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Samvidhan Hatya Diwas: 'संविधान हत्या दिवस' में राजनीतिक प्राणतत्व कितना?

Tue, 16 Jul 2024 12:01 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Tue, 16 Jul 2024 12:01 PM IST
सार

वह अपने इस आरोप को बेखौफ दोहरा रही है कि संविधान के मामले में भाजपा का रवैया ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ वाला है। मौका देखकर वह वही करेगी, जिसकी आशंका लोगों के मन में है। आशय यह कि भाजपा देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। इसकी टेस्टिंग वह जब तब करती रहती है।

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Samvidhan Hatya Diwas 2024: How much political essence is there in Samvidhan Hatya Diwas
संविधान हत्या दिवस। - फोटो : istock

विस्तार

देश में हालिया लोकसभा चुनाव और उसके बाद भी कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों ने भाजपा को संविधान बदलने के मुद्दे पर जिस तरह से घेरा है, मोदी सरकार द्वारा 25 जून को हर साल ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने की अधिसूचना बेशक तगड़ा और तात्कालिक राजनीतिक पलटवार तो है, लेकिन इससे भाजपा को कोई बड़ा दीर्घकालीन सियासी मिल सकेगा, इसमें संदेह है। इस अधिसूचना का मुख्य उद्देश्य संविधान बदलने के सवाल पर उस कांग्रेस पर ही ठीकरा फोड़ना है, जिसे भाजपा अब ‘सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली’ की तर्ज पर कटघरे में खड़ा करना चाह रही है।

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भाजपा का कहना है कि खुद कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए कई बार संवैधानिक मर्यादाओं को भंग किया, लोकतंत्र को कुचला, ऐसे में उसे  भाजपा की नीयत पर उंगली उठाने का कोई नैतिक हक नहीं है। यानी कि वह भाजपा को घेरने की जगह पहले अपने गिरेबान में झांके। हमने तो घोषित तौर वैसा कुछ भी नहीं किया है, जो कांग्रेस ने डंके की चोट पर किया। बावजूद इसके बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में कांग्रेस इस मुद्दे पर कहीं से भी रक्षात्मक नजर नहीं आ रही है।
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वह अपने इस आरोप को बेखौफ दोहरा रही है कि संविधान के मामले में भाजपा का रवैया ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ वाला है। मौका देखकर वह वही करेगी, जिसकी आशंका लोगों के मन में है। आशय यह कि भाजपा देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है। इसकी टेस्टिंग वह जब तब करती रहती है। हाल में दिल्ली विवि में कानून की पढ़ाई में मनुस्मृति को शामिल करने का दांव और फिर इसके राजनीतिक खतरे को भांपने के बाद फैसले की वापसी इसी आशंका के स्पष्ट लक्षण हैं।
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भाजपा नेता इसे खारिज तो करते हैं, पर उसमें उतना विश्वास नहीं झलकता। संविधान और आरक्षण का मुद्दा ऐसा नहीं है कि जिसे चलताऊ ढंग से हैंडल किया जाए। अगर भाजपा के हाथ से दलित और कुछ ओबीसी वोट बैंक यूं ही खसकता गया तो यूपी में अगला विधानसभा चुनाव जीतना भी उसके लिए टेढ़ी खीर होगा। लोकसभा चुनाव में उप्र में पार्टी की करार हार के कारणों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण कर उसके समाधान के उपाय खोजने की बजाए जिस तरह योगी आला कमान को और उप मुख्यमंत्री सीएम योगी पर हमला कर रहे हैं, उससे साफ है कि यूपी में भाजपा के हालात डेढ़ दशक पुरानी स्थिति में लौट रहे हैं।

वैसे संविधान को बचाने और बदलने का यह खेल कुल मिलाकर धारणा का खेल ज्यादा है, जिसमें भाजपा कांग्रेस को पटखनी देना चाहती है, लेकिन सही दांव लग नहीं रहा। यहां कांग्रेस के साथ सुविधा यह है कि वह केन्द्र में विपक्ष में बैठी है, इसलिए जवाबदेही के कॉलम को वह खाली भी छोड़ दे तो खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन भाजपा और एनडीए ऐसा नहीं कर सकते, क्योंकि वह सत्ता में हैं। 

यह बात साफ है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा और एनडीए को जिन तीन राज्यों यूपी, महाराष्ट्र और हरियाणा में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, उसके पीछे कांग्रेस और सपा जैसी पार्टियों द्वारा बनाया गया यह नरेटिव प्रमुख था कि मोदी और भाजपा के 400 के पार के अतिआत्मविश्वासी नारे का असल मकसद संविधान बदलना है और इसे बदलने का मतलब देश में ओबीसी, दलितों और आदिवासियों के संविधान प्रदत्त आरक्षण को खत्म करना है। परोक्ष रूप से उस राज को वापस लाना है, जिसमे अगड़ी जातियों का ही वर्चस्व रहेगा। दूसरे शब्दों में यह ‘ब्राह्मणवाद’ की पुनर्स्थापना की कोशिश होगी।

हालांकि, घोषित तौर पर किसी भाजपा नेता ने इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया, लेकिन संविधान बदलने की सुर्री छोड़कर अपनी ही पार्टी के मैदान में सेल्फ गोल जरूर किया। जबकि कांग्रेस ने ‘बिटवीन द लाइंस’ पर ही चुनाव का ऐसा तगड़ा नरेटिव खड़ा किया, जिसे चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने कुछ राज्यों में धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण खत्म करने के नरेटिव में बदलने की असफल कोशिश की। असफल इसलिए कि हाल के विधानसभा चुनाव के बाद सत्तारूढ़ टीडीपी ने राज्य में मुसलमानों को धर्म के आधार पर 4 फीसदी आरक्षण जारी रखने का ऐलान किया। लेकिन भाजपा अब चुप है, क्योंकि वह भी राज्य में सत्ता में भागीदार है। 

ऐसा लगता है कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी द्वारा हर सभा में संविधान की प्रति लहराकर भाषण देने और लोकसभा में भी शपथ ग्रहण के दौरान कांग्रेस सांसदों दवारा संविधान की प्रतियां दिखाने से परेशान भाजपा और मोदी ने कांग्रेस को बैकफुट पर लाने के लिए संविधान हत्या दिवस’ का कड़वा डोज देने की कोशिश की है। लेकिन यहां सवाल सियासी पलटवार से ज्यादा उसकी राजनीतिक उपादेयता का है। बेशक आपातकाल के दौरान लोगों के मौलिक अधिकार निलंबित हुए। इंदिरा सरकार ने सभी विरोधियों को जेल में डाला। कई घरों में चूल्हा बुझने की नौबत आई। कुछ की जानें भी गईं। लोकतंत्र मूक हुआ। भाजपा चाहती है कि लोग कांग्रेस के उन संविधान विरोधी और लोकतंत्र को कुचलने के कारनामों को याद करें।

उसका असली चेहरा जानें। दूसरी तरफ कांग्रेस ने इस भाजपा के इस वार को पाखंड कहकर खारिज कर दिया है। यह भी सच है कि आपातकाल और उसकी आगे के राजनीतिक घटनाक्रम ने ही आरएसएस की राजनीतिक शाखा जनसंघ को भाजपा में तब्दील होने का स्वर्णिम अवसर भी दिया, जो आज सत्ता में है। कहना मुश्किल है कि अगर आपातकाल न लगता तो जनसंघ अपनी राजनीतिक यात्रा के कितने पड़ाव पूरे कर पाता और क्या भाजपा कभी वजूद में आती?

जहां तक कांग्रेस की बात है तो हाल में 12 सीटों पर हुए विस उपचुनाव के नतीजों ने उसकी हौसला अफजाई ही की है। हमे यह भी याद रखना होगा कि जनता और अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते इंदिराजी ने आपातकाल लगाने के 19 माह बाद इंदिराजी ने ही देश में चुनाव भी करवाए और सभी बंदियों को छोड़ा। जनता ने उन्हें चुनाव में पराजित कर ‘लोकतंत्र की हत्या’ के लिए सजा भी दे दी। इन सबके बाद भी वह 25 साल तक अकेले अथवा गठबंधन के रूप में सत्ता में रही। 

देश में इमरजेंसी को लागू हुए अब पचास साल हो रहे हैं। आज राजनेताओं की सक्रिय पीढ़ी में से अधिकांश ने सिर्फ आपातकाल की कहानियां सुनी हैं। जब आपातकाल लगा और हटा था तब इनमें से ज्यादातर स्कूल के विद्यार्थी रहे होंगे। लेकिन जिन्होंने इमरर्जेंसी को  देखा और भुगता, वो अब ज्यादातर मार्गदर्शक की श्रेणी में हैं। ऐसे में नई पीढ़ी को आपातकाल के ‘अत्याचारों’ के बारे में बताने का कोई बहुत व्यावहारिक लाभ होगा, इसकी संभावना न्यून है।

यह बहुत कुछ वैसा ही है कि कांग्रेस आजादी के बाद कई सालों तक इसी की राजनीतिक कमाई खाती रही कि आजादी की लड़ाई उसीने लड़ी, देश के लिए कुर्बानियां दीं। लिहाजा सत्ता में बने रहने का उसका नैसर्गिक अधिकार है। लेकिन हकीकत में आजादी के तीस साल पूरे होने तक जनता की निगाह में  कुर्बानियों और अंग्रेजी अत्याचारों की उन कहानियों की मार्मिकता और बलिदानों की तीव्रता धीरे धीरे कम होने लगी थी।

इसी का परिणाम आगे चलकर एक अलग वैचारिक पृष्ठभूमि पर खड़ी भाजपा के उत्थान में हुआ। ऐसे में भाजपा का संविधान हत्या दिवस’ उसी पुराने नुस्खे को नए पैकिंग में चलाने की कोशिश ज्यादा लगती है। इसमें कितना वास्तव में राजनीतिक प्राणतत्व है, इसकी परीक्षा देश में तीन माह बाद चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव नतीजों में हो जाएगी।

भाजपा के सामने असली चुनौती यही है कि अगर यह दांव नहीं चला तो वह अपनी प्रांसगिकता बनाए रखने के लिए कौन सी रणनीति अपनाए? केन्द्र में भाजपा के बजाए एनडीए सरकार बनने के बाद राज्यसभा में सीटें और घटना उसके लिए नई मुश्किल खड़ी करेगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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