फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Searching for hidden food do you know about Himalayan lemur life in winter

छुपे हुए भोजन की खोज: सर्दी में हिमालयी लंगूर का जीवन

virendra mathur वीरेन्द्र माथुर​
Updated Thu, 30 Jan 2025 10:56 AM IST
सार

सर्दी से बचने के लिए जानवर विभिन्न तकनीक अपनाते हैं। जापानी मकाक जैसे प्राइमेट्स सर्दियों में ऊंचाई वाले इलाकों से कुछ नीचे की ओर चले जाते हैं। चीन के स्नब-नोज्ड मंकी भी इसी तरह की व्यावहारिक तकनीक की मिसाल देते हैं।

विज्ञापन
Searching for hidden food do you know about Himalayan lemur life in winter
हिमालयी लंगूर - फोटो : वीरेन्द्र माथुर

विस्तार

देखते ही देखते जंगल की भूमि सूखी पत्तियों से ढक जाती है। नग्न वृक्षों पे भूरी होती काई और लाइकेन नजर आते है। समस्त भूदृश्य भूरा-भूरा नजर आता है और जमीन पर उगी घास भी सूख कर गायब होने लगती है।   

विज्ञापन


यह क्षेत्र हिमालयी लंगूर का प्राकृतिक आवास है, जहाँ वह अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करते है । हिमालयी लंगूर बंदरों (प्राइमेट्स) की प्रजातियों में समुद्र तल से सबसे ऊंचाई पर पायी जाने वाली प्रजातियों में से एक है। ये लंगूर मुख्यतः पेड़ों पर रहते हैं और अपने भोजन के लिए नई और कोमल पत्तियां, फल और फूल खाते हैं।
विज्ञापन


खासतौर पर खर्सू, मोरु, और पांगर के पेड़ उनके पसंदीदा भोजन स्रोत हैं। सर्दी के मौसम में वृक्षों पर उपयोगी भोजन नहीं रह जाता। जिन वृक्षों पर हरी पत्तियां रह भी जाती है, जैसे खर्सू और मोरु की कठोर पुरानी पत्तियां या रागा और अन्य पाइन प्रजाति के पेड़ों की नुकीली पत्तियां, वह खाने योग्य नहीं होती। हिमपात के दौरान तो पेड़ बर्फ से ढक जाते हैं और जमीन पर भी बर्फ की मोटी परत जम जाती है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


सर्दी से बचने के लिए जानवर विभिन्न तकनीक अपनाते हैं। जापानी मकाक जैसे प्राइमेट्स सर्दियों में ऊंचाई वाले इलाकों से कुछ नीचे की ओर चले जाते हैं। चीन के स्नब-नोज्ड मंकी भी इसी तरह की व्यावहारिक तकनीक की मिसाल देते हैं। हिमालयी लंगूर भी ऐसी ही तकनीक का उपयोग करते हैं। ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में भोजन के उनके स्रोत न रह जाने पे, सर्दियों में ये लंगूर ऊंचे इलाकों से कुछ निचले क्षेत्रों की ओर अस्थायी रूप से पलायन कर जाते हैं। 

थोड़े निचले इलाकों में जाने से उन्हें पेड़ों की कुछ नयी प्रजातियां, जो इस जंगल में पायी जाती है, उनसे भोजन प्राप्त करने का मौका मिलता है। इस ऊंचाई पे जंगल में कंडेई, बेलड़,और कौला जैसे पेड़ों के फल सर्दियों में पकते हैं।

कंडेई की नई और पुरानी पत्तियां भी लंगूरों को बेहद पसंद आती हैं। इसके अलावा, खर्सू और पांगर के विशाल पेड़, जो इस जंगल में भी पाए जाते हैं, उन्हें आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान प्रदान करते हैं। सर्दियों में यह इलाका उनके लिए भोजन का वैकल्पिक स्रोत बन जाता है। 

इस मौसम में हिमालयी लंगूरों का एक अनूठा व्यवहार देखने को मिलता है। चूंकि इस जंगल में भी खर्सू और पांगर जैसी विशाल फलदार प्रजाति के वृक्ष है, लंगूर ढूंढ़ ढूंढ़ के इनका फल खाते है। वे जंगल की भूमि पर आकर जमीन पर बिछी सूखी पत्तियों को हटाकर पेड़ों से गिरे फलों की खोज करते हैं। लंगूर अपने हाथों का उपयोग झाड़ू की तरह करते हुए सतह पर बिछी पत्तियों को हटाते हैं। उनकी तेज नजरें पत्तियों के नीचे छिपे फलों को खोज लेती हैं।

एक बार फल मिलने पर वे उसे अपनी नाक के पास लाकर सूंघते हैं और दांत गढ़ा के उसे परखते हैं। अगर फल खाने योग्य हो, तो वहीं बैठकर आगे वाले हाथ की हथेलियों से पकड़कर उसे खाने लगते है, अन्यथा छोड़कर दूसरा फल ढूंढ़ते हैं। यह कला युवा और कम उम्र वाले लंगूर, वयस्क लंगूरों को देखकर सीखते हैं।  

लंगूरों का समूह आमतौर पर उन स्थानों पर भोजन की तलाश करता हैं जहां आसपास पांगर या खर्सू के बड़े पेड़ हों। पांगर का फल उनका पसंदीदा होता है। यह फल अखरोट से बड़ा और अधिक कठोर होता है। पक जाने पर इसके खोल का रंग भूरा और चमकीला दिखता है। लंगूर अपने नुकीले दांतों से इसके बाहरी कठोर खोल को तोड़कर अंदर का सफेद गूदा खाते हैं। खर्सू के फलों को वे बाद में खाने के लिए बचा कर रखते हैं। 

हिमालयी लंगूरों का दैनिक जीवन कठिनाइयों से भरा होता है, लेकिन उनकी गतिविधियां बेहद रोचक होती हैं। एक समूह को भोजन के लिए एक बड़े इलाके में भ्रमण करना पड़ता है और अच्छी तादाद में मिलने वाले संसाधनों की खोज हमेशा जारी रहती है।

सहस्त्राब्दियों से हिमालय में रह रहे ये लंगूर इस कठोर भूगोल में खुद को ढालने में सफल रहे हैं। व्यावहारिक तकनीकों का इस्तेमाल कर उन्होंने इस क्षेत्र की प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लिया है। 

इस लेख में हिमालयी लंगूरों की एक ऐसी अनोखी व्यावहारिक तकनीक पर चर्चा की गई है जिसे पहले कभी इस तरह से अध्ययन में नहीं देखा गया। यह दर्शाता है कि इस प्रजाति पर शोध की अभी भी काफी गुंजाइश है।


हिमालयी लंगूरों के अनुकूलन और व्यावहारिक तकनीकों का अध्ययन हमें उनके जीवन और इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगा। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed