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भारत छोड़ो आंदोलन: गुुमनाम रह गए अगस्त क्रांति को नाम देने वाले यूसुफ मेहर अली

Wed, 09 Aug 2023 12:01 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Wed, 09 Aug 2023 12:01 PM IST
सार

आजादी के लिए सम्पूर्ण भारत को आन्दोलित करने वाले इस आन्दोलन को अगस्त क्रांति भी कहा जाता है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा या याद होगा कि इस कालजयी नाम ‘‘भारत छोड़ो’’ शब्दों को गढ़ने वाले गांधी जी नहीं बल्कि तत्कालीन बंम्बई के मेयर यूसुफ मेहर अली थे। यही मेहर अली ‘‘साइमन कमीशन गो बैक’’ का नारा देने वाले भी थे।
 

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Quit India Movement in 8 august 1942 and life of yusuf meherally
यूसुफ मेहर अली ने गांधीजी को एक धनुष भेंट किया जिसपर “क्विट इंडिया’’ याने कि भारत छोड़ो गुदा हुआ था। गांधी ने कहा, “आमीन” (ऐसा ही हो)। और इसी से अगस्त क्रांति का नामकरण हो गया। - फोटो : FACEBOOK

विस्तार

सारा संसार जाता है कि भारत पर लगभग दो सदियों तक हुकूमत करने वाली अंग्रेजशाही के खिलाफ चला अंतिम और निर्णायक आन्दोलन ’’भारत छोड़ो’’ या ’’क्विट इंडिया’’ था। आजादी के लिए सम्पूर्ण भारत को आन्दोलित करने वाले इस आन्दोलन को अगस्त क्रांति भी कहा जाता है। इस आन्दोलन से उत्पन्न चेतना के परिणामस्वरूप ही 1946 में नोसेना का विद्रोह हुआ, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन पर और भयंकर चोट की।

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दरअसल, इस आन्दोलन तथा कुछ अन्य गतिविधियों के परिणामस्वरूप ही युद्ध के बाद अमेरिका तथा इंग्लैण्ड में लोकमत भारत के पक्ष में इतना अधिक हो गया कि ब्रिटेन को विवश होकर भारत छोड़ना ही पड़ा। इस आन्दोलन को नाम देने वाले निश्चित रूप से महात्मा गांधी थे। लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा या याद होगा कि इस कालजयी नाम ‘‘भारत छोड़ो’’ शब्दों को गढ़ने वाले गांधी जी नहीं बल्कि तत्कालीन बंम्बई के मेयर यूसुफ मेहर अली थे। यही मेहर अली ‘‘साइमन कमीशन गो बैक’’ का नारा देने वाले भी थे।

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भारत छोड़ो आन्दोलन का नामकरण

 

जी. गोपालस्वामी ने अपनी पुस्तक ’’गांधी एण्ड बम्बई’’ में  शांति कुमार मोरारजी का उद्धरित करते हुए लिखा है-

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’’ गांधी ने बंबई में अपने साहियोगियों से चर्चा की कि स्वतंत्रता के लिए सबसे बेहतर नारा क्या रहेगा। किसी ने कहा “गेट आउट” (चले जाओ) लेकिन गांधी का मानना था यह शिष्ट नहीं है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने “रिट्रीट” एवं ‘‘विदड्रा” सुझाया लेकिन गांधी जी को यह भी जमा नहीं। तब यूसुफ मेहर अली ने गांधीजी को एक धनुष भेंट किया जिसपर “क्विट इंडिया’’ याने कि भारत छोड़ो गुदा हुआ था। गांधी ने कहा, “आमीन” (ऐसा ही हो)। और इसी से अगस्त क्रांति का नामकरण हो गया।

 

Quit India Movement in 8 august 1942 and life of yusuf meherally
यूसुफ मेहरअली - फोटो : Twitter

एक लाख से अधिक भारतवासी जेलों में ठूंसे गए

दरअसल, सम्पूर्ण आजादी के लिए क्रिस्प कमीशन के प्रस्तावों को ठुकराने के बाद 14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक निर्णय हुआ था कि अंग्रेजों को तुरंत देश की बागडोर भारतवासियों को सौंप देनी चाहिए। जबकि क्रिस्प कमीशन न केवल भारत को एक उपनिवेश का दर्जा देने और रियासतों को मनमानी की आजादी का प्रस्ताव लाया था।

कांग्रेस के सम्पूर्ण आजादी के इस निर्णय के एक महीने के भीतर ही यानी 7 अगस्त को मुंबई में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक हुई और 8 अगस्त को गोवालिया टैंक मैदान में आयोजित ऐतिहासिक बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव की घोषणा कर दी गई।

अगले दिन चारों बड़े नेताओं, गांधी, नेहरू, पटेल और आजाद समेत नेतृत्व की पहली लाइन के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। यही नहीं अखिल भारतीय कांग्रेस और 4 प्रान्तीय कांग्रेस कमेटियों को क्रिमिनल लॉ एमेडमेंड एक्ट 1908 के तहत गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। डिफेंस ऑफ इंडिया रूल 56 के तहत सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद सारा देश उद्विग्न हो उठा।



कांग्रेस नेताओं के जेल के अन्दर होने के कारण समाजवादियों और नौजवानों ने आन्दोलन को और भड़काया। जबकि मोहम्मद अली जिन्ना और दमोदर सावरकर ने आन्दोलन का साथ नहीं दिया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तो आन्दोलन को कठोरता से दबाने के लिये बंगाल के गवर्नर जॉन हरबर्ट को पत्र तक लिखा। इस आन्दोलन में 1 लाख से अधिक भारतवासी गिरफ्तार कर जेलों में ठूंसे गये और सेकड़ों ने प्राणों की आहुति दी।


‘‘साइमन कमीशन गो बैक’’ का नारा भी अली ने ही दिया

केवल भारत छोड़ो ही नहीं बल्कि साइमन कमीशन का विरोध करने के लिए ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ने जो अभियान शुरू किया था उसका नाम ’’साइमन कमीशन गो बैक’’ भी मेहर अली ने ही सुझाया था। दरअसल, कांग्रेस दिसम्बर 1927 में साइमन कमीशन का वहिष्कार करने का फैसला कर चुकी थी। इसी आन्दोलन के दौरान 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में हुए बर्बर लाठी चार्ज के दौरान लाला लाजपत राय शहीद हुए थे।

लाला जी की मृत्यु से पूरे देश में इस दमन के खिलाफ रोष की लहर दौड़ गई। यूसुफ मेहर अली को इसके बाद ही पहली बार जेल में डाला गया, जो उनके जेल जाने की श्रृंखला की शरुआत थी। इसके बाद उन्होने दांडी मार्च में योगदान दिया जिससे ब्रिटिश सरकार इतनी चिढ़ी कि उन्हें जेल ही नहीं भेजा, बल्कि उनसे वकालत करने का अधिकार भी छीन लिया गया।

 

Quit India Movement in 8 august 1942 and life of yusuf meherally
भले ही आज यूसुफ मेहर अली गुमनामी में चले गए हों मगर वह भारत के प्रमुख स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में से एक थे। - फोटो : अमर उजाला

आजादी के आन्दोलन के प्रमुख नेताओं में से थे यूसुफ मेहर अली

भले ही आज यूसुफ मेहर अली गुमनामी में चले गए हों मगर वह भारत के प्रमुख स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में से एक थे। इतिहास में मेहर अली को एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी, एक समाजवादी नेता और श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक न्याय के चौंपियन के रूप में याद किया जाता रहेगा। उनकी विरासत उन व्यक्तियों को प्रेरित करती रहती है जो न्यायसंगत और न्यायसंगत समाज के लिए काम करने के लिए समर्पित हैं। 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद भी मेहर अली ने सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए काम करना जारी रखा।

दरअसल, यूसुफ मेहर अली एक समाजवादी विचारधारा वाले राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें 1942 में बॉम्बे का मेयर तब चुना गया था, जब वह एक स्वाधीनता सेनानी के रूप में यरवदा सेंट्रल जेल में कैद थे। वह नेशनल मिलीशिया, बॉम्बे यूथ लीग और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक थे, और उन्होंने कई किसान और ट्रेड यूनियन आंदोलनों में भूमिका निभाई।

मेहर अली का झुकाव समाज में मजदूरों और किसानों के हितों को बढ़ावा देने की ओर हुआ, इसीलिए 1934 में जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी आदि के साथ उन्होंने काँग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की।


समाजवादी आदर्शों के प्रति भी प्रतिबद्ध थे यूसुफ अली

 

यूसुफ मेहरअली का जन्म 23 सितम्बर 1903 को बॉम्बे (अब मुंबई), में हुआ था। वह एक सम्पन्न पृष्ठभूमि से आते थे। वह अपने व्यवसायी पिता के विचारों के विपरीत अंग्रेजी शासन के घोर विरोधी रहे। उन्होंने कलकत्ता और मुम्बई से अपनी शिक्षा प्राप्त की। यूसुफ ने सन 1920 में दसवीं की परीक्षा तथा 1925 में स्नात्तक की परीक्षा उत्तीर्ण की।


उन्होंने बॉम्बे के विल्सन कॉलेज से कानून में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। मेहर अली महात्मा गांधी के अहिंसक प्रतिरोध और सामाजिक समानता के दर्शन से बहुत प्रभावित थे।

स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अपने समर्पण के साथ-साथ, मेहर अली समाजवादी आदर्शों के प्रति भी प्रतिबद्ध थे। वह आर्थिक समानता में विश्वास करते थे और श्रमिक वर्ग और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के सामने आने वाले मुद्दों के समाधान के लिए काम करते थे। वह इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) से जुड़े थे और श्रमिकों के अधिकारों की वकालत करते थे। दुर्भाग्य से, 31 मई, 1950 को 47 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।  

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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