीएसपी को पहला संसद सदस्य मिला था। इस बार कांग्रेस से दोनों दलों का कोई गठबंधन नहीं हुआ है। बुंदेलखंड से दिग्गज कांग्रेसी सत्यव्रत चतुर्वेदी इस चुनाव में पार्टी से आगबबूला हैं। वे अपने बेटे के लिए समाजवादी पार्टी से टिकट ले आए हैं और कांग्रेस के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं।
जाहिर है इन स्थितियों का लाभ बीजेपी को ही मिलने वाला है। हालांकि बीजेपी के दिग्गज और कई बार सांसद रहे रामकृष्ण कुसुमारिया इस बार पार्टी से बगावत कर बैठे हैं। यानि मुकाबला कांटे का है। मध्यप्रदेश में अब प्रचार समाप्त होने में कम समय बचा है। जो भी दल अपने बागी उम्मीदवारों को मना लेगा और अपने समर्पित मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ले आएगा, बाजी उसके हाथ लगेगी।