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राहत इंदौरी : मालवा की शिनाख़्त में शामिल है उनकी शायरी
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राहत इंदौरी की याद में
- फोटो : Amar Ujala Graphics
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राहत इंदौरी पर लिखना यानि ‘एक आग का दरिया है और डूब के जाना है’ वाले अहसास से गुज़रना है। वाचिक परंपरा के शीर्ष स्वर के रूप राहत साहब इस वक़्त देश के सबसे लोकप्रिय शायर थे। वे अपनी आवाज़ और कहन से अपने सामईन को अपना शैदाई बना लेते थे। बिलाशक! उनका नाम इस समय उर्दू अदब परंपरा की उन पहली पांच आवाज़ों में शामिल किया जा सकता है जिनकी वजह से शायरी के रसिकों का ज़ायका लगातार समृद्ध हो रहा है। इन बीते दस बरसों में तो वे किसी भी क़ामयाब जलसे का अनिवार्य नाम बन गए थे।
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बहुत ज़िम्मेदारी और ऐहतराम के साथ कहना चाहूंगा कि बीते पचास बरसों की दीन-दुनिया की हलचलों, मुश्किलों, मरहलों और मसलों की पड़ताल करने की ज़रूरत आन पड़े तो हमें राहत साहब के अशआर पढ़ या सुन लेना चाहिए। उनकी शायरी आम आदमी की ज़बान और अदब की दुनिया का दस्तावेज़ है। उनकी लोकप्रियता की वजह भी यही है कि वे अपनी शायरी में ऐसी मिसालें शामिल कर लेते हैं या ऐसे सवाल उछाल देते हैं जिसका अहसास आम आदमी के ज़हन में हर लम्हा ज़िंदा रहता है।
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जैसे ही वह इस विख्यात शायर का कोई शेर सुन लेता है तो उसे लगता है कि जो मैं नहीं कह पा रहा था वह राहत इंदौरी ने कह दिया है। मैं तो यहां तक कह सकता हूं कि ज़माने को अपनी परेशानियों से राहत ही इस कलंदर शायर के कलाम को पढ़ने के बाद मिलती है। उनके तेवर, तबीयत और तासीर में वे सारी बातें शामिल होती हैं जो आम इंसान की ज़िंदगी का हिस्सा है। राहत साहब की शायरी में अभिव्यक्त होता व्यंग्य बहुत गहरे असर करता है। दो मिस्रों के बीच पोशीदा उनकी नसीहतें सुनने और पढ़ने वालों के काम की होती हैं।
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राहत साहब मनुष्य की नब्ज़ पहचानते थे और वही कहने में यक़ीन करते थे जो सीधे दिल में उतर जाता है। मुझे लगता है राहत साहब के व्यक्तित्व का एक उजला पहलू यह भी है कि वे स्टार अदीब होने के बावजूद बनावट और छल से परहेज़ करते रहे। जो जज़्बात उनके भीतर धधकते या मचल रहे होते वही उनकी बोली-बानी, व्यवहार और शायरी में सुनाई देते हैं। यही वजह है उनका कहा हुआ सच्चा और खरा लगता है।
यह तथ्य सुर्खियों में नहीं आया है कि राहत साहब ने साठ का दशक ख़त्म होते होते मंच संभाल लिया था। सत्तर के दशक तक कई मजमों में बाक़ायदा तरन्नुम से पढ़ते थे लेकिन सन 1972 के आसपास वरिष्ठ शायर कृष्णबिहारी नूर की नसीहत के बाद उन्होने तहत में पढ़ना शुरू किया। उसके बाद तो…।। रेस्ट इज़ द हिस्ट्री। मंचीय आयोजनों में स्टैंड अप कॉमेडी करने वालों के साथ शिरक़त पर वे ख़ास ऐतराज़ करते थे। हिंदी चित्रपट संगीत पर उनकी गहरी पकड़ थी और उसी वजह से वे मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री की ओर मुतासिर हुए लेकिन एक समय के बाद उन्हें लगा कि मुशायरे ही उनका सही इलाक़ा है। बीत कुछ सालों में वे बहुत अस्वस्थ रहे लेकिन डॉक्टर्स की तजवीज़ के बाद भी उन्हें लगता था कि मुशायरों की भीड़ ही उनके लिए दवा का काम करती है। एक तरह से वे आम आदमी का स्वर थे जिससे मिलना, बतियाना, उसे अपना कलाम सुनना उन्हें बेहद सुकून देता था।
कोई दस बरस पहले हमने श्रोता बिरादरी के बैनर तले उनका एकल शायरी पाठ रख लिया। रमज़ान के पहले बात हुई थी और वे तारीख़ देकर प्रवास पर चले गए। जब आयोजन की तिथि पास आई तो उन्हें ख़याल आया की रमज़ान प्रारंभ हो जाएंगे और ऐन आयोजन के दिन ईद भी आ गई। ज़बान के पक्के राहत इन्दौर निश्चित समय पर कार्यक्रम में आए और दिल खोल कर बात की, शायरी सुनाई। वह राहत इंदौरी के शैदाइयों का एक अभूतपूर्व मजमा था। तीसरी मंज़िल पर आयोजित इस कार्यक्रम में सैकड़ों लोगों ने अपने महबूब शायर को चढ़ाव में खड़े खड़े सुना। इन्दौर की शायरी विरासत को रौशन करने वालों में राहत साहब का नाम क़ाशिफ़ और नूर इंदौरी के बाद बड़े एहतराम से लिया जाता रहा है।
मालवा की शिनाख़्त में अहल्याबाई होलकर, दानवीर सर सेठ हुकुमचंद, उस्ताद अमीर ख़ां, लता मंगेशकर, कर्नल सीके नायडू, मकबूल फ़िदा हुसैन, कैप्टन मुश्ताक़ अली, राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसी अज़ीम शख़्सियतों से होती आई है। यदि डॉक्टर राहत इंदौरी का नाम भी इस फेहरिस्त में शामिल कर लूं तो अतिशयोक्ति तो नहीं होगी न?