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स्वयं की तलाश: एक अंतहीन यात्रा, मनुष्य अपने लिए एक रहस्य है

Mon, 09 Mar 2026 07:33 AM IST
Nitin Gautam अल्बैर कामू
अल्बैर कामू Published by: Nitin Gautam Updated Mon, 09 Mar 2026 07:33 AM IST
सार

यदि मैं इस ‘स्व’ को, जिसके बारे में मैं आश्वस्त हूं, पकड़ने या परिभाषित करने कोशिश करता हूं, तो पाता हूं कि यह उंगलियों से फिसलती रेत के सिवा कुछ भी नहीं है।

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Search for the Self An Endless Journey Man is a Mystery to Himself
जीवन धारा ब्लॉग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मेरे भीतर धड़कता हुआ यह हृदय, जिसे मैं महसूस कर सकता हूं, मेरे अस्तित्व की सबसे पहली सच्चाई है। यह संसार, जिसे मैं छू सकता हूं और अनुभव कर सकता हूं, दूसरी सच्चाई है। इन दो निश्चितताओं के आगे पहुंचते ही मेरा सारा ज्ञान मानो रुक जाता है और बाकी सब कुछ कल्पना, व्याख्या या मन की रचना जैसा प्रतीत होने लगता है। जब मैं उस ‘स्व’ को पकड़ने की कोशिश करता हूं, जिसके होने का मुझे भरोसा है, तो वह मुट्ठी में थामे रेत की तरह फिसल जाता है। मैं उसके गुण गिना सकता हूं-जैसे परवरिश, संस्कार, उत्साह, मौन, महानता या दुर्बलता-पर इन्हें जोड़कर कोई अंतिम परिभाषा नहीं बना सकता। मेरा अपना हृदय मेरे लिए सदैव आंशिक रूप से अनजाना ही रहता है।
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इसी तरह, मनुष्य स्वयं अपने लिए एक रहस्य है। वह अपने ही भीतर एक अजनबी की तरह निवास करता है। हम अपने बारे में निश्चितता चाहते हैं-एक स्थिर पहचान, एक स्पष्ट परिभाषा-लेकिन जीवन हमें निरंतर बदलता रहता है। अनुभव हमें आकार देते हैं, पीड़ा हमें गहराई देती है; प्रेम हमें विस्तार देता है; असफलताएं हमें परखती हैं और आशा हमें आगे बढ़ाती है। ये सब मिलकर हमें गढ़ते हैं, पर हमें पूर्णतः स्पष्ट नहीं करते। यहीं से जीवन का असली प्रश्न जन्म लेता है कि क्या अर्थ की खोज अनिवार्य है, या अनुभव ही पर्याप्त हैं? ज्ञान की भी अपनी सीमाएं हैं। तर्क मार्ग दिखाता है, परंतु अंतिम सत्य तक नहीं पहुंचाता। मनोविज्ञान और दर्शन हमें अनेक दृष्टियां देते हैं, पर वे अंतिम निष्कर्ष नहीं देते। 'स्वयं को जानो' एक आकर्षक आह्वान है, पर यह एक अंतहीन यात्रा का निमंत्रण भी है।
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स्वयं को जानना किसी अंतिम मंजिल पर पहुंच जाना नहीं, बल्कि निरंतर जागरूक बने रहने की प्रक्रिया है। शायद मनुष्य की महानता इसी में है कि वह प्रश्न पूछता रहता है, भले ही उसे अंतिम उत्तर न मिले। जीवन का संघर्ष इसी विरोधाभास में है-अस्तित्व की निश्चितता और अर्थ की अनिश्चितता के बीच। पर यह स्थिति निराशा नहीं, जागृति का संकेत है। जब हम स्वीकार करते हैं कि सब कुछ स्पष्ट नहीं है, तब हम अधिक ईमानदारी से जीना शुरू करते हैं। तब हम बनावटी सांत्वनाओं से दूर होकर वास्तविक अनुभवों को अपनाते हैं। जीवन का अर्थ बाहर से थोपे गए सिद्धांतों में नहीं, बल्कि हमारे जीवित अनुभव में निहित है।
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मनुष्य की गरिमा इस स्वीकार में है कि वह अनिश्चितता के साथ भी जी सकता है। वह जानता है कि अंतिम समाधान नहीं है, फिर भी वह प्रेम करता है, सृजन करता है, संघर्ष करता है। यही अर्थहीनता के विरुद्ध उसका मौन विद्रोह है। यही अधूरे ज्ञान के साथ भी आगे बढ़ने का साहस है। अनिश्चित भविष्य के बावजूद, अधूरे ज्ञान के साथ पूरी तीव्रता के साथ जीना ही मनुष्य की वास्तविक जीत है। सिसिफस की तरह, अपने पत्थर को बार-बार ऊपर ले जाना व्यर्थता नहीं, बल्कि उस थकान और संघर्ष में अपने अस्तित्व को चुनना है।    


निरंतर सीखते रहें
जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि स्वयं को पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं, फिर भी निरंतर आत्मखोज में लगे रहते हैं, अनुभवों से सीखते हैं, अनिश्चितताओं को साहस से अपनाते हैं और अधूरे ज्ञान के साथ भी आगे बढ़ते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में जागरूक, विनम्र, दृढ़ और जीवन के प्रति ईमानदार बनते हैं।   

 -द मिथ ऑफ सिसिफस के अनूदित अंश
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