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विचार: अंतहीन होते बैंकिंग घोटाले और आरबीआई का हालिया 'समझौता निपटान'

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RBI on June 8 released rules by which banks may enter into compromise settlements with borrowers
भारतीय रिजर्व बैंक - फोटो : Twitter

किसी भी देश की बैंकिंग प्रणाली उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। बैंकों को ज्यादा नुकसान होने से देश के हर एक शख्स पर फर्क पड़ता है क्योंकि बैंकों में जमा राशि देश के नागरिकों की होती है। जो पैसा हम-आप जमा करते हैं, बैंक उसी को लोन देकर अपना बिजनेस चलाते हैं। इस बीच 8 जून को जारी आरबीआई का हालिया सर्कुलर 'समझौता निपटान और तकनीकी राइट-ऑफ के लिए रूपरेखा' बैंकिंग प्रणाली के लिए एक हानिकारक कदम हो सकता है क्योंकि धोखाधड़ी के रूप में वर्गीकृत खातों के लिए समझौता निपटान की अनुमति देना न्याय और जवाबदेही के सिद्धांतों का अपमान है। धोखाधड़ी में लिप्त व्यवसाय या विलफुल डिफॉल्टर 12 महीने का समझौता पूरा करने के बाद नए ऋण के लिए पात्र हो सकता है।

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आरबीआई मास्टर सर्कुलर 2015 के अनुसार विलफुल डिफॉल्टर वो होता है जिसके पास संसाधन हैं लेकिन भुगतान नहीं करता। ऐसे समझौते छोटे ऋण (घर व कार लोन) के लिए तो ठीक हैं, जबकि 2015 के सर्कुलर में धोखाधड़ी वाले कर्जदारों के साथ समझौतों की बात नहीं की गई थी, अब 8 जून 2023 के सर्कुलर में धोखाधड़ी के साथ समझौते को भी शामिल कर लिया गया है। यह निश्चित रूप से घृणित है, कोई बैंक किसी ऐसे व्यक्ति के साथ समझौता कैसे कर सकता है जिसने बैंक को धोखा दिया हो?
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आरबीआई का कहना है कि ये पुराने नियम हैं जो 2007 से चले आ रहे हलांकि 2007 में आरबीआई ने एक पत्र भारतीय बैंक संघ को लिखा था कि बैंक चाहें तो ऐसा कर सकते हैं पर नवीनतम सर्कुलर सभी बैंकों को निर्देशित करता है कि ऐसा करें।

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वास्तव में धोखाधड़ी वाले कर्जदारों के साथ यह समझौता दोधारी तलवार के रूप में हो सकता है। यदि बैंक फिर लोन देता है ऐसे लोग निश्चित ही इसका दुरुपयोग करेंगे। हालांकि आरबीआई का मानना है कि बैंकों को गिरवी संपत्ति से जितना जल्दी हो सके, उतना पैसा वसूल करने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि दस साल की मुकदमेबाजी के बाद प्राप्त 200 रुपये से अधिक की कीमत आज निपटान द्वारा वसूले गए 100 रुपये है।

 

नीरज सिंघल का घोटाला

हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने भूषण स्टील लिमिटेड के प्रबंध निदेशक रहे नीरज सिंघल को 36 से ज्यादा बैंकों के साथ फ्रॉड कर  56000 करोड़ रुपये की हेराफेरी में गिरफ्तार कर लिया है। इसे देश के सबसे बड़े बैकिंग घोटाले का पर्दाफाश 2018 में हुआ था। नीरज ने 3 दर्जन से ज्यादा बैकों को 56 हजार करोड़ रुपये का चूना लगाकर इस बैंक फ्रॉड को अंजाम दिया था। लोन के लिए शेल या डमी कंपनियां बनाई गईं फिर लोन की रकम को एक शेल कंपनी से दूसरी में ट्रांसफर करके मल्टीपल इंट्रीज दिखाई गईं।

नीरज ने बैंकों से कंपनी और कारोबार के नाम पर लोन लिया, लेकिन उस रकम को खुद के लिए इस्तेमाल कर डाला। खास बात ये है कि लोन चुकाए बिना नीरज लगातार नए लोन लेते रहा और बैंक इसके लिए तैयार भी हो गए। साल 2007 से 2014 के बीच यह खेल चलता रहा। 

हर कुछ दिनों के अंतराल में हमें बैंक घोटाले का पता चलता है, जिनमें एबीजी शिपयार्ड कंपनी बैंक घोटाला, डीएचएफएल बैंक घोटाला, हर्षद मेहता घोटाला, केतन पारेख घोटाला से लेकर पीएनबी घोटाले में नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का घोटाला, शराब कारोबारी विजय माल्या का 13 बैंकों के साथ घोटाला इसके अलावा इलाहाबाद बैंक घोटाला, रोटोमेक पेन घोटाला, पीएमसी बैंक घोटाला, आरपी इन्फोसिस्टम बैंक घोटाला, सिम्भावली शुगर्स लोन घोटाला, आईसीआईसीआई बैंक घोटाले, कनिष्क गोल्ड प्राइवेट लिमिटेड लोन घोटाला और यस बैंक घोटाले प्रमुख हैं।

बड़े लोन एडवांस में धोखाधड़ी करना आसान नहीं होता फिर भी ये होते हैं। बड़े लेनदार, बैंक के अधिकारियों या कभी-कभी तीसरे पक्ष जैसे कि वकीलों या चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) तक के साथ सांठ-गांठ कर लेते हैं। किसान जब लोन नहीं चुका पाता तो बैंक उसकी जमीन नीलाम कर पूरे के पूरे पैसे वसूल कर लेते हैं। मगर उद्योगपतियों या फिर कपंनियों की बात आती है तो वही बैंक पंगू हो जाते हैं और उन्हें ये एनपीए काफी समय बाद पता लगता है।

बैंकिंग क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता

भारत में बैंकिंग को एक लिपिकीय कार्य माना जाता है और यह बड़ी विडंबना है कि भारत में किसी बैंक में बैंकर बनने के लिए आपके पास विशिष्ट कौशल होने की आवश्यकता नहीं है। बैंकिंग क्षेत्र को एक कौशल विशिष्ट क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से इसका उधार देने वाला खंड। बैंकों को उन भारतीय कंपनियों को कर्ज देते समय सतर्क रहना चाहिए, जिन्होंने विदेशों में भारी कर्ज लिया है।

बैंकों के आंतरिक और बाहरी ऑडिट सिस्टम को सख्त करने की तत्काल आवश्यकता है। 'बैड बैंक' की स्थापना ही वास्तविक समाधान नहीं है क्योंकि लोन खराब होने पर ही ये उपाय मदद कर सकते हैं लेकिन लोन खराब होने से नहीं रोकते।

ऋण विभाग के कर्मचारियों का तेज रोटेशन बहुत ही महत्वपूर्ण है। बड़ी परियोजनाओं के कड़े मूल्यांकन के लिए एक आंतरिक रेटिंग एजेंसी स्थापित करनी चाहिए। व्यापारिक परियोजनाओं के बारे में पूर्व चेतावनी संकेतों की निगरानी के लिए प्रभावी प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) को लागू करने की आवश्यकता है। आरबीआई के पास फोरेंसिक ऑडिट करने के लिए पर्यवेक्षी क्षमता का अभाव है और इसे मानव के साथ-साथ तकनीकी संसाधनों के साथ मजबूत किया जाना चाहिए।

वित्तीय लेनदेन की निगरानी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग से वित्तीय धोखाधड़ी को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। उधारकर्ताओं की पृष्ठभूमि और अन्य प्रासंगिक जमीनी वास्तविकताओं पर शाखा से इनपुट को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। 

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई करोड़ के बैंकिंग घोटाले देखें हैं और ये सिर्फ वही हैं जिनका खुलासा किया गया है जबकि कई अन्य की खोज की जानी बाकी है। बड़े कॉरपोरेट बैंड लोन को लगातार बट्टे खाते में डालने के बजाय, आरबीआई को ऋण वसूली प्रक्रियाओं में सुधार करना होगा। सरकार, आरबीआई व बैंकों को ऋण प्रबंधन पर अधिक पर्यवेक्षी निरीक्षण के साथ रोकथाम में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भारत में कई लाभकारी नीतियों और कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जाता यह आरबीआई का नया सर्कुलर भी कितनी ईमानदारी से लागू होगा या भी देखना होगा।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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