पुण्यतिथि विशेष: पिता-पुत्र युग्म पंडित देबू चौधरी और पंडित प्रतीक चौधरी को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि
देबू चौधरी जी को देश के बड़े-बड़े कलाकारों से मिलने का अवसर मिलता गया। उन्होंने रहीमुद्दीन डागर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और मशहूर उस्ताद मुस्ताक अली खान को सुना। उस समय तक देबू चौधरी भी युवा वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने लगे थे।
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गत् वर्ष सन् 2021 के अप्रैल माह में करोना वायरस की दूसरी लहर ने देशभर में तबाही मचा रखी थी। इस घातक वायरस ने ना जाने कितनों की जान ले ली? हिन्दुस्तान के मशहूर सितार वादक और उनके पुत्र प्रतीक चौधरी एक सशक्त युवा सितार वादक, दोनों इस महामारी के ग्रास बन गए। प्रतीक चौधरी अपने पूज्य गुरु और पिता की सेवा करते हुए संक्रमित हो गए थे। दोनों पिता-पुत्र दिल्ली के तेग-बहादुर अस्पताल में भर्ती थे। प्रतीक चौधरी ने स्वयं अपने पिता की मृत्यु की खबर फेसबुक पर दी थी पर उन्हें क्या मालूम था कि काल की नज़र उनपर भी पड़ चुकी थी और सिर्फ छः दिन के बाद उनकी भी मृत्यु हो गई।
पद्मभूषण स्वर्गीय पंडित देवव्रत चौधरी का जन्म 30 मई 1935 को हुआ था। इनके पिता विश्वेश्वर चौधरी एक व्यापारी थे और इनकी माता का नाम हीरेन बाला देवी था। ये लोग रामगोपालपुर के निवासी थे जो आज बांग्लादेश का हिस्सा है। अपने राज्यसभा टी.वी. के साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि मेरे परिवार में दूर-दूर तक कोई संगीत के क्षेत्र नहीं है पर मुझे संगीत से इतना लगाव है।
उनका यह कहना था कि संगीत कोई वंशानुगत मिलने की चीज़ नहीं है, अपितु यह आपकी व्यक्तिगत रुचि है। भारत की आज़ादी के बाद उनके परिवार ने हिन्दुस्तान के कोलकाता शहर में रहने का निर्णय लिया। इस दौरान देवव्रत चौधरी जो “पंडित देबू चौधरी” के नाम से मशहूर थे, 1948 में पहली बार आकाशवाणी पर अपनी पहली प्रस्तुति बच्चों के कार्यक्रम में दिया।
बड़े कलाकारों का रहा सानिध्य
उन दिनों कोलकाता देश की सांस्कृतिक राजधानी हुआ करती थी, इस वजह से देबू चौधरी जी को देश के बड़े-बड़े कलाकारों से मिलने का अवसर मिलता गया। उन्होंने रहीमुद्दीन डागर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और मशहूर उस्ताद मुस्ताक अली खान को सुना। उस समय तक देबू चौधरी भी युवा वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने लगे थे।
सन् 1950 में उन्होंने जयपुर-सेनिया घराने के उस्ताद मुस्ताक अली खान से तालीम लेनी शुरू की और गुरु-शिष्य परम्परा की ये अद्भुत मिसाल बनी। तकरीबन 38 वर्षों तक ये गुरु के सानिध्य में रहे। इनके गुरु ने इन्हें 17- फ्रेट के सितार बजाने की तालीम दी जो बहुत ही कठिन होता है। इनके गुरु ने इन्हें मसीतखानी और रज़ाख़ानी गतों की तालीम दी।
मसीतखानी गत हमेशा तीन ताल में बजती है और इसकी प्रकृति गंभीर होती है। इसका अविष्कार तानसेन के वंशज मसीत खान ने किया और रज़ाख़ानी गतों का अविष्कार रज़ाख़ान ने किया था। इसकी लय तेज होती है और इसे किसी भी ताल में बजा सकते हैं। इसकी प्रकृति चंचल है। इसे लखनऊ बाज भी कहते हैं। देबू जी की शिक्षा इतनी गहन थी कि बाद में इन्होंने गतों पर एक पुस्तक लिखी।
अपने बड़े भाई की सलाह पर वे 1960 में दिल्ली आ गए। उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक का पद मिला। उन्होंने करीब 40 वर्षों तक नौकरी की। चूंकि उनका ताल्लुक देश के बड़े कलाकारों से था तो वे अपने विभाग में समय-समय पर वर्कशॉप, प्रशिक्षण सत्र, सेमिनार एवं गोष्ठी करवाते रहते थे, जिससे छात्रों का ज्ञान, रूचि और मनोबल स्तर ऊँचा रहता था।
आकाशवाणी के टॉप ग्रेड कलाकार
शिक्षण के साथ वे अपनी मंच प्रस्तुति भी दिया करते थे। सन् 1971 ई. में वे आकाशवाणी के टॉप ग्रेड कलाकार घोषित हुए। उन्होंने अपने गुरु और गुरु भाई पंडित निर्मल गुहा ठाकुर के साथ कई प्रस्तुतियां दीं। राग भैरवी में इन तीनों का एक-साथ वादन एक अद्भुत माहौल कायम करता था।
इनकी शिक्षण का सिलसिला जारी रहा उन्होंने अपने पुत्र प्रतीक चौधरी और पोते अधिराज चौधरी के अलावा कई नामी कलाकार इस देश को दिए। इन्होंने कई मशहूर पुस्तकें लिखीं जैसे “सितार ऐंड इट्स म्यूजिक, इंडियन म्यूजिक आदि। इन्होंने कुछ अलबम भी बनाए।
कुल मिलाकर इन्होंने छः पुस्तकें लिखी, आकाशवाणी की कई रिकॉर्डिंग हुईं, अनगिनत बंदिशें बनाई, उन्होंने कई नए राग भी बनाए। वे काफी मधुर सितार वादन के लिए मशहूर थे। उन्होंने सन् 1993 में अपने गुरु के नाम पर एक संस्था बनाई जिसका नाम “मुस्ताक अली खान सेंटर फॉर कल्चर” है। इसकी वार्षिक कार्यक्रम गोष्ठी में एक बार उन्होंने कहा कि मैं रहूँ या ना रहूँ पर सितार की ये परम्परा कायम रहेगी। मैंने अपने गुरु से ये वादा किया है।
अपने समकालीन सितार वादक पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत खान और पंडित निखिल बनर्जी के साथ उन्होंने ने भी देश में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया। उनका ये कहना था कि देश को शांत और प्रगतिशील बनाने के लिए प्रारंभिक शिक्षा के समय से ही संगीत पाठ्यक्रम में एक अनिवार्य विषय होना चाहिए। हम लोग कला के क्षेत्र में योगदान देंगे तभी देश आगे बढ़ेगा। भारत सरकार ने उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया।
एक वाक्या याद आ रहा है साझा करना चाहती हूँ। एक बार मैं अपनी गुरु विदुषी सविता देवी के साथ पंडित जी के चितरंजन पार्क स्थित निवास स्थान पर गई थी। पंडित जी सोफे पर बैठे थे। हम लोगों ने उनको नमस्कार किया और बैठ गए। थोड़ी देर सितार पर बात हुई क्योंकि मेरी गुरु ठुमरी की महान हस्ती होने के साथ-साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में सितार की प्रोफेसर भी थीं। फिर पंडित जी ने कहा कि सविता आज मन बहुत व्यथित है तुम मुझे अपना दादरा “दीवाना किए श्याम” गा कर सुना दो।
सविता जी ने कहा ठीक है और उन्होंने अलाप के बाद जैसे ही स्थाई गाना शुरू किया पंडित जी की आंखों से आँसू गिरने लगे। फिर उन्होंने कहा कि सितार के साथ गाओगी? थोड़ी देर में दोनों ने वो समा बाँधी जिसे कोई भी सुनने वाला भूल नहीं सकता है।
7 सितम्बर 1971 को उनकी पत्नी मंजुश्री चौधरी ने एक मेधावी पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम उन्होनें “प्रतीक चौधरी” रखा। प्रतीक जी ने अपने पिता से सितार की तालीम ली और गहन रियाज़ किया। वे भी अपने पिता की तरह दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। उनके पुत्र अधिराज चौधरी को भी सितार की अच्छी तालीम मिल रही थी। इन लोगों की काशी के संकट मोचन मंदिर से काफी घनिष्ठता थी।
संकट मोचन की प्रस्तुति
सन 2020 में इनके पिता पंडित देबू चौधरी, स्वयं प्रतीक चौधरी और उनके पुत्र अधिराज चौधरी तीनों पीढ़ियों ने एक साथ मिलकर संकट मोचन में सितार की अद्भुत प्रस्तुति दी थी।
गत् वर्ष 1 मई 2021 को पंडित देबू चौधरी जी कोरोना वायरस के प्रकोप से जान गंवा बैठे और ठीक छः दिन बाद 7 मई 2021 को पिता की सेवा करते हुए कोरोना से संक्रमित प्रतीक चौधरी ने भी दिल्ली के तेग - बहादुर अस्पताल में अपनी अंतिम साँस ली। इस प्रकार क्रूर महामारी ने एक साथ दो-दो पीढ़ियों को समाप्त कर दिया।
देश ने एक सशक्त युवा कलाकार को खो दिया। इनके घर में अब उनकी पत्नी रूना चौधरी, पुत्री रयाना चौधरी और बेटा अधिराज चौधरी हैं। अधिराज ने सितार की तालीम जारी रखी है। उनके उज्जवल भविष्य की कामना के साथ दोनों महान कलाकारों को मैं विनम्र श्रद्धांजली अर्पित करती हूं।
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