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ओशो: ना पैदा हुए ना मरे, कुछ समय के लिए धरती पर विचरण किया

Mon, 11 Dec 2023 11:43 AM IST
deepali agrawal दीपाली अग्रवाल
Updated Mon, 11 Dec 2023 11:43 AM IST
सार

मोरारी बापू से लेकर, धीरेन्द्र शास्त्री और सद्गुरु तक भी सभी ने ओशो की तारीफ़ के पुल बांधे हैं। ओशो को नकारना मुश्किल है, हां द्वेष और प्रेम निजी मसला है। ये बात तो वे ख़ुद भी कहते थे।

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remembering acharya rajneesh osho on his birth anniversary in hindi know interesting facts of his life
ओशो अपने जीवन काल में डेढ़ लाख से अधिक किताबें पढ़ी थीं, वे नई वैज्ञानिक खोजों पर दृष्टि जमाए रखते और अपने प्रवचनों में उनके उदाहरण देते। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

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ना कभी पैदा हुए और ना ही मरे हैं, सिर्फ़ 11 दिसम्बर 1931 से 19 जनवरी 1990 तक के लिए पृथ्वी पर भ्रमण किया।


ये ओशो के लिए समर्पित स्मृति स्टोन पर लिखा वाक्य है- 

दरअसल, ओशो को चाहने वाले आज भी उन्हें इसी तरह याद भी करते हैं जैसे वे कहीं गए ही नहीं। ये काम सोशल मीडिया और आसान किए देता है कि ढेरों वीडियो देखे जा सकते हैं। उन वीडियो में जो बातें वे कर रहे हैं, वे युवाओं को बड़ी भाती हैं, उनके बाग़ी मन को, जब नई-नई समझ पकड़ता मन दुनिया को बदलने की, रूढ़ियों को तोड़ने की चाह रखता है।

हालांकि ऐसा भी नहीं कि सिर्फ़ युवा मन ही, दबे-दबे ही सही सामाजिक लोग भी ओशो की हां में हां ही मिलाना चाहते हैं। सामाजिक इसलिए लिखा है कि ओशो समाज के लिए नहीं थे, इसलिए कई जगह से बेदखल भी किए गए पर सनद रहे कि शरीर से बेदखल कर देना विचार से बेदखल कर देना तो नहीं है तो जो लोग उनसे प्रभावित हुए उनके लिए वे प्रिय हैं, उन पर किताबें लिखी जा रही हैं, चर्चाएं की जा रही हैं, उनके बनाए सैन्टर में डायनामिक मेडिटेशन भी किया जा रहा है।

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मोरारी बापू से लेकर, धीरेन्द्र शास्त्री और सद्गुरु तक भी सभी ने ओशो की तारीफ़ के पुल बांधे हैं। ओशो को नकारना मुश्किल है, हां द्वेष और प्रेम निजी मसला है। ये बात तो वे ख़ुद भी कहते थे।

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ओशो का कहा सब कुछ वीडियो के रूप में तो दर्ज नहीं है लेकिन सौभाग्य से इतना है कि उन्हें समझा और जाना जा सके। आचार्य रजनीश से भगवान रजनीश बनने के बाद वो उनके फॉलोअर्स के लिए ओशो हो गए थे। ओशो का मतलब विराट समुद्र से एक हो जाना, दार्शनिक भाषा में इसका अर्थ है ईश्वर से है। अर्थात् ईश्वर से एकात्म की अवस्था।


अक्सर लोग पूछते हैं कि क्या ओशो एनलाइटेंड थे और जिस पर उन्होंने कहा कि जिस अदृश्य का अनुभव आप स्वयं न करे लें वह दूसरों के माध्यम से कैसे जानेंगे। अध्यात्म वही एक अनुभव देता है, वही एक अनुभूति। ओशो का कहा इसलिए और खींचता है कि उनके पास एक तार्किक दिमाग़ था और तीव्र मेधा।

ओशो अपने जीवन काल में डेढ़ लाख से अधिक किताबें पढ़ी थीं, वे नई वैज्ञानिक खोजों पर दृष्टि जमाए रखते और अपने प्रवचनों में उनके उदाहरण देते। चीनी दार्शनिकों से लेकर, भारतीय मनीषियों, जर्मन डॉक्टर और रूस के अलौकिक लोगों तक का भान उन्हें था।
 

गोपालदास नीरज, विनोद खन्ना, अमृता प्रीतम, ख़ुशवंत सिंह, सुमित्रानंदन पंत उनसे मिलने आश्रम पहुंचे। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में पकड़ रखने वाले जब ओशो मेरे प्रिय आत्मन से शुरु करते और अंदर बैठे परमात्मा को प्रणाम कर अपनी बात समाप्त करते। हज़ारों और फिर लाखों की भीड़ उन्हें सुनने आने लगी।

बंबई में दो कमरों से मकान से शुरु हुआ सफ़र पुणे की कई बीघा ज़मीन से होता हुआ अमेरिका पहुंचा। भगवान रजनीश का कम्यून जो उनके विचारों और सपनों का समाज था, उसका पूंजीवादी विस्तार हुआ। रोल्स रॉयस गाड़ियों से लेकर, महंगी घड़ी, ज्वैलरी और कपड़ों तक। बंबई की सेक्रेटरी लक्ष्मी का पद अब शीला को मिल गया। सन्यास के बाद जिसका नाम हुआ मां आनंद शीला। वे एक अच्छी टीम थे, ये शीला के शब्दों की बात है। वह ओशो के प्रेम में थीं औऱ ओशो भी उनके प्रेम में थे, उन्होंने दावा किया हालांकि किसी भी शारीरिक संबंध की बात से इंकार किया।


ओशो ने एक जगह कहा भी है-

मैं इस बात में स्पष्ट हूं कि अपनी सेक्रेटरी से शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए।


ये सब तमाम बातें उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री वाइल्ड वाइल्ड कन्ट्री में हैं। शीला और ओशो की टीम अमेरिका में जाकर टूट गई, जब वहां पूरा एक शहर रजनीशपुरम बनने के बाद शीला के शब्दों में ओशो ड्रग्स में लिप्त हो गए थे और उनकी भोग-विलास की इच्छा बढ़ती जा रही थी। शीला ने कम्यून छोड़ दिया।

इधर, ग़लत तरीके से अमेरिका में दाखिल होने और लोकल चुनावों को प्रभावित करने के आरोप में शीला की गिरफ़्तारी हुई। ओशो भी गिरफ्तार हुए, देश छोड़ने की शर्त के बदले उन्हें रिहा किया गया। शीला को लगभग साढ़े तान साल बाद छोड़ा और वो जर्मनी और फिर स्विट्ज़रलैंड में जाकर बस गईं।

ओशो भारत आ गए, उनके विचारों के कारण वे 21 देशों में बैन थे। उन्हें पुणे लौटना ही पड़ा। 5 साल बाद उनकी मृत्यु हुई, जिसके साथ अपने क़िस्से और रहस्य जुड़े हैं। लेकिन ओशो ने अपने विचारों को, सोच को, ज्ञान को लंबे समय के लिए जीवित कर दिया। वे हर उस रूढ़ि के विरुद्ध थे जो मानव के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए बाधा हो। वे विवाह के विरुद्ध थे, ख़ुद भी ताउम्र शादी नहीं की। अपनी मां से कह दिया था कि साधु बनना चाहते हैं लेकिन ब्रह्मचारी नहीं, उनकी मां स्तब्ध थीं, लेकिन ओशो अपनी राह चल पड़े, जिस कॉलेज में पढ़ाते थे वहां उनके लैक्चर में सबसे ज़्यादा भीड़ रहती, वाणी में सम्मोहन था। लोग ना उनकी बातों को काट ही पाते और ही सबके सामने स्वीकार ही कर पाते। उन्हें कॉलेज छोड़ना ही पड़ा, वे अब भारत भ्रमण पर थे। वे जगह-जगह प्रवचन करते थे, लोग खिंचे चले आते।

वे कहते- मेरे यहां हर किसी का स्वागत है-

शुरुआती दिनों में सबसे मिलते भी थे, फिर धीरे-धीरे सिमटने लगे, कुछ गिने-चुने लोग ही बहुत क़रीब जा पाते थे लेकिन कई लोग कम्यून के कामों में थे जिसमें सफ़ाई का काम, व्यवस्था का काम, अनुवाद और किताब का काम भी था। ओशो ने ख़ुद कोई किताब नहीं लिखी लेकिन उनके प्रवचनों को ही किताब का रूप दिया गया।

संभोग से संमाधि सबसे प्रसिद्ध और सबसे विवादित रही, वे सेक्स गुरु के नाम से पहचाने जाने लगे। उनके कम्यून को भी उसी नज़र से देखा जाता था। भीतर रहने वाले इसे सहमति और प्रेम की नज़र से देखते हैं।

बहरहाल, आज ओशो का जन्मदिन है। विवादों के गुरु और समाज की किरकिरी लेकिन फिर भी मौन स्वीकृति पाने वाले महान दार्शनिक ओशो, जो न पैदा हुए और न मरे हैं, तब जन्मदिन का एक दिन कैसा। 



 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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