आपदा और पर्यावरण: आपदाओं ने असुरक्षित कर दी हिमालय की सुरक्षित गोद
पहाड़ों में त्वरित बाढ़ अक्सर बादल फटने से आती है। ये घटनाएं नई कतई नहीं हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी संख्या में काफी वृद्धि हो रही है। बारिश के बाद मिट्टी को अवशोषक के रूप में वर्षा को अवशोषित करती है। यदि लगातार बारिश होती है और मिट्टी की सोखने की क्षमता से अधिक बारिश होती है, तो यह ओवरफ्लो हो जाती है।
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हिमालय की बेहद कठिन परिस्थितियों के बावजूद सदियों से न केवल ऋषि-मुनियों और तपस्वियों बल्कि आयुद्धजीवियों और आक्रान्ताओं से सुरक्षित रहने के लिए भागे लोगों ने हिमालय की गोद में शरण लेनी शुरू की होगी। यहां की नैसर्गिक सुंदरता और शांति, उतुंग श्रृंगों, हरी-भरी घाटियों और मनोरम नैसर्गिंक दृश्यों ने भी लोगों का आकर्षित किया होगा। चिलचिलाती गर्मी से राहत के लिए ठण्डी जलवायु, जैव विविधता, स्वच्छ हवा और पानी, प्रदूषण से मुक्ति के साथ ही कई मठ मंदिरों के आध्यात्मिक लाभ ने भी लोगों को बड़े पैमाने पर आकर्षित किया होगा। लेकिन आज हिमालय सुरक्षित और सुरम्य गोद में त्वरित बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन, भूकम्प, आसमानी बिजली का गिरना, सूखा, अतिवृष्टि और जंगल की आग जैसी आपदाओं ने जीवन को जोखिम में डाल दिया है।
जलवायु परिवर्तन के दृष्परिणाम केदारनाथ, जोशीमठ, मनाली और अमरनाथ की जैसी आपदाओं के रूप में सामने आने लगे हैं। ये प्राकृतिक घटनाएं पहले भी होती थीं लेकिन अब इनकी आवृत्ति और संघातकता काफी बढ़ गई है। हिमालय वासियों को घेर रही इन आफतों के पीछे प्राकृतिक कारणों से अधिक मानवीय कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं।
बढ़ रही है आपदाओं की फ्रीक्वेंसी हिमालय पर
पहाड़ों में त्वरित बाढ़ अक्सर बादल फटने से आती है। ये घटनाएं नई कतई नहीं हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी संख्या में काफी वृद्धि हो रही है। बारिश के बाद मिट्टी को अवशोषक के रूप में वर्षा को अवशोषित करती है। यदि लगातार बारिश होती है और मिट्टी की सोखने की क्षमता से अधिक बारिश होती है, तो यह ओवरफ्लो हो जाती है।
हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन आमतौर पर प्राकृतिक कारणों से होता है, जैसे भूगर्भीय हलचल के कारण उच्च भूकंपीयता, आसानी से नष्ट होने वाली तलछटी चट्टानें, संकरी घाटियों में तीव्र गति से बहने वाली नदियां जिनमें तेज कटाव होता है और जब बोल्डर, मलबे और टूटे पेड़ों के साथ बहुत तेज गति से बहने वाली ये नदियां चलती हैं तो बहुत खतरनाक रूप ले लेती हैं। जंगल की आग और बाढ़ पूरे हिमालय में जलवायु परिवर्तन के दो प्रमुख लक्षण माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो दशकों में हिमालय में आकस्मिक बाढ़ में वृद्धि का एक प्रमुख कारण बढ़ती जा रही जंगल की आग है।
अंग्रेजों के पसंदीदा हिल स्टेशन सबसे असुरक्षित
अंग्रेज जब धीरे-धीरे हिन्दुस्तान में पांव पसार रहे थे तो उन्हें अपने तथा अपनी सेना के लिए जलवायु की दृष्टि से अनुकूल शिमला, मसूरी, नैनीताल, दार्जिलिंग और चकराता जैसे पहाड़ी नगर बसाने पड़े। अंग्रेजों ने सन् 1864 में शिमला को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया। इससे पहले 1862 में नैनीताल को नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्स की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया।
सन् 1857 की गदर के बाद तो अंग्रेजों ने इन हिल स्टेशनों को अपने तथा अपने परिवारों के लिए सबसे सुरक्षित माना। दरअसल, अंग्रेज गर्म मौसम को मलेरिया और हैजा जैसी महामारियों का कारण मानते थे। अंग्रेजों ने हिल स्टेशनों को ऐसे सैनिटोरियम के रूप में विकसित किया जहां सैनिकों को आराम करने और बीमारियों से उबरने के लिए भेजा जा सकता था। ये स्थान ब्रिटिश सरकार के लिए प्रशासनिक केंद्र के रूप में भी थे।
बढ़ती जनसंख्या ने बढ़ाया हिल स्टेशनों पर खतरा
अंग्रेजों से मुक्ति के बाद ये सभी हिल स्टेशन देश विदेश के सैलानियों की सैरगाह बनने के साथ ही व्यावसायिक केन्द्र के रूप में उभरे जहां बड़े पैमाने पर आसपास की जनसंख्या आजीविका के लिए आकर्षित हुई। अंग्रेजों ने इन हिल स्टेशनों को केवल अपनी आबादी और प्रशासनिक जरूरत के लिए बसाया था। लेकिन आजादी के तत्काल बाद ये छोटे कस्बे महानगरों की शक्ल में उभरे। छोटी सी जगहों पर हजारों की संख्या में इमारतें बन गईं।
जनसंख्या का पहाड़ी ढालों पर एक ही जगह पर केन्द्रित होने और स्थान विशेष की धारक क्षमता के चरमरा जाने के दुष्परिणाम का सबसे बड़ा उदाहरण आज हमारे सामने जोशीमठ का है। पचास साल पहले जोशीमठ की जनसंख्या कुछ सेकड़ों में थी जो कि आज 25 हजार तक पहुंच गई है। इतने लोगों के लिए बनी भारी भरकम बहुमंजिली इमारतों के बोझ और अत्यधिक जनसंख्या द्वारा पैदा किए गए मल जल आदि के जमीन में समाने के कारण जोशीमठ निरन्तर धंस रहा है।
पहाड़ों की रानियां कम असुरक्षित नहीं
खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी एवं रहने के लिए कम ढाल वाली जमीन मिल जाने के कारण पहाड़ों में अधिकांश बस्तियां पुराने सुसुप्त भूस्खलनों पर ही बसी हुई हैं। इसीलिए पहाड़ी राज्यों का 80 प्रतिशत हिस्सा अस्थिर ढलानों के कारण भूस्खलन की दृष्टि से काफी संवेदनशील है। हिमालयी क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसी बरसात गुजरती हो जब भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं में बड़़े पैमाने पर जनहानि न होती हो।
हिमालयी नगरों में जोशीमठ अकेला अपदाग्रस्त नहीं है। मसूरी और नौनीताल में अंग्रेजों द्वारा निर्मित सौ साल से भी पुराने भवन जर्जर हो रखे हैं। भूकम्प और अतिवृष्टि से ऐसे सेकड़ों जर्जर भवन कभी भी बड़ी आपदा का कारण बन सकते हैं। नैनीताल में पहला ज्ञात भूस्खलन 1866 में अल्मा पहाड़ी पर हुआ था, और 1879 में उसी स्थान पर एक बड़ा भूस्खलन हुआ था। नैनीताल में सबसे बड़ा भूस्खलन 18 सितंबर 1880 को हुआ था, जिसमें 151 लोग मलबे के नीचे दब कर मर गए थे, जिनमें लगभग सभी यूरोपियन ही थे। नैनीताल में जिस कदर आबादी बढ़ी है उससे आपदा का खतरा उतना ही अधिक बढ़ गया है।
मसूरी को भी जोशीमठ जैसा खतरा
जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित वाडिया इंस्टीट्यूट के भूवैज्ञानिकों के एक शोध अध्ययन के अनुसार मसूरी के बाटाघाट, जार्ज एवरेस्ट, केम्प्टी फॉल, खट्टापानी, लाइब्रेरी, गलोगीधार और हाथीपांव आदि भूस्खलन की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन क्षेत्रों में खण्डित या दरारों वाली चूनापत्थर की चट्टानें हैं। इनकी दरारों में बरसात में पानी भर जाने के कारण लगभग 60 डिग्री तक की ढलान वाली धरती की सतह धंसने या खिसकने लगती है।
इन भूवैज्ञानिकों ने मसूरी के आसपास के 84 वर्ग किमी क्षेत्र के अध्ययन में 15 प्रतिशत क्षेत्र का भूस्खलन की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील पाया। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 29 प्रतिशत क्षेत्र को मध्यम दर्जे का संवेदनशील और 56 प्रतिशत क्षेत्र को न्यूनतम् संवेदनशील दिखाया है।
सारे पहाड़ी नगर भूस्खलन के खतरे में
मसूरी-नैनीताल की तरह शिमला भी अत्यधिक जनसंख्या के बोझ तले दब रहा है। इसरो के भूस्खलन संवेदनशीलता एटलस में इस जिले को 61वें नम्बर पर रखा गया है। भूस्खलन के अलावा यह जिला भूकम्प की संवेदनशीलता की दृष्टि से जोन 5 और 4 में रखा गया है। इसी प्रकार कल्लू-मनाली को भूस्खलन संवेदनशीलता में 57वें और मण्डी को 16 वें स्थान पर रखा गया है। धर्मशाला भी भूस्खलन की दृष्टि से सबसे अधिक खतरे वाले नगरों में से एक है।
लगभग हर साल यह शहर बरसात में गंभीर भूस्खलन की चपेट में आ जाता है। यह शहर कांगड़ा जिले का मुख्यालय, धौलाधार पर्वतमाला के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। पश्चिम बंगाल के हिमालयी क्षेत्र दार्जिलिंग की स्थिति भी सन्तोषजनक नहीं है। यह नगर पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भूस्खलन के गंभीर खतरे की जद में हैं। सिक्किम के दक्षिणी और पश्चिमी जिले भूस्खलन खतरे की रैंकिंग में आठवें और नवें स्थान पर रखे गए हैं।
आपदाओं के लिए मानवीय कारण दोषी
दरअसल, हिमालय का पारितंत्र जितना अधिक संवेदनशील है उतना ही अधिक उस पर मानवीय दबाव बढ़ रहा है जिस कारण पर्यावरणीय सन्तुलन बिगड़ने से इस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की फ्रीक्वेंसी बढ़ती जा रही है। फरवरी के शीतकाल में धौलीगंगा में बाढ़ आ रही है और जोशीमठ भी बरसात से पहले ही धंस रहा है। इसी प्रकार केदारनाथ के कहीं ऊपर बादल फट रहा है जबकि उस क्षेत्र में बारिश की जगह केवल हिमपात होता है। आसपास के गांवों से जनसंख्या का कुछ सीमित नगरों का केन्द्रित हो जाना समस्या का बढ़ा रहा है।
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