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राजस्थान बजट 2026-27: अल्पकालिक लोकप्रियता के बजाय दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता

Wed, 11 Feb 2026 03:40 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Wed, 11 Feb 2026 03:40 PM IST
सार

महिलाओं के लिए की गई घोषणाओं में भी दृष्टिकोण का बदलाव दिखता है। स्वयं सहायता समूहों को सशक्त करना, ऋण सीमा बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में बीपीओ जैसी पहल करना इस बात का संकेत है कि सरकार महिलाओं को आर्थिक प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना चाहती है।

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Rajasthan Budget 2026 Prioritizing long-term sustainability over short-term popularity
राजस्थान बजट 2026 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

राजनीति में बजट अक्सर तालियां बटोरने का अवसर बन जाता है। कुछ घोषणाएं। कुछ राहतें। कुछ मुफ्त वादे। अगले दिन सुर्खियां तैयार, लेकिन राजस्थान का वित्तीय वर्ष 2026–27 का बजट उस पुराने ढर्रे से थोड़ा अलग दिखाई देता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि यह दस्तावेज सिर्फ रकमों का हिसाब नहीं, अपितु शासन की सोच का आईना है।

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मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में प्रस्तुत इस बजट में एक स्पष्ट संदेश है, राज्य अब अल्पकालिक लोकप्रियता के बजाय दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता देगा। मुफ्त योजनाओं की राजनीतिक परंपरा से हटकर यह बजट संपत्ति निर्माण और उत्पादक निवेश की भाषा बोलता है। यही कारण है कि इसे कई विश्लेषक रेवड़ी संस्कृति पर एक वैचारिक प्रहार के रूप में देख रहे हैं।
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जब 42,000 किलोमीटर सड़कों के सुदृढ़ीकरण, नए एयरपोर्ट सर्वे या रेलवे ओवरब्रिज की बात की जाती है तो वह तुरंत जेब में पैसा डालने वाली योजना नहीं होती। उसका असर धीरे-धीरे दिखता है। व्यापार आसान होता है। परिवहन लागत घटती है।
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निवेश आकर्षित होता है। रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। यही अंतर है तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक विकास में। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मंचों से रेवड़ी संस्कृति पर चिंता जताई है। राजस्थान के इस बजट में उस सोच की प्रतिध्वनि साफ सुनाई देती है।

यहां मुफ्त बिजली या नकद प्रोत्साहन की जगह इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक आधार को मजबूत करने पर जोर है। यह भी समझना होगा कि सड़क, सिंचाई और लॉजिस्टिक्स पर किया गया निवेश सीधे किसान और छोटे व्यापारी की आय से जुड़ता है। जब बाजार तक पहुंच आसान होती है तो उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलता है। यही वास्तविक सशक्तीकरण है।

बजट का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष युवाओं पर उसका फोकस है। बेरोजगारी भत्ते के स्थान पर स्वरोजगार को बढ़ावा देना एक नीतिगत बदलाव है। मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना के तहत ब्याज-मुक्त ऋण की व्यवस्था युवाओं को उद्यमिता की ओर प्रेरित करती है। संदेश साफ है, सरकार बैसाखी नहीं, मंच देगी।

इसके साथ ही, कौशल विकास, औद्योगिक प्रशिक्षण और स्थानीय उद्योगों से जोड़ने की योजनाएं यह संकेत देती हैं कि राज्य केवल डिग्रीधारी युवाओं की नहीं, हुनरमंद युवाओं की भी चिंता कर रहा है। यदि इन पहलों का सही क्रियान्वयन होता है तो राजस्थान नौकरी खोजने वाला नहीं, नौकरी देने वाला राज्य बन सकता है।

परीक्षाओं में पारदर्शिता के लिए राज्य स्तरीय टेस्टिंग एजेंसी का गठन भी महत्वपूर्ण है। पेपर लीक जैसी घटनाओं से युवाओं का भरोसा डगमगाया था। उसे पुनर्स्थापित करना केवल प्रशासनिक नहीं, नैतिक जिम्मेदारी भी है। पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया किसी भी समाज में विश्वास का आधार बनती है।

महिलाओं के लिए की गई घोषणाओं में भी दृष्टिकोण का बदलाव दिखता है। स्वयं सहायता समूहों को सशक्त करना, ऋण सीमा बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में बीपीओ जैसी पहल करना इस बात का संकेत है कि सरकार महिलाओं को आर्थिक प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना चाहती है।

यह केवल आय बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की शुरुआत है। जब ग्रामीण महिला आर्थिक रूप से सक्षम होती है, तो परिवार की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार महिला सशक्तीकरण का लाभ पीढ़ियों तक जाता है।

दस्तावेज के बिना इलाज जैसी व्यवस्था प्रशासनिक जटिलताओं को कम करने की कोशिश है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष प्रावधान यह स्वीकार करते हैं कि विकास केवल सड़कों और उद्योगों का नाम नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का भी प्रश्न है।

ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा किसी भी कल्याणकारी राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी होती है। यदि स्वास्थ्य ढांचा मजबूत होता है, तो श्रम उत्पादकता बढ़ती है और सामाजिक स्थिरता भी सुनिश्चित होती है।

मरुस्थलीय प्रदेश में पानी केवल सुविधा नहीं, जीवन का आधार है। जल योजनाओं और सोलर ऊर्जा पर जोर यह दर्शाता है कि बजट केवल आज नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सोच रहा है। वर्षा जल संचयन, पाइपलाइन विस्तार और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स जैसे कदम संसाधनों के टिकाऊ उपयोग की दिशा में संकेत देते हैं।

राजस्थान जैसे राज्य के लिए जल और ऊर्जा सुरक्षा विकास की पूर्वशर्त है। यदि इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता आती है तो उद्योग, कृषि और पर्यटन, तीनों क्षेत्रों को नई गति मिल सकती है।

राजस्थान पर कर्ज का दबाव है। ऐसे में लोकप्रिय घोषणाओं के बजाय वित्तीय संतुलन पर ध्यान देना आसान निर्णय नहीं होता, लेकिन यही परिपक्व शासन की पहचान है। बजट में राजकोषीय अनुशासन और पूंजीगत व्यय के बीच संतुलन बनाने का प्रयास दिखता है।

विकास दर और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने का लक्ष्य उत्पादन और निवेश के विस्तार से जुड़ा है, न कि केवल वितरण से। यह दीर्घकालिक सोच राज्य को आर्थिक स्थिरता प्रदान कर सकती है।

यह बजट राजनीति की भाषा बदलने की कोशिश है। यह बताता है कि सुशासन केवल योजनाओं की संख्या से नहीं, उनके प्रभाव से मापा जाता है। राजस्थान का यह प्रयास सफल होगा या नहीं, यह समय बताएगा, परंतु दिशा स्पष्ट है, मुफ्त वितरण की राजनीति से हटकर क्षमता निर्माण की ओर बढ़ना।

यदि यह मॉडल धरातल पर सफल होता है, तो यह अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। अंततः विकास का असली अर्थ यही है कि नागरिक आत्मनिर्भर बनें, राज्य सक्षम बने और भविष्य सुरक्षित हो। राजस्थान का यह बजट उसी सोच की ओर एक ठोस कदम प्रतीत होता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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