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फकीरचंद कोहली स्मृति शेष: एक फ़क़ीर, जिसने देश की दिशा बदल दी..!

Sun, 20 Dec 2020 12:44 PM IST
L.C SINGH एल सी सिंह
Updated Sun, 20 Dec 2020 12:44 PM IST
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Remembering Faqir Chand Kohli tcs founder know his life and memories
कोहली ने टाटा समूह की अग्रणी कंपनी टाटा इलेक्ट्रिक कंपनी में पहली नौकरी की, जेआरडी टाटा तब समूह के मुखिया थे। - फोटो : Social Media

भारतीय आईटी पेशेवरों का इन दिनों दुनिया भर में रुआब कायम है। इसकी शुरूआत हुई थी पेशावर में पले बढ़े एक शख्स के लौटकर अमेरिका न जाने के प्रण से। फकीर चंद कोहली नाम के इसी शख्स ने 200 अरब डॉलर के उस आईटी उद्योग की देश में आधारशिला रखी, जिसमें अब करीब 45 लाख लोग काम करते हैं। कोहली का निधन 96 साल की उम्र में बीते महीने हुआ, उन्हें याद कर रहे हैं, उनके साथ 17 साल काम करने वाले और आजीवन उनसे मार्ग दर्शन लेते रहे बहुराष्ट्रीय कंपनी निहिलेंट के संस्थापक व टीसीएस के पूर्व उपाध्यक्ष एल सी सिंह।

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महाभारत में भीष्म कहते हैं, हृदय को स्पंदित करने वाले सम्बन्ध भरोसे से बनते हैं। भरोसे और विश्वास के बंधन हृदय से ही बन सकते हैं, और तोड़ने मुश्किल होते हैं।
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भारतीय आईटी उद्योग के ‘भीष्म पितामह’ फकीर चंद कोहली से मेरा रिश्ता ऐसा ही रहा, आपसी विश्वास, सम्मान और बिना किसी आकांक्षा से किए जाने वाले प्यार की तरह। हम 40 साल एक दूसरे के करीब रहे। पहले 17 साल तो खैर मैंने उनके साथ काम ही किया और बाकी के साल मैंने उनके शिष्य, प्रशंसक और अनुयायी के तौर पर उनका साथ पाया।
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मेरे लिए वह सिर्फ एक पितृतुल्य व्यक्तित्व भर नहीं थे, वह मेरे लिए आस्था और प्रेरणा का एक सतत स्रोत रहे। महामृत्युंजय मंत्र में जिस तरह की मृत्यु की कामना की गई है, वह वैसे ही पके फल की तरह जीवन की डाली से अलग हुए। 96 साल की उम्र। बिना किसी को कष्ट दिए। बिना कोई कष्ट भोगे। बहुत समय लगेगा ये महसूस करने और मानने में कि आज की तारीख में 45 लाख परिवारों को पालने वाले 200 बिलियन डॉलर के आईटी उद्योग को खड़ा करने वाले फकीर चंद कोहली को अब हम सिर्फ अपने अंतर्मन में महसूस कर पाएंगे।

और, यह सोचकर ही दुख होता है...

फकीर चंद कोहली या कि एफ सी कोहली जिस नाम से कि दुनिया उन्हें जानती है, उनके व्यक्तित्व का आंकलन करना बहुत कठिन है। मेरी उनके साथ की तमाम यादें हैं, मैं उन यादों के सहारे ही कोशिश कर रहा हूं उनके चरित्र की उन बातों को याद करने की जो मेरे जैसे बैंक में काम करने वाले उत्तर प्रदेश के एक युवक को अंतर्राष्ट्रीय कारोबारी बना सकती हैं।


वह पेशावर (अब पाकिस्तान में) के एक सफल उद्यमी परिवार में जन्मे और बचपन में ही उनकी मेधा को उनके घरवालों ने पहचानकर उन्हें पढ़ने के लिए कनाडा भेज दिया गया। बाद में वह मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी (एमआईटी) से पॉवर इंजीनियरिंग में सम्मान सहित उत्तीर्ण होकर निकले। लेकिन, भाग्य से उनका सामना होना अभी शेष था।

भारत का बंटवारा हो गया। कोहली परिवार को पेशावर से लखनऊ आना पड़ा। विभाजित भारत में कोहली वापस लौटे तो जैसा कि उन्होंंने खुद मुझे कुछ साल पहले बताया था, “जब मैं लखनऊ पहुंचा और मैंने अपने उस परिवार को धरती पर सोते देखा जिनके पास पेशावर में ऐशोआराम की किसी वस्तु की कमी नहीं थी। उस पूरी रात मैं सो नहीं सका और रात भर रोता रहा। सुबह सूरज उगने के साथ मैं तय कर चुका था कि मुझे क्या करना है। मैंने अमेरिका वापस नहीं जाने का फैसला किया। मैंने तय किया कि मैं भारत में ही रहूंगा और अपने परिवार, अपने देश के लिए कुछ करुंंगा।”

कोहली ने टाटा समूह की अग्रणी कंपनी टाटा इलेक्ट्रिक कंपनी में पहली नौकरी की, जेआरडी टाटा तब समूह के मुखिया थे। कोहली ने यहां देश का पहला डिजिटल लोड डिस्पैच सिस्टम बनाया। दुनिया में अपनी तरह के अनोखे इस प्रयोग को देख जेआरडी टाटा इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कोहली से टाटा कंप्यूटिंग सेटर को संभालने का अनुरोध कर दिया। यही सेंटर आगे चलकर दुनिया की नामी आईटी कंपनी टीसीएस बना। जल्द ही टीसीएस कोहली के नियंत्रण में थी और इसी के साथ शुरू हुई कोहली की वह अनवरत दिन रात चलने वाली यात्रा जो सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं रही, उसने पूरे एक उद्योग की आधारशिला रख दी थी।

यही वह समय था जब मैंने तेहरान में वहां के वित्त मंत्रालय और भारतीय स्टेट बैंक की नौकरी छोड़ी और 80 के शुरूआती दशक में टीसीएस में प्रवेश किया। तब तक कोहली आईटी क्षेत्र की एक प्रतिष्ठित हस्ती बन चुके थे, हालांकि टीसीएस तब भी टाटा संस लिमिटेड की एक शाखा ही थी।

कोहली से मेरा पहला आमना-सामना कंपनी में प्रवेश के छह महीने बाद हुआ। और, वह भी एक रोचक घटनाक्रम के चलते। हुआ यूं कि एक बहुत बड़े बैंक के प्रबंधन ने टीसीएस के प्रतिनिधिमंडल से अपमानजनक लहजे में बात की तो मैं अपनी पूरी टीम के साथ बैठक का बहिष्कार कर चला आया। अब मुझे उनके सामने अपना स्पष्टीकरण देना था।

मुझे वह दिन अब भी याद है। वह मुझे घूर रहे थे। उनकी आंखों में जैसे कोई एक्स-रे हो। कुछ देर यूं ही मुझे देखने के बाद उन्होंने जो कहा, वह शब्द दशकों बाद आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं, “आपने बिल्कुल ठीक किया कि बैठक छोड़कर चले आए। टीसीएस कभी ये नहीं चाहेगी कि उसके किसी कर्मचारी के साथ कोई भी व्यक्ति अभद्रता करे। फिर चाहे वह हमारा ग्राहक ही क्यों न हो। हमें उनसे माफीनामा भी लेना चाहिए।”

उस दिन एफ सी कोहली का कद मेरी आंखों के सामने और बड़ा हो गया। उनका पूरा व्यक्तित्व किसी पाठशाला से कमतर नहीं था। मैंने उनसे तमाम सबक सीखे और ये सबक हर उस व्यक्ति के लिए हैं जो देश और समाज के लिए कुछ करना चाहता है।

सबक एकसही बात का पक्ष लेना आवश्यक
जिन लोगों ने भी फकीर चंद कोहली के साथ काम किया है, वह जानते हैं कि वह बहुत ही अनुशासनप्रिय और सख्तमिजाज व्यक्ति थे। वह हर काम चुस्त दुरुस्त चाहते थे, पूरी तरह परफेक्ट। काम में कोताही उन्हें बर्दाश्त नहीं थी। लोगों ने उन्हें मुस्कुराते कम ही देखा। यहां तक कि अगर लिफ्ट में भी कभी एक साथ होने का संयोग बन जाए तो लोग उनसे दूरी बनाकर ही खड़े हो पाते थे।

वह ये सब समझते थे, लेकिन कार्यसंस्कृति में शिष्टाचार को मानते थे। एक बार की बात है। वह दुबई आए। मैं वहां कंट्री मैनेजर था। किसी कार्यक्रम के लिए हम एकत्र हुए और सब एक ग्रुप फोटो लेना चाहते थे। कोहली बीच में और हम सब उनके आसपास। मुझे उन्होंने अपने पास खड़ा कर लिया। जो साथी हमारी फोटो खींच रहे थे, उनको मेरे और उनके बीच की दूरी असहज लग रही थी तो उन्होंने कहा, ‘एलसी, थोड़ा और करीब जाओ। डरो मत।’ तो कोहली का उत्तर था, ‘वह डर नहीं रहे, वह सम्मान कर रहे हैं।‘

ये शब्द मेरे जीवन साथी बन चुके हैं।

सबक दो: अपनी संस्कृति और दूसरों का सम्मान मत भूलो
जैसे-जैसे मैं एफ सी कोहली के साथ काम करते करते उनके ज्यादा करीब आता गया, मैंने महसूस किया कि वह एक बहुत ही विशालकाय व्यक्तित्व के मालिक होने के साथ एक सज्जन पुरुष थे। वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने आजीवन निजी और व्यावासायिक जीवन में उच्च मूल्यों का पालन किया।

मुझे याद आता है कि कोहली कितनी गहराई से हर चीज की छानबीन करते थे। सारे प्रोजेक्ट लीडर्स को अपनी एक मासिक प्रगति रिपोर्ट उन्हें भेजनी होती थी। वह हर रिपोर्ट को तुरंत देखते और उसे अपनी टिप्पणी के साथ 24 घंटे के भीतर वापस भेजते। वह हर दस्तावेज की पंक्ति दर पंक्ति पढ़ा करते और अगर कहीं उन्हें कोई वर्तनी की गलती भी दिखती तो उसे ठीक करते। फिरोजी रंग की स्याही उनका ट्रेडमार्क थी और वह मुख्यतया तीन तरह की टिप्पणियां लिखते, ‘प्लीज स्पीक’, (कृपया बात करें) ‘प्लीज डिस्कस’ (कृपया चर्चा करें) या फिर ‘प्लीज सी मी’  (कृपया मुझे आकर मिलें)।

आखिरी वाली टिप्पणी लिखने का आशय होता था कि वह रिपोर्ट भेजने वाले से अनपौचारिक रूप से मिलना चाहते थे और उसका हौसला बढ़ाना चाहते थे। ‘प्लीज स्पीक’ का मतलब होता कि सवालों की बौछार झेलने के लिए तैयार रहिए और ‘प्लीज डिस्कस’ माने संबंधित मुद्दे पर एक चर्चा। और, अगर उन्होंने नारायण को आपको लाने भेज दिया तो यकीन मानिए सामने वाली की सांसें कुछ पल के लिए तो थम ही जाती थीं। नारायण, उनके बहुत लंबे समय तक परिचारक रहे।

सबक तीन: अगर किसी ने रिपोर्ट लिखने का श्रम किया है, तो उसे पढ़ें जरूर और उस पर कार्रवाई भी जरूर करें
जैसे-जैसे साल गुजरते गए, मुझ पर एफ सी कोहली का भरोसा बढ़ता गया। मध्य पूर्व में मेरे काम और कुछ बेहद पेचीदा समस्याओं का समाधान कर पाने के चलते मेरी मुख्य कार्यालय में वापसी हुई, जिम्मेदारियां बढ़ीं और कंपनी में मेरा कद भी बढ़ा। भरोसा एक सतत् चलने वाली मापन प्रक्रिया है और इसे अपने कर्मों से कमाना होता है। ये समस्याओं से होकर गुजरने की दक्षता और इनके परिणाम पाने की चुनौतियों पर भी निर्भर होता है। उनके साथ काम करना लगातार चलते रहने वाली परीक्षाओं जैसा होता था और इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने वाले को वह निष्ठा, भरोसे और साहस के पैमाने पर खरा मानने को भी तैयार रहते थे।

सबक चारनिष्ठा व विश्वास कमाने होते हैं
1985 में मैं मध्य पूर्व से वापस भारत लौटा तो एफ सी कोहली ने मुझे एक नया काम सौंपा। ये था टीसीएस के मार्केटिंग समूह की स्थापना, जो कंपनी में इससे पहले कभी था ही नहीं। इसका विस्तार हुआ तो आगे चलकर प्रोडक्ट मार्केटिंग और प्रोडक्ट डेवलेपमेंट भी इससे आ जुड़े। उनका विचार प्रवाह कुछ इस तरह का होता था कि, ‘मैं तुम्हें एक अधिकार क्षेत्र दे रहा हूं, तुम्हारा काम है इसकी सीमाओँ में रहकर खुद को विस्तारित करते रहना, जिम्मेदारियां लेते रहना और कभी उनको नीचा दिखाने लायक काम न करना।’ लब्बोलुआब ये कि वह आपको एक उद्यमी के तौर पर विकसित होते देखना चाहते थे।

उन्होंने मुझे जो विशाल जिम्मेदारियां विभिन्न कार्यक्षेत्रों के विस्तार में दीं, उनसे मेरा भी विकास हुआ। उन्होंने मुझे नई चीजों को खोजने की, बाधाओं के पार जाने की और एक समग्र पेशवर के रूप में विकसित होने व संस्थान के मूल्यों में दर्शनीय वृद्धि करने की जो खुली छूट दी, उसके लिए मैं हमेशा उनका आभारी रहूंगा। ये कोहली जैसे दूरदृष्टि वाले नायक की वजह से ही है कि उनसे मिले चुनौती भरे अवसरों ने मुझे एक प्रोग्रामर से एक प्रोजेक्ट मैनेजर, एक कंट्री मैनेजर और वहां से एक मार्केटिंग विभाग के मुखिया और फिर एक उद्यमी के तौर पर अपनी खुद की कंपनी स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया।

सबक पांचसफलता का शॉर्टकट नहीं है
फकीर चंद कोहली को अगर मैं एक दूरदृष्टा नायक कहता हूं तो इसके पीछे वजह है उनका प्रतिभावन लोगों पर भरोसा करने में रुचि लेना।

साल 1987 की बात है, उन्होंने मुझे पूरे यूनाइटेड किंगडम में कारोबार की जिम्मेदारी संभालने को कहा और एक साल के लिए लंदन में रहने का निर्देश दिया। मुझे उनके चयन पर हैरानी ही हुई क्योंकि मुझे मध्य पूर्व देशों के बाहर काम करने का कोई अनुभव ही नहीं था। मेरा ये चयन मेरे लिए ही नहीं बल्कि मेरे परिवार के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया। जैसे ही मैं लंदन पहुंचा, मैं गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। लंबे समय तक मुझे अस्पताल में रहना पड़ा। मेरे वरिष्ठों में से कुछ ने इस बात की चर्चा छेड़ी कि मुझे वापस भारत बुला लिया जाए और किसी दूसरे को वहां भेज दिया जाए। लेकिन, (ये मुझे उन्होंने बहुत बाद में बताया) कोहली अपने फैसले पर अडिग रहे और मेरे ठीक होने का इंतजार करते रहे। अंतत: ईश्वर की कृपा हुई और मैं वहां दो साल रहा। इस अवधि में टीसीएस की भविष्य वृद्धि के लिए यूनाइटेड किंगडम एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया।

सबक छहअगर आपको अपने फैसले पर यकीन है, तो उसके लिए लगे रहो
लंदन से लौटने के बाद टीसीएस की मार्केटिंग गतिविधियों के प्रभारी के रूप में हम एकाउंटिग का वह सॉफ्टवेयर लॉन्च करने जा रहे थे जो आगे चलकर बहुत ही कामयाब सॉफ्टवेयर बना, नाम था, ई.एक्स.। इस मौके का प्रयोग कोहली एक ऐसा संदेश देने के लिए करना चाहते थे जिससे दुनिया को टीसीएस की धाक का पता चले। इसके लिए हमने एक ऐसे मंचन की योजना बनाई जिसमें रंगमच पर काम करने वाले पेशेवर कलाकार थे, कुछ वीडियो रिकॉर्डिंग्स थी और थे कंप्यूटर्स। इन सबको लेकर एक अच्छी सी पटकथा लिखी गई थी। किसी सॉफ्टवेयर के लॉन्च के लिए ऐसा कुछ करना अभूतपूर्व था।

कार्यक्रम में भारत के आईटी परिक्षेत्र से जुड़े हर व्यक्ति को हमने आमंत्रित किया था। सभी बड़े अखबारों व पत्रिकाओं के संपादक हमारे मेहमान बने। टाटा संस के वरिष्ठ निदेशकों और मेहमानों के सामने कार्यक्रम शुरू हुआ। कोहली को बिल्कुल पता नहीं था कि कार्यक्रम में क्या होने वाला है, उनके दिमाग में उस समय क्या चल रहा होगा, ये बस सोचा ही जा सकता है। चूंकि कोई भाषण नहीं होने थे तो कोई रिहर्सल भी नहीं हुए। जब मैं उन्हें मंच पर लेकर जा रहा था, तो मैंने उनको बोलने के लिए सिर्फ एक लाइन दी। कभी कभी मुझे लगता है कि अगर मैं उनकी जगह होता तो क्या बिना ये जाने कि क्या कुछ होने जा रहा है, मैंने किसी को अपनी और टीसीएस जैसी कंपनी की प्रतिष्ठा को इस तरह दांव पर लगाने की अनुमति दी होती?

एफ सी कोहली उस पल जैसा कि होना ही था, थोड़ा नर्वस थे। लेकिन उन्होंने अपनी लाइनें पूरे अधिकार और पूरे धमाके के साथ बोलीं। अगले दिन एक बड़े समाचार पत्र समूह के अखबार की हेडलाइन थी, “गॉड कोहली प्रोनाउंसेंस, ‘लेट देयर बी लाइट, लेट देयर बी ई.एक्स. (देवता कोहली बोले, रोशनी होने दो, ईएक्स को छा जाने दो।)’”

सबक सातजब गुरु का शिक्षण पूरा हो जाए तो शिष्य को परिणाम लाने दो
मुझे ऐसा लगता है कि उनके साथ मेरा रिश्ता शुरू में तो पेशेवराना ही रहा, लेकिन बाद में ये धीरे धीरे निजी रिश्तों में विकसित होता गया। टीसीएस में मैंने करीब 17 साल बिताए, ये साल मेरी जवानी का बड़ा हिस्सा रहे और ये कालखंड मैंने इस विभूति के सानिध्य में बिताया।

20 साल पहले पहले मैंने अपनी कंपनी निहिलेंट लिमिटेड की स्थापना की। इस साल कंपनी ने 20 साल पूरे किए, बिना उनके मार्गदर्शन ये साहस कर पाना मुश्किल था। अक्सर मैं जब अतीत की यादों में झांकता हूं तो मुझे अचरज होता है कि आखिर क्यों मैं एक कंपनी में इतने साल बना रहा। इसका उत्तर संभवत: उन हौसलों के बीजों में छुपा है जो एफ सी कोहली ने मुझे एक उद्मी बनाने के लिए मेरे भीतर बोए और जिन्होंने मुझे कंपनी की सेवाक्षेत्र, भौगोलिक क्षेत्र और तकनीकी क्षेत्र में वृद्धि करने के लिए विस्तार दिया और मुझे एक साथ ही कई जिम्मेदारियां उठाने दीं।

मैंने हमेशा तजुर्बे को ओहदे और पैसे से ऊपर तवज्जो दी।


सबक आठजीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है सीख
अभी पिछले साल अप्रैल में ही मैं फकीर चंद कोहली और उनकी पत्नी स्वर्ण कोहली जो उनके साथ हमेशा एक मजबूत सहारे की तरह रहीं, से अपनी बेटी और नवासों के साथ मिला और उनके अलीबाग वाले घर में कुछ दिन उनके साथ रहा।

भारत देश और भारतीय आईटी उद्योग के लिए अपने और अपने लोगों के योगदान से वह हमेशा प्रसन्न और संतुष्ट दिखे। इसके बावजूद उन्होंने हार्डवेयर उद्योग के विकास में देश के पिछड़ने का अफसोस भी किया। उन्होंने हमेशा यही कहा कि सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री को भाषाओँ पर ध्यान देना चाहिए ताकि देश का विकास समेकित हो और किसी को यह न लगे कि वह पीछे छूट गया है। वह आखिर तक तकनीक के कृषि और शिक्षा में उपयोग के लिए जोश से भरे रहे।

सबक नौ: तकनीक की कामयाबी इसमें नहीं है कि इसने हमारे करियर के लिए क्या किया बल्कि इसमें है कि इसने लोगों की भलाई के लिए क्या किया और इसने देश व समाज पर क्या असर डाला

कुछ साल पहले मैंने एफ सी कोहली को पुणे स्थित अपनी ‘यूजर एक्सपीरियंस लैब’ का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने और श्रीमती कोहली ने मेरा आमंत्रण सहर्ष स्वीकार भी किया। वह मेरी कंपनी के दफ्तर आए और मेरे घर को भी अपने श्रीचरणों से पवित्र किया।
उनका जीवन उनके जीते जी एक किंवदंती रहा और उनकी ऐसी ही छोटी छोटी बातों से उनका चरित्र और उनकी आभा तो झलकती ही रही, उनका वह स्नेह भी प्रकट होता रहा जो वह अपनी जीवनयात्रा के सहयात्रियों के लिए अक्सर प्रकट किया करते थे। उन्होंने जीवन अपनी शर्तों पर जिया, लाखों लोगों के लिए उनकी यात्रा और उनकी तरक्की के रास्ते बनाए और फिर भी, दिल से वह रहे तो बस एक...फ़क़ीर।

अलविदा कोहली जी!
ओम् शांति:।।

अंतिम सबकजब ईश्वर आपके जीवन को स्पर्श करना चाहता है तो वह कोहली जी जैसे किसी देवदूत को भेजता है।

(यह आलेख पहली बार अमर उजाला की रविवारीय पत्रिका संडे मनोरंजन में प्रकाशित हुआ)

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