फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Pushpa Kamal Dahal Heads New Government in Nepal, know about his international strategies

नेपाल में नई सरकार का गठन: भारत के साथ संबंधों पर कैसा होगा असर?

Sat, 31 Dec 2022 04:51 PM IST
Amiy bhushan अमिय भूषण
Updated Sat, 31 Dec 2022 04:51 PM IST
सार

20 नवंबर को हुए संसदीय चुनाव के करीब 35 दिन बाद नई सरकार गठन के साथ पूर्वानुमानों पर अब विराम लग चुका है। एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में तय समय सीमा समाप्ती के अंतिम घंटे में पूर्व माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इन्हें अन्य पांच दलों को मिलाकर कुल 165 सांसदों का समर्थन प्राप्त है।

विज्ञापन
Pushpa Kamal Dahal Heads New Government in Nepal, know about his international strategies
नेपाल में पुष्प कमल दहल प्रचंड नए प्रधानमंत्री नियुक्त - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नेपाल में नई सरकार का गठन हो चुका है। 20 नवंबर को हुए संसदीय चुनाव के करीब 35 दिन बाद नई सरकार गठन के साथ पूर्वानुमानों पर अब विराम लग चुका है। एक चौंकाने वाले घटनाक्रम में तय समय सीमा समाप्ती के अंतिम घंटे में पूर्व माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इन्हें अन्य पांच दलों को मिलाकर कुल 165 सांसदों का समर्थन प्राप्त है।

विज्ञापन


नेपाल के 275 सदस्यीय सदन में इस चुनाव के दौरान किसी भी राजनैतिक दल को बहुमत नहीं मिला है। वहीं चुनाव पूर्व के गठबंधन भी इन आंकड़ों से दूर थे। ऐसे में चुनाव बाद सरकार गठन को लेकर शतरंजी बिसातें बिछनी तय थीं। जिसमें बाजी महज 32 सीटों को जीतकर आने वाले प्रचंड ने मारी है। चुनाव पूर्व नेपाली कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा रहे प्रचंड अब पुनः एमाले के साथ हैं। इस नए गठबंधन में सरकार का नेतृत्व  ढाई साल के लिए प्रचंड तो अगले ढाई वर्ष ओली के पास रहेगा।

विज्ञापन


ओली की सत्ता में पकड़

वामपंथी धड़े की पिछली सरकार में एमाले मुखिया ओली द्वारा समझौते के अनुसार प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ने के नाते प्रचंड अलग हुए थे। फिलहाल इस शह-मात के असली विजेता केपी ओली हैं। दरअसल इस बहाने उन्होंने न केवल सबसे बड़े संसदीय दल नेपाली कांग्रेस के सरकार बनाने की पहल को रोक दिया. बल्कि इस बहाने पुनः एक बार वामपंथी धरों को भी एकजुट किया है।  

विज्ञापन
विज्ञापन


वहीं इस सरकार की असली शक्ति इन्हीं के हाथ में रहनी है, क्योंकि इस सरकार गठन के साथ ही राष्ट्रपति और स्पीकर का अहम पद ओली की पार्टी के पास रहना है। पिछली सरकार में इन पदों पर बैठे अपने प्रतिनिधियों  द्वारा इन्होंने अपने मन की भरपूर चलाई थी।

वैसे इस सरकार के ओर से नियुक्त होने वाले राजदूतों में भी ओली के पसंद की चर्चा है। ऐसे में कुल मिलाकर नई सरकार के देश से विदेश नीति तक ओली प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। दरसल इसका एक और कारण है। नेपाल के संसदीय चुनावों संग प्रांतीय सदन के चुनाव भी हुए हैं। यहां के सात प्रदेशों का दृश्य बिल्कुल केंद्रीय सदन सा है। कहीं किसी दल को बहुमत नही हैं।

एमाले तीन प्रदेशों मे आगें तो एक में कांग्रेस से महज एक सीट कम है। ऐसे में नेपाल के गैर कांग्रेस दलों द्वारा प्रदेशों में सत्ता सुख के एकमात्र पूर्तिकर्ता ओली ही हैं। जहां तक प्रधानमंत्री के तौर पर माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड की सोचें तो यह उनकी तीसरी ताजपोशी है। इससे पूर्व 2008 से 2009 और फिर 2016 से 2017 तक वो इस पद पर सत्तासीन रहे हैं।

वामपंथी गठबंधन सरकार और भारत का संबंध

भारत के इस पड़ोसी हिमालई राज्य में राजशाही के पतन और नवीन शासन व्यवस्था का कारण इनका माओवादी आंदोलन माना जाता है। वैसे एक माओवादी नेता के तौर पर इनके चीन से जुड़ाव लगाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।  

प्रधानमंत्री के तौर पर इनके पूर्व कार्यकाल की पहली आधिकारिक यात्रा भी चीन की रही है। जबकि परंपरानुसार नेपाल के हर नए हुक्मरान पहली यात्रा भारत भूमि की ही करते रहे हैं। वैसे पिछली वामपंथी गठबंधन सरकार में ओली के प्रबल भारत विरोधी तेवर से दूरी और चीनी पहल बावजूद गठबंधन सरकार से समर्थन वापसी शायद बदलाव के संकेत हों। वैसे प्रचंड द्वारा लोकतांत्रिक कांग्रेस संग सरकार पिछली सरकार में होना और इस बीच दिल्ली की यात्राओं से भी उनके सोच में कही अधिक लचीलापन दिखता है।

अपनी दिल्ली यात्रा में इस हार्डकोर माओवादी नेता ने बीजेपी जैसे भगवा पार्टी के दफ्तर जाकर चौंका दिया था। अब चूंकी वो सरकार के मुखिया हैं ऐसे में उनके द्वारा नेपाल में लोकतांत्रिक संस्थानों की मजबूती और भारत को लेकर उदार सोच ही बदलाव के वास्तविक वाहक होंगे। वैसे नेपाल में जन आकांक्षाओं की पूर्ति और पड़ोसी भारत-चीन संग एक संतुलित रिश्ते का तालमेल उनके लिए सफलता का पैमाना होगा। किंतु ये इतना भी आसान नहीं है क्योंकि यहां हर बात भारत विरोध भड़कता और सीनों में पलता रहता है।

Pushpa Kamal Dahal Heads New Government in Nepal, know about his international strategies
भारत-नेपाल संबंध - फोटो : Twitter

भारत-नेपाल का संबंध

ओली के प्रभाव के नाते भारत संग सीमा विवाद को हवा भी दिया जा सकता है। वहीं चीन समर्थक वामपंथी धरों के सत्ता साझीदार होने नाते पूर्व में बने एमिनेंट पर्सन ग्रुप प्रस्तावों पर भारत को सहमति हेतु पुनः दबाब दिया जा सकता है। इसके अंतर्गत भारत नेपाल रिश्तों की डोर सन् 1950 की द्विपक्षीय संधि के समापन तथा सीमा पर बाड़ लगाने की योजना है।

जहां लाखों नेपाली नागरिक भारत में सरकारी, निजी-नौकरी और व्यापार में हैं। वही यहां नेपाली भाषी नागरिकों की भी एक बड़ी आबादी है। अब तक दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के यहां बे-रोक-टोक धार्मिक यात्राएं और विवाह करते रहे हैं। ऐसा होने से सीमा के दोनों ओर होने वाली सहज यात्राएं, विवाह और व्यापार सभी कुछ प्रभावित होगा।किंतु ओली समर्थन पर टिकी सरकार में प्रचंड कितना कुछ इन बदलाव ला पाएंगे और कितना कुछ इन व्यर्थ के विवादों को दूर रख पाएंगे फिलहाल कहना कही अधिक कठिन है।
 

वैसे नेपाल के इस नई सरकार गठन के घटनाक्रम को चीन भारत के हवाले से देखें तो फिलहाल चीन कहीं अधिक सफल है। उसने पिछले अनुभवों से सीखते हुए बिना किसी शोर अपने लिए कहीं अधिक अनुकूलता प्राप्त किया है। इसके उलट भारतीय राजनयिक बेवजह सक्रिय दिख रहे थे। इस नाते चुनाव से लेकर चुनाव बाद तक की परिस्थितियों तक में यहां भारत को लेकर नकारात्मक खबरें चलती रहीं।


वैसे चुनाव से सरकार गठन तक में पैन हान संग पैन इस्लाम की महती भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है। बिना शोर इनका पूरा जोर रहा है। जिस नाते संख्या बल में नेपाल कांग्रेस प्रथम होकर भी सरकार से बाहर है, इसके  मत प्रतिशत में भी गिरावट आया है जबकि वामपंथी दलों का मत प्रतिशत ज्यों का त्यों है।

बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी का एकमुश्त वोट वाम दलों को गया है या फिर छदम प्रगतिशील पहचान के साथ बनी रास्वपा जैसी नई पार्टी को मिला है। नेपाली मूल के अप्रवासी अमेरिकी पत्रकार रवि लामे छाने की इस पार्टी को नेपाल में तेजी से बढ़ रहे मुस्लिम ईसाई समुदाय का भी भरपूर मत मिला है। अब वे नई सरकार के गृहमंत्री हैं।

इस सब के बीच उनकी नागरिकता पर सवाल है जिसकी सुनवाई अगले हफ्ते सर्वोच्च न्यायालय में होनी है।वैसे लोकतांत्रिक मूल्यों वाली नेपाली कांग्रेस का सत्ता में ना आ पाना भारत-अमेरिका जैसे उदार जनतांत्रिक देशों  के साथ मधुर संबंधों के लिए अनुकूल नहीं जान पड़ रहा है। नेपाल के आर्थिक स्थिति का डांवरडोल होना महंगाई संग बैकों का खस्ता हाल भी भारत के पड़ोस में एक नई लंका को जन्म दे सकती है।

लबेरेज अर्थव्यवस्था और तेजी से मादकद्रव्यों के खेती एवं उत्पादन के नाते नेपाल पड़ोस का श्रीलंका अफगानिस्तान भी हो सकता है। ऐसे में भारत को इन स्थितियों पर भी नजर रखने और विचार करनते हुए फिलहाल नेपाल-भारत संबंध एवं हित-नाते पर गौर करने की जरूरत है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed