1857 का संग्राम: सामाजिक सौहार्द और जंग ए आजादी की अनूठी मिसाल है!
15 अगस्त सन् 1947 को जब देश की बागडोर भारतीयों को सौपी गई होगी तब निश्चित तौर पर ब्रितानी हुकूमत के दिलों दिमाग में 10 मई का ऐतिहासिक दिन छाया हुआ होगा। जब भारतीयों ने अपने दिलों में आजादी का पहला दीपक जलाया था। यह हमारे लिए आज भी गौरव की बात है कि भारत की आजादी के संघर्ष का गौरवमयी इतिहास जिसमें हर भारतीय ने चाहे बल, धन या मन, किसी न किसी रूप में अपनी सहभागिता की थी, प्रेम और भाईचारे की अनोखी मिसाल है।
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10 मई सन् 1857 की तारीखी इबारत जिसनें आम जनमानस को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की राह दिखाई। सामाजिक सौहार्द और एकजुटता की अनूठी मिसाल पेश करती है। बेशक उनके पास तब उतनी संगठित योजना न रही हो जिससे वो तत्कालीन दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को उखाड़ पाते लेकिन ब्रिटिश हुकूमत को भारत से खदेड़ने का पहला साहस यकीनन् इसी तारीख को सबने मिलकर किया था और अंतिम वृद्ध मुगल बादशाह को भारत का शासक मान जंग का आगाज किया।
10 मई का ऐतिहासिक दिन
15 अगस्त सन् 1947 को जब देश की बागडोर भारतीयों को सौपी गई होगी तब निश्चित तौर पर ब्रितानी हुकूमत के दिलों दिमाग में 10 मई का ऐतिहासिक दिन छाया हुआ होगा। जब भारतीयों ने अपने दिलों में आजादी का पहला दीपक जलाया था। यह हमारे लिए आज भी गौरव की बात है कि भारत की आजादी के संघर्ष का गौरवमयी इतिहास जिसमें हर भारतीय ने चाहे बल, धन या मन, किसी न किसी रूप में अपनी सहभागिता की थी, प्रेम और भाईचारे की अनोखी मिसाल है। जो हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सामाजिक सौहार्द की विरासत बनेगा।
यूं तो 1857 की क्रांति का आगाज बहुत पहले ही हो चुका था। लोगों में ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी नीतियों से असंतोष खुलकर किसानों और सैनिको की गतिविधियों में देखा जा सकता था। परंतु क्रांति का तत्कालिक कारण बने चर्बी वाले कारतूस। जिनसे भारतीय सैनिकों की धार्मिक आस्था पर गहरा आघात हुआ और 1857 का संग्राम हुआ। अपवाद तो प्रत्येक समय और काल में हुए हैं और होते रहेंगे लेकिन भारत की स्वतंत्रता की जंग में जितनी भी शहादत हुईं उनमें शहीद हुए हर व्यक्ति की एक ही पहचान थी और वो भारतीय थी....।
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दिल्ली के आस पास के इलाकों में भी देश के अन्य इलाकों की तरह सभी जाति धर्मों के लोगों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और भारत के लिए शहादत दी लेकिन विडंबना इस बात की है की हमारे पास उनमें से ज्यादातर लोगों के नाम तक किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं हैं। हालाँकि आज भी हमारे बड़े बूढ़े लोगों की किस्से कहानियों में उनकी वीरता की गाथाएँ मौजूद हैं और उनमें से बहुतों के नाम एक पीढी से दूसरी पीढी तक पहुँच बना पाएं हैं। वर्तमान में जरूरत है नये-नये शोधों की, जिनमें भारत की उस साझी विरासत की कुर्बानी को दर्ज किया जा सके।
डॉ. कृष्ण कांत शर्मा की पुस्तक '1857 की क्रांति में बागपत जनपद के कृषकों की भूमिका' (पृ.113),में चर्बी वाले कारतूस का प्रयोग करने से इंकार करने वाले तीसरी कैवेलरी के सैनिकों के नाम वर्णित हैं जिनमें हवलदार मातादीन, शेख पीर अली(नायक), अमीर कुदरत अली (नायक), शेख हुसैन उद्दीन (नायक), शेख नूर मोहम्मद(नायक), शीतर सिंह, जहांगीर खान, मीर मोसिम अली, अली नूर खान, लाल सिंह, नारायण सिंह सहित 85 सैनिकों की सूची दी गयी है।
जिनमें लगभग सभी जाति धर्म के लोग शामिल हैं जिन्होंने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत कर दी थी। ये वो गुमनाम भारतीय हैं जिनके बारे में संभवतः वर्तमान पीढ़ी नहीं जानती होगी। यह हमारी जिम्मेदारी है की हम उनके संघर्ष से शहादत तक के गौरवमयी सफ़र को संगठित करें ताकि आने वाली सदियाँ अपने इतिहास पर गर्व करें।
सैनिकों के साथ साथ किसानों में भी विद्रोह की ज्वाला को तेज करने का काम बखूबी किया। जनपद बागपत में कई किसानों का योगदान अतुलनीय रहा। डॉ. कृष्ण कांत शर्मा लिखते हैं की हरचंदपुर के किसान जफर और नाहर खां खेती के साथ साथ तीरंदाजी में भी पारंगत थे। इन्होंने अपने अदम्य साहस से अंग्रेजी सेना को नाको चने चबवाये। अंत में दोनों को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी दे दी।
अंग्रेजों के विरुद्ध लोगों को तैयार किया
अचल सिंह गांव बागू निरोजपुर के किसान थे। आप 1800 बीघे जमीन के मालिक थे और अंग्रेजों के विरुद्ध शाहमल की किसान सेना में एक प्रमुख व्यक्ति थे। इन्होंने गांव गांव जाकर अंग्रेजों के विरुद्ध लोगों को तैयार किया और बागपत के बाजार में हमला किया, यमुना के पुल को तोड़ने में अहम भूमिका अदा की। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें बागी घोषित कर दिया और बाद में पकड़ कर मरवा दिया इनकी बहादुरी के किस्से आज भी गांव में सुने जा सकते हैं।
वजीर खां 1857 में बागपत के कोतवाल पद पर तैनात थे लेकिन आपने अंग्रेजों का साथ छोड़ शाहमल की किसान सेना में शामिल होना देशहित में प्राथमिक समझा जिससे अंग्रेजों के सीधे निशाने पर आ गए ब्रिटिश सरकार ने इन्हें बंदी बनाने के लिए कोशिशें तेज कर दी परंतु इन्होंने स्वम् कई अंग्रेज अधिकारियों को बंदी बना लिया। अंत में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और काला पानी की सजा दे दी गई।
इनके अलावा श्यो सिंह, गंगा विशन सिंह, अल्लादिया, मेहताब खां, सूरजमल, पंडित रुडेराय, धीरा कहार, सलेराम और लाल मुइन, भगत, बख्ता और जग्गा, निरपत सिंह और लाजराम, जोहडी के जयराम, जौनमाना के बदन सिंह, जाफ़राबाद के गुलाब सिंह आदि अनेक किसानों ने क्रांति में सक्रिय रूप से भाग लेकर अपने प्राणों की आहुति दी। जिनका वर्णन डॉ. कृष्ण कांत शर्मा ने अपनी पुस्तक '1857 की क्रांति में बागपत जनपद के कृषकों की भूमिका'(पृ.140-46), में किया गया है।
स्वतंत्रता संग्राम 1857
भारत की आजादी के लिए लड़ा गया प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में क्रांति को धार देने से लेकर प्राणों की आहुति तक भारत के सभी धर्मो के लोगों ने बढ़ चढ़कर भागीदारी की। ब्रिटिश हुकूमत ने आपसी भाईचारे की ताकत जो भारत के आम जनमानस में देखी उससे भयभीत होकर आगे चलकर फूट डालो राज करो की नीति का जहर घोलना आरंभ कर दिया।
देश की राजधानी में बूढ़े बादशाह ने भारत की जनता की अपील पर यह जानते हुए की उनके पास न धन है न बल और न सत्ता के सुख के लिए समय, अपने पूरे परिवार की शहादत दे दी। हालांकि, भारत के असंख्य वीरों की शहादत के बाद भी आजादी मिलने में लगभग 90 वर्ष और लगे लेकिन 1857 के संघर्ष के फलस्वरूप दुनिया की सबसे बड़ी सेना में बदलाव के कई मानदंड तैयार किये गए। ब्रिटिश हुकूमत को अपनी नीतियों में बदलाव लाना पड़ा। हम भारतीयों के लिए 1857 का संघर्ष इतिहास का जंग ए आजादी पर एकजुटता का गौरवमयी दस्तावेज है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए नजीर है।
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