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न्यूजीलैंड की मस्जिद में नरसंहार के पीछे पाकिस्तान और चीन की भूमिका?

Sat, 30 Mar 2019 12:07 AM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sat, 30 Mar 2019 12:07 AM IST
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Role of Pakistan and China behind the massacre in the New Zealand Mosque?
क्राइस्टचर्च मस्जिद हमला (फाइल)

एक बार फिर पाकिस्तान सवालों के घेरे में है। न्यूजीलैंड में नर संहार करने वाला ऑस्ट्रेलिया का ब्रेंटन टेरंट चार - पांच महीने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में रहा था। उसने सोशल मीडिया पर पकिस्तान सरकार, प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और उस इलाके की तारीफ की थी। जांच एजेंसियों के इस खुलासे के बाद एक बार फिर पाकिस्तान की जमीन पर पल रहे आतंकवाद के सुबूत उजागर हुए हैं। अलबत्ता इस बार मस्जिदों में नरसंहार का शिकार मुसलमान ही बन गए। 

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जांच एजेंसियों को संदेह है कि इस मामले में चीन का भी हाथ है। चीन का झिनजियांग इलाका भी इस्लामी आतंकवाद से पीड़ित है। चीन ने कोई 10 लाख मुसलमानों को हिरासत में रखा है। उन्हें इस्लामी ढंग से भी नहीं रहने दिया जा रहा है। उनसे कहा जा रहा है कि वे कुरआन और इस्लाम को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हिसाब से बदलें। इससे मुसलमान बहुत नाराज हैं। चीन और ऑस्ट्रेलिया के बहुत गहरे कारोबारी रिश्ते हैं। जानकारों का मानना है कि ब्रेंटन को चीनी अधिकारियों ने ही पाक अधिकृत कश्मीर में भेजा था। 
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ब्रेंटन गिलगित - बाल्टिस्तान और स्कार्दू इलाक़े में पिछले साल अक्टूबर में कुछ दिन रहा था। उसने मुद्रा विनिमय करने वाले एक स्थानीय एजेंट से 2300 अमेरिकी डॉलर के बदले पाकिस्तानी रूपए लिए थे। एजेंट उसे निर्धारित कीमत से कम रूपए दे रहा था। इस बात पर उसकी एजेंट से बहस भी हुई थी। ब्रेंटन जहां जहां भी गया, एकदम घटिया और सस्ते होटल में ठहरा। जानकारों की मानें तो जिन हथियारों का उसने न्यूजीलैंड में प्रयोग किया था, उनमें से कुछ का मॉडिफिकेशन कराने के लिए वह वह ऑस्ट्रेलिया से चीन होते हुए गिलगित-पाकिस्तान पहुंचा था। 
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चूंकि इस इलाके में पाकिस्तानी फौज आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने के लिए शिविर भी चलाती है। इन्ही शिविरों में हथियारों का यह मॉडिफिकेशन हो सकता था। आपको याद होगा कि मस्जिद में इस अंधाधुंध फायरिंग के दौरान पाकिस्तान के भी 9 लोग मारे गए थे। सवाल यह है कि क्या इस नरसंहार की योजना पाकिस्तान में बनाई गई? यदि हां तो उसमें मरने वाले मुसलमान ही होंगे - यह जानते हुए भी उसे सहयोग दिया गया। यदि पाकिस्तान का उसमें हाथ नहीं है तो फिर चीन के अलावा और किसका हाथ हो सकता है। उसका आर्थिक गलियारा प्रोजेक्ट वहां चल रहा है। चीन ही पाकिस्तान को बिना बताए ब्रेंटन को वहाँ बिना किसी रोक टोक के भेज सकता है।

प्रश्न यह भी है कि चीन का इसमें क्या हित हो सकता है। यह कोई छिपा राज नहीं है कि अरसे तक पाकिस्तान को अमेरिका ही पालता पोसता रहा। उसे भरपूर मदद देता रहा। पाकिस्तान अमेरिका से मिले पैसा आतंकवादियों तक पहुंचाता था। अमेरिका का स्वार्थ यह था कि रूस और चीन से होड़ को देखते हुए पाकिस्तान को अपने सैनिक अड्डे के तौर पर विकसित करे। लेकिन जब यह मंशा पूरी नहीं हुई तो अमेरिका छिटक गया। पाकिस्तान ने चीन को ग्वादर बंदरगाह, आर्थिक गलियारे पर नियंत्रण इत्यादि में खुली छूट दी। पाकिस्तान में चीन की करंसी को मान्यता है। चीनी बैंक भी वहां काम कर रहा है। उसके 60 बिलियन डॉलर पाकिस्तान में फंसे हुए हैं। 


अमेरिका को चीन का यह रवैया नागवार गुजरा है। चीन ने इस बहाने अमेरिका को पाकिस्तान से दूर किया और अब यूरोपियन देशों से भी पाकिस्तान को अलग थलग कर देना चाहता है। भारत से पाकिस्तान पहले ही रंजिश रखता है। इससे पाकिस्तान की गर्दन पूरी तरह चीन की पकड़ में आ जाएगी। वह सिर्फ चीन पर आश्रित रह जाएगा। मसूद अजहर के मामले में लगातार वीटो के पीछे चीन की यही साजिश है। पाकिस्तान उसे अपना सबसे बड़ा हितैषी मानता है और उसी के जाल में जकड़ता जा रहा है। जब तक उसकी आंखें खुलेंगीं, तब तक काफी देर हो चुकी होगी। 

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