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स्वस्थ लोकतंत्र और सुशासन के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र निर्वाचन आयोग जरूरी

Fri, 23 Feb 2024 01:09 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Fri, 23 Feb 2024 01:09 PM IST
सार

जस्टिस के.एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 2 मार्च 2023 को कुछ याचिकाओं पर फैसला दिया था कि अब राष्ट्रपति द्वारा निर्वाचन आयोग के मुख्य न्यायाधीश समेत आयुक्तों की नियुक्ति एक कमटी की सिफारिश पर की जाएगी जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा प्रधान न्यायाधीश, प्रतिपक्ष या लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता और स्पीकर शामिल होंगे।

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चुनाव सुधारों की प्रक्रिया 1951 से ही शुरू हो गई थी। - फोटो : File

विस्तार

ठीक 18वीं लोकसभा के चुनाव से पहले भारत निर्वाचन अयोग की निष्पक्षता फिर चर्चा में आ गई है। चर्चा का विषय निर्वाचन आयुक्तों के चयन से शुरू हो कर अब चुनावी बाॅड पर टिक गया है। केन्द्र सरकार ने चुनाव सुधार की प्रकृया में जिस चुनावी बाॅंड व्यवस्था को शुरू किया था उसे सर्वोच्च न्यायलय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया।

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इससे पहले मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायलय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता एक चयन समिति के गठन का अदेश पारित किया था जिसमें प्रधान न्यायाधीश के प्रतिनिधि समेत लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा में प्रतिपक्ष या सबसे बड़े दल नेता ने शामिल होना था। अदालती आदेश के क्रम में चयन समिति का कानून सरकार ने संसद से पास करा लिया है जिसमें प्रधान न्यायाधीश के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केन्द्रीय मंत्री को सदस्य बनाने का प्रावधान किया गया है।

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निर्वाचन आयुक्तों के चयन की नई व्यवस्था-

जस्टिस के.एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने 2 मार्च 2023 को कुछ याचिकाओं पर फैसला दिया था कि अब राष्ट्रपति द्वारा निर्वाचन आयोग के मुख्य न्यायाधीश समेत आयुक्तों की नियुक्ति एक कमटी की सिफारिश पर की जाएगी जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा प्रधान न्यायाधीश, प्रतिपक्ष या लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता और स्पीकर शामिल होंगे।

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आदालत का यह आदेश इस दिशा में नया कानून पास होने तक लागू रहना था, क्योंकि कानून बनाने का दायित्व अदालत का नहीं बल्कि संसद का है। इस दिशा में केन्द्र सरकार ने संसद से नया कानून पास करा दिया है। अब संसद द्वारा पारित मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 की धारा 7 में प्रावधान किया गया है कि-
 

‘‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक चयन समिति की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। समिति में (ए) प्रधान मंत्री - अध्यक्ष (बी) लोक सभा में विपक्ष के नेता - सदस्य (सी) प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री - सदस्य होंगे। हालांकि इस कानून को चुनौती देते हुए इस पर रोक लगाने की मांग एडीआर नाम के एनजीओ ने सर्वेाच्च न्यायालय से की थी जिस अदालत ने खरिज कर दिया लेकिन याचिका पर केन्द्र सरकार को नोटिस भी जारी कर दिया। अब इस मामले में अगली सुनवाई अप्रैल में होनी है।

 

सात दशक बाद भी सुधार की प्रक्रिया अधूरी-

चुनाव सुधारों की प्रक्रिया 1951 से ही शुरू हो गई थी। इसी क्रम में आयोग को निष्पक्ष बनाने एवं चुनाव में धनबल, बाहुबल जैसे अनुचित माध्यमों का इस्तेमाल रोकने के लिए 1974 में तारकुण्डे समिति से लेकर 2010 में तनखा समिति तक 8 के करीब समितियों का गठन हो चुका है। सभी ने निर्वाचन प्रक्रिया में शुचिता के लिए कई सुझाव दिए जिन पर कार्यवाही भी हुई।

जैसे इलेक्शन पीटीसन के लिए ट्रिब्यूनल में जाने के बजाय हाइकोर्ट में जाना, मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष करना, ईवीएम मशीनों का प्रयोग, मतदाता पहचान-पत्रों का चलन, दो से अधिक क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर रोक, मतदान कर्मियों को सीधे निर्वाचन आयोग के अधीन करना, चुनाव खर्च की सीमा तय करना और मतदान समाप्त होने से आधे घण्टे पहले तक एक्जिट पोल पर रोक आदि शामिल हैं।

पहले एक सदस्यीय आयोग होता था। अब दो अन्य आयुक्त भी आयोग में शामिल कर लिए गए हैं। लेकिन आयोग में सुधार के लिए जो सिफारिशें की गई थीं उन पर कार्यवाही नहीं हुई। आयोग में दो अतिरिक्त आयुक्तों की पहली बार नियुक्ति 16 अक्टूबर 1989 को हुई थी जिनका कार्यकाल बहुत ही कम 1 जनवरी 1990 तक रहा। उसके बाद 1 अक्टूबर 1993 से नियमित रूप से केन्द्र सरकार द्वारा मुख्य आयुक्त के साथ दो अन्य आयुक्त नियुक्त किए जाने लगे।

 

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election commission of india

एक के बाद एक समितियों का गठन फिर भी

तारकुंडे समिति (1974-75) के बाद दिनेश गोस्वामी समिति (1990) ने भी निर्वाचन आयोग को निष्पक्ष और दबाव मुक्त बनाने के लिए आयोग की नियुक्तियों में सरकार का एकाधिकार समाप्त करने की सिफारिश की थी। तारकुंडे समिति की सिफारिश पर मतदान की उम्र 21 से घटा कर 18 तो हो गई मगर निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार केन्द्र सरकार ने नहीं छोड़ा।

तारकुंडे समिति ने तीन सदस्यीयएक कमेटी की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति की सिफारिश की थी। इस कमेटी में प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष का नेता या विरोध पक्ष का प्रतिनिधि होना था। तारकुण्डे समिति ने निर्वाचन आयोग की सहायता के लिए केंद्र और राज्यों में स्वायत्त निर्वाचन परिषदें बनाने का भी सुझाव दिया था। इससे साथ ही अनुचित कामों पर निगरानी के लिये ‘‘मतदाता परिषद’’ के गठन का भी सुझाव दिया था।


महत्वपूर्ण थे गोस्वामी समिति के सुझाव

मई 1990 में दिनेश गोस्वामी समिति ने भी निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय निकाय बनाने का सुझाव दिया था। समिति की सिफारिश थी कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति भारत के प्रधान न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता द्वारा की जानी चाहिए और अन्य सदस्यों की नियुक्ति मुख्य निर्वाचन आयुक्त से विचार-विमर्श करके की जानी चाहिए।


समिति ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक करने की सिफारिश भी की थी। उसके बाद सरकारों ने अन्य सिफारिशें तो मान लीं मगर निर्वाचन आयोग पर सरकारी नियंत्रण हटाने की सिफारिश अब तक की सभी सरकारें टाल गईं।

वर्तमान में मुख्य निर्चाचन आयुक्त को सरकार अपनी सुविधानुसार नियुक्त करती है और उसे केवल संसद द्वारा ही हटाया जा सकता है और संसद में सत्ताधारी दल का ही बहुमत होता है।

अब तक निर्वाचन आयोग से लेकर सीएजी और लोकसेवा आयोगों में लगभग सभी संवैधानिक पदों पर केन्द्र सरकार अपने पसंद के लोगों को नियुक्त करती रही है। सवाल उठता है कि जब सीबीआई निदेशक, सूचना आयुक्त और लोकपाल/लोकायुक्त जैसे संवैधानिक पदों पर सरकार, न्यायपालिका, विधायिका और प्रतिपक्ष के नेता वाली कमेटी की सिफारिश पर नियुक्तियां हो सकती हैं तो निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियां भी इसी तरह सर्व सर्वम्मति से क्यों नहीं हो सकतीं?
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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