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सिनेमा, एप और ऑनलाइन सीरीज में बढ़ती अश्लीलता 

Wed, 22 Jul 2020 11:24 AM IST
Prabhakar shukla प्रभाकर शुक्ला
Updated Wed, 22 Jul 2020 11:24 AM IST
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sacred games Mirzapur Gandii baat Mastram web series on OTT Platform increase Obscenity, need to a hard Guidelines and law
सिर्फ पैसों के लिए वेब सीरीज के नाम पर कुछ भी करने को तैयार हैं और बातें करते हैं कि हम वही दिखाते हैं, जो दर्शक देखना चाहते हैं। - फोटो : अमर उजाला

अभी कुछ दिन पहले ही हिंदुस्तानी भाउ ने एकता कपूर और उनकी कंपनी ऑल्ट बालाजी पर अश्लीलता और सेना के अपमान का केस दर्ज किया और सोशल मीडिया पर लोंगो ने समर्थन भी किया।

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एकता कपूर की सीरीज एक्स एक्स एक्स में एक सैनिक जो नौकरी पर जाता जाता है उसकी पत्नी को सेना की वर्दी पहन कर अवैध संबंध बनाते दिखाया गया है जिसमे सेना की वर्दी को फाड़ा जाता है। हो सकता है कि एकता कपूर या फिर उनके लेखक को यह बहुत उत्तेजनापूर्ण लगा हो लेकिन यह सरासर सेना और उसकी वर्दी का अपमान है, देश का अपमान है। 
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बात सिर्फ यही नहीं रुकती इसके पहले और इसके बाद भी बहुत से ऐसे विषय सब के सामने आ चुके हैं। अनुष्का शर्मा की सीरीज पाताल लोक जिसमेंं ब्राह्मणोंं, मंदिरों, देवी देवताओं, सिख समुदाय, पहाड़ी, नेपाली लोगों का भी अपमान किया गया और अल्पसंख्यक समुदाय को बिलकुल दूध का धुला बताया गया। इसमें मॉब लिंचिंग और राम मंदिर के मुद्दों को गलत दृष्टि से दिखाया गया।
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मशहूर निर्देशक दीपा मेहता की सीरीज लैला में भी अतिरंजना पूर्ण तरीके से यह दिखाने की कोशिश की गई कि अगर भारत में वर्तमान राष्ट्रवादी सरकार अगर अगले 30 साल तक रही तो कैसे हालात हो सकते हैं। यह सब सिर्फ एक विचारधारा तैयार करने की कोशिश की जा रही है और इन सब विचारों को अप्रत्यक्ष तरीके से लोगों के अवचेतन मष्तिष्क में बिठाया जा रहा है।  

अनुराग कश्यप की सीरीज सेक्रेड गेम्स की जितनी भी चर्चा की जाए कम है क्योंकि विकृत मानसिकता से गाली, सेक्स, फूहड़ता और अश्लीलता को कहानी की मांग कह कर परोसना सिर्फ पैसा कमाने का जरिया है। इन्हेंं सिर्फ पैसों की चिंता है समाज की नहीं। भले ही लोग कहते रहें कि सिनेमा समाज का आइना होता है। 

ऐसे ही मिर्जापुर, रक्तांचल जैसी बहुत सारी सीरीज हैं, सीरीज क्यों बहुत सारे ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और एप जैसे उल्लू (50 लाख+), प्राइम फ्लिक्स ( एक लाख + ), रपचिक, एम एक्स प्लेयर (50 करोड़+), ऑल्ट बालाजी (एक करोड़ + ), जेम प्लेक्स (10 हजार+), सिनेमा दोस्ती(एक लाख +), फ्लिजज मूवीज (10 लाख+), जियो सिनेमा( 5 करोड़ +), वीबी ऑन वेब (16 लाख+), हॉट शॉट (5 लाख +), होई चोई (10 लाख +), अड्डा टाइम्स और अन्य भी शामिल हैं, जो आंशिक या पूर्णरूप से  अश्लीलता, गाली गलौज और हिंसा के सौदागर हैं। 
(#सब्सक्राइबर और डाउनलोड्स ) 

इन सब से यही लगता है कि यह सब सिर्फ पैसों के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं और बातें करते हैं कि हम वही दिखाते हैं, जो दर्शक देखना चाहते हैं। इस मानसिक, नैतिक और सांस्कृतिक पतन की शुरुआत अगर कहा जाए तो पूजा भट्ट और महेश भट्ट की फिल्म जिस्म(2003) और मर्डर (2004) से हुई। ऐसा नहीं है कि इसके पहले फिल्मों में इस तरह का चलन नहीं था। अगर था भी तो ढके छिपे तरीके से कांति  शाह जैसे लोग अपनी रोजी रोटी चला रहे थे। 

ऐसे में महेश भट्ट ने कांति शाह जैसों के विषय को सी ग्रेड से निकाल कर ए ग्रेड में परोसना शुरू कर दिया। रही-सही कसर पोर्न फिल्मों की हीरोइन सनी लिओनी को कलर्स चैनल ने बिग बॉस में इंट्री देकर पूरी कर दी। जो नहीं भी जानता था, वह उसे इंटरनेट पर खोजने लगा। 

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वेब सीरीज ने सामाजिक मूल्यों और नैतिकता को दरकिनार कर दिया है। - फोटो : अमर उजाला

दुनिया में अश्लील व्यापार वालों को इससे भारत में अपना बाजार नजर आया। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार पोर्न इंडस्ट्री वाली लॉबी ने फिर महेश भट्ट को पैसे देकर सनी लिओनी को मेन स्ट्रीम फिल्म जिस्म-दो में मुख्य भूमिका में खड़ा कर दिया।

पहले बिग बॉस फिर बड़े डायरेक्टर की फिल्म, हो गया एक पोर्न स्टार को कपड़ों में और कपड़ों के बगैर जनता के सामने परोसने का इंतजाम। एक पूरी लॉबी सक्रिय हो गई, उसे सती  सावित्री बताने में। 

अब असली खेल शुरू हुआ। कई बड़ी फिल्मों में सनी के आइटम सांग रखे जाने लगे और उसे लेकर सॉफ्ट पोर्न और अति वयस्क फिल्में जैसे मस्तीजादे, वन नाइट स्टैंड आदि बनने लगीं। नोटों की बारिश होने लगी। कई लोग तो यह भी कहने लगे कि फिल्मों की सफलता की गारंटी तभी है, जब उसमे ए क्लास हीरो हो या फिर सी क्लास वाला सेक्स। 

लेकिन फिल्मों की यह आंधी सेंसर बोर्ड से टकराई तो मस्तीजादे, ग्रेट ग्रैंड मस्ती, क्या सुपर कूल हैं हम... जैसी अति वयस्क फिल्में फंसी, कटीं, थोड़ी भोथरी हुई, लेकिन ट्रिब्यूनल या कोर्ट के आर्डर से रिलीज भी हो गईं। कुछ चलीं कुछ नहीं चलीं। अब शुरू होता है सस्ते इंटरनेट और गंदे वीडियो का खेल एप और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के जरिये।  

सनी लिओनी की सफलता भुनाने के लिए एकता कपूर ने फिल्म बनाई, रागिनी एमएमएस-2 और सफलता का फॉर्मूला मिला ऑल्ट बालाजी एप में गंदी बात सीरीज के साथ। विक्रम भट्ट ने भी वी बी ऑन वेब से उसी गंध को भुनाना शुरू किया। इस समय तक बहुत सारे छोटे-छोटे निर्माता-निर्देशक ऐसी सी-ग्रेड फिल्में बनाकर यू ट्यूब से पैसे कमाना शुरू कर चुके थे। 

एक तरह भेड़ चाल शुरू हो गई की कौन कितना गिर सकता है। इन सबको मिड नाइट वीडियो कहा जाने लगा और इनके दर्शकों की एक बड़ी तादात हो गई। इन सब की सरकार और सेंसर बोर्ड से कई बार लोगों ने शिकायत भी की, लेकिन सबका प्रसारण स्थान अपने देश से बाहर होने की वजह से कुछ कड़ी कार्रवाई नहीं हो पाई। 

अब जरा इनका बिजनेस मॉडल समझिए
ऑल्ट बालाजी एक करोड़ से ज्यादा डाउनलोड और 300 रुपये की एक साल की फीस मतलब 300 करोड़ हर साल। अब इतनी बड़ी रकम कोई क्यों छोड़ेगा, चाहे जमीर ही क्यों ना छोड़ना पड़े। ऐसे ही उल्लू के 50 लाख से ज्यादा डाउनलोड और 99 रुपये एक साल के तो लगभग 50 करोड़।  कोई सेंसरशिप नहीं, जो मर्जी दिखाओ, चाहे देश का अपमान हो, कला का, संस्कृति का या फिर सेना का। बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया। 

अब शुरुआत होती है अमेजन और नेटफ्लिक्स की। पूरी दुनिया में धूम मचाने के बाद जब इन्होने भारत में लांच किया तो मिर्जापुर और सेक्रेड गेम्स से शुरुआत की, जिनमें गाली-गलौज, हिंसा और सेक्स का पूरा मसाला था।

रिलीज होते ही इन लोगों ने हजारों करोड़ के सब्सक्रिप्शन शुल्क कमा लिए। आप करो लड़ाई की यह क्यों दिखाया, ऐसा क्यों दिखाया लेकिन आप कुछ कर नहीं पाओगे क्योंकि यह सब ओटीटी प्लेटफॉर्म अपने देश के बाहर से प्रसारित होते हैं और हमारे कानून के हाथ वहां तक नहीं पहुंच पाते।  

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अब लोग वेब सीरीज में काम करना अपनी तौहीन नहीं समझते बल्कि बड़े उत्साह से उसे शेयर करते हैं। - फोटो : सोशल मीडिया

इनकी देखा देखी और भी कई सारे एप और ओटीटी प्लेटफॉर्म शुरू हो गए, जिनका एक ही ध्येय है- पैसा, चाहे उसके लिए पोर्न दिखाना पड़े या फिर संस्कृति का सत्यानाश हो।

इस समय देश में ऐसे एप और ओटीटी प्लेटफॉर्म की बाढ़ आ गई है। सब अपनी-अपनी ढपली लेकर इस भेड़चाल में कूद गए हैं। चाहे वह बड़े निर्माता हों या छोटे। अब सरकार को इस बारे में कोई ठोस कानून बनाना ही पड़ेगा। 

अगर इसका विश्लेषण करें तो यह कला के ऊपर बाजारवाद, भोग और स्वार्थ का हावी होना है। पहले फिल्में धर्म, इतिहास और संस्कृति पर बनती थीं, फिर सामाजिक विषयों पर बननी शुरू हुई। ऐसे ही एक्शन, कॉमेडी, यथार्थवाद से होते हुए भोगवाद पर आ गई हैं, लेकिन उनका प्रसारण माध्यम और प्रस्तुतीकरण बदल गया है।  

अब लोग सेक्स या अश्लील विषय पर फिल्म या सीरीज बनाना और उसमें काम करना अपनी तौहीन नहीं समझते बल्कि बड़े उत्साह से उसे सबको शेयर करते हैं। बहुत से ऐसे बड़े कलाकार, जो ऐसे विषय नहीं करते थे, अब वह भी पैसे के लालच में यहां नहीं विदेशी फिल्म और सीरीज में अंग प्रदर्शन और अश्लीलता प्रदर्शन को अपनी   शान समझते हैं।

वे कहते हैं कि क्या करें कहानी की डिमांड है और वहां तो ये सब नार्मल है। उन्हें यह नहीं समझ में आता है कि यह यह विदेशी कंपनियां जो आप को दुगने-तिगुने पैसे देकर यह सब करवा रही हैं, वो आपके माध्यम से इस देश के बंद दरवाजे अपने लिए खोल रही हैं। फिर एक बार जब बड़े स्टार इसमें लिप्त हो गए तो बाकी छोटे वालों के लिए वह एक मिसाल बन जाती है कि प्रियंका ने किया, दीपिका ने किया तो हम भी कर लेंगे।  

यह तो एक ऐसी आदत लगाई जा रही है जो आसानी से छूटेगी नहीं। जैसे अंग्रेजों ने फ्री में चाय पिला-पिला कर लोगों को चाय का आदी बना दिया, वैसे ही थोड़ा-थोड़ा दिखा कर यह कंपनियां अपने भविष्य के बाजार और ग्राहक तैयार कर रही हैं।  

पूरी दुनिया में पोर्न इंडस्ट्री का बिजनेस लगभग 600 खरब डॉलर से ज्यादा का है। एक बार जब यहां के लोगों को इसकी आदत लग जाएगी तो छूटेगी नहीं और उनका धंधा जोरों से चलने लगेगा। क्या करें गंदा है पर धंधा है ये।   

इस विषय पर सरकार को दिशानिर्देश और कानून बनाना चाहिए। नहीं तो लोगों के हाथ में जो मोबाइल है उसे पीली पन्नी की किताब की तरह नीला-पीला होने में देर नहीं लगेगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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