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आंदोलन, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य पर कुछ गंभीर प्रश्न

सार

यह आंदोलन मूलतः नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक के विरोध से शुरू हुआ था। बाद में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा सोशल मीडिया पर चलाए गए अभियान और 20 जुलाई के 'संसद मार्च' के आह्वान के साथ इसका स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दिया।

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serious questions on exam system and youth future cjp protest neet paper leak
आंदोलन, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य पर कुछ गंभीर प्रश्न - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आंदोलन लोकतंत्र का एक वैध अधिकार है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका शांतिपूर्ण और अनुशासित स्वरूप होता है। जब किसी आंदोलन में हिंसा, पथराव और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं होने लगती हैं, तो उसका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। जंतर-मंतर पर हुई पत्थरबाज़ी में कई पुलिसकर्मी घायल हुए और सरकारी वाहनों को क्षति पहुंची। ऐसे घटनाक्रम उन वास्तविक और मासूम आवाजों को भी दबा देते हैं, जो अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से संघर्ष कर रही होती हैं।

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यह आंदोलन मूलतः नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक के विरोध से शुरू हुआ था। बाद में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा सोशल मीडिया पर चलाए गए अभियान और 20 जुलाई के 'संसद मार्च' के आह्वान के साथ इसका स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दिया। आंदोलन के दौरान गांधी, अंबेडकर, जय भीम, आजादी जैसे नारों के साथ-साथ "RSS मुर्दाबाद" जैसे राजनीतिक और वैचारिक नारे भी सुनाई दिए। इससे यह धारणा बनी कि परीक्षा की शुचिता का मूल मुद्दा धीरे-धीरे पीछे छूटता गया और आंदोलन का केंद्र व्यापक राजनीतिक विमर्श की ओर मुड़ गया।
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परीक्षा प्रश्नपत्र लीक के विरोध में खड़े लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के साथ पूरा देश खड़ा है। लेकिन किसी भी प्रकार की हिंसा, उपद्रव या राजनीतिक स्वार्थ का समर्थन नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक विरोध और अराजकता के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है। सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी यदि आंदोलन को नियंत्रित करने की सरकारी रणनीति थी, तो आंदोलन का नेतृत्व करने वालों की भी जिम्मेदारी थी कि वे यह सुनिश्चित करते कि इसमें ऐसे तत्व शामिल न हों, जो इसके मूल उद्देश्य को कमजोर करें।
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इसमें कोई दो राय नहीं कि नीट, यूजीसी-नेट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं पर शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही बनती है। केवल प्रेस के सामने घटनाओं को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं था, दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध और कठोर कार्रवाई होनी चाहिए थी। इस दृष्टि से यह शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन दोनों की गंभीर विफलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कार्यशैली और प्रशासनिक निर्णयों के लिए जाने जाते हैं। ऐसे संवेदनशील विषय पर समय रहते उच्चस्तरीय बैठक कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए था कि परीक्षाएं समय पर हों, परिणाम समय पर आएं तथा प्रश्नपत्र लीक जैसे मामलों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई हो। इस दिशा में अपेक्षित तत्परता दिखाई नहीं दी।
 

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आंदोलन, परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य पर कुछ गंभीर प्रश्न - फोटो : एएनआई

भारत में CBSE बोर्ड से लेकर JEE, NEET, CUET, UGC-NET, SSC, UPSC, रेलवे, बैंकिंग, राज्य लोक सेवा आयोग तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं सिर्फ परीक्षाएं नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों के भविष्य का आधार हैं। इनकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना पूरे शिक्षा तंत्र पर लोगों के विश्वास को कमजोर करता है। भारत में सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और पूरे परिवार के वर्षों के संघर्ष का प्रतिफल मानी जाती है। विशेषकर ग्रामीण, निम्न और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह जीवन बदल देने वाला अवसर होती है। किसी घर में सरकारी नौकरी का नियुक्ति-पत्र आने की खुशी कई बार करोड़ों रुपये मिलने की खुशी से भी अधिक होती है, क्योंकि उसके पीछे वर्षों की मेहनत, त्याग और उम्मीदें जुड़ी होती हैं।

इसी उम्मीद में अनेक अभिभावक अपनी सीमित आय के बावजूद बच्चों की पढ़ाई, कोचिंग, पुस्तकों, किराये और अन्य आवश्यकताओं पर अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करते हैं। वे विश्वास करते हैं कि बच्चे की सफलता पूरे परिवार की कठिनाइयों का अंत करेगी। ऐसे में प्रश्नपत्र लीक केवल एक परीक्षा को प्रभावित नहीं करता, बल्कि वर्षों की मेहनत, विश्वास और आर्थिक त्याग को भी तोड़ देता है। कई परिवार मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरे संकट में पहुँच जाते हैं, और कुछ युवाओं के लिए यह निराशा असहनीय रूप ले लेती है।

सरकार को इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन करना चाहिए। प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं से प्रभावित परिवारों की परिस्थितियों का आकलन कर आवश्यक आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही शिक्षा व्यवस्था का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथों में होना चाहिए जो केवल प्रशासनिक दक्षता ही नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और विद्यार्थियों की संवेदनाओं के साथ निर्णय लेने की क्षमता भी रखते हों। परीक्षाओं की शुचिता केवल विद्यार्थियों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का प्रश्न है। यदि मेहनत करने वाले युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठ गया, तो इसकी कीमत केवल एक सरकार नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ेगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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