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स्मृति शेष: राहत भाई अपने साथ पूरा इंदौर लेकर चलते थे...

Wed, 12 Aug 2020 08:12 PM IST
Harish Mishra हरीश मिश्रा
Updated Wed, 12 Aug 2020 08:12 PM IST
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rahat indori death date news shayari indore famous shayar kumar vishwas and rahat indori
मशहूर शायर राहत इंदौरी के चाहने वाले पूरी दुनिया में रहे हैं- फाइल फोटो - फोटो : self

मशहूर शायर राहत इंदौरी के चाहने वाले पूरी दुनिया में रहे हैं। दुबई में उनका एक और घर हुआ करता था और जब भी वह दुबई आते और जब तक वहां रहते, उनकी खिदमत करने का जिम्मा मेरे पास ही हुआ करता था। इंदौर में वह खुद कहते थे कि उनका एक ही दोस्त हुआ और वह हैं चंदू मिश्रा। मेरे चचेरे बड़े भाई और इसी लिहाज से जब वह दुबई पहुंचते तो एयरपोर्ट से निकलते ही पूछते, हरीश कहां है?

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ये सिलसिला आज का नहीं बरसों पुराना है। इंदौर की मुलाकातें तो पहले भी यादें ही थीं, लेकिन बरसों पहले दुबई आ बसने के बाद भी वह मेरे लिए इंदौर लेकर आते थे। इंदौर क्या है, ये हर कोई जान नहीं सकता। इसके लिए उसे या तो इंदौर जाना होगा, या किसी इंदौरी से मिलना होगा। राहत इंदौरी ऐसे ही एक शख्स का नाम है जो अपने साथ इंदौर लेकर चलता था।
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राहत इंदौरी के इंतकाल पर हर वो आंख रोई या नम हुई है, जिसको कविता या शायरी से जरा भी मोहब्बत रही है। कवि सम्मेलनों और मुशायरों के बीच राहत इंदौरी एक पुल का काम करते थे। वह चले गए हैं तो अब इस हुनर का बस एक ही फनकार बचा है, मुनव्वर राणा।
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इन दोनों ने हिंदुस्तान की गंगा जमुना तहजीब को पूरी दुनिया में फैलाया है। राहत इंदौरी के भीतर एक सच्चा इंसान रहता था, वह शायर तो बहुत बड़े थे ही, दिल भी उनका बहुत बड़ा था।

ये सच है कि पिछले कुछ साल से राहत इंदौरी ने ऐसी शायरी करनी शुरू कर दी थी जो हुक्मरानों को नागवार गुजरने लगी। उन्हें उनकी ही बिरादरी के लोगों ने ट्रोल करना शुरू कर दिया। लेकिन, सियासत से अगर लेखक, कवि और पत्रकार ही सवाल नहीं करेंगे तो फिर ये करेंगे क्या। सत्ता की तारीफ करना एक सच्चे शायर का काम नहीं है, उसके लिए पहले दरबारों में चारण रखे जाते थे।

एक और वाक्या उनकी मशहूर गजल का है, जिसके पहले शेर का मतला है, ‘बुलाती है मगर जाने का नहीं।’ तमाम लोग इसे लिखते समय नईं कर देते हैं। अपने एक मुशायरे में राहत साब ने इसका फर्क भी समझाया था। उन्होंने बताया था कि नहीं का उच्चारण उर्दू में नईं है, लेकिन देवनागरी में लिखना हो तो नहीं ही लिखना ठीक होगा।

राहत इंदौरी के साथ मुझे दसियों बार वक्त गुजारने का मौका मिला। कुमार विश्वास मेरे पारिवारिक मित्र हैं, कभी राहत साहब उनके साथ मिले तो कभी उनके बगैर लेकिन मेरे लिए वह हमेशा मेरे बड़े भाई के दोस्त रहे और मैंने भी उन्हें हमेशा अपना बड़ा भाई ही माना।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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