दूसरा पहलू: एक परंपरा, जो सिखाती है प्रकृति से दोस्ती करना
हलमा जैसी जनजातीय परंपराएं पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने का सबसे अच्छा जरिया हैं। आज जब ‘ईको-फ्रेंडली’ शब्द बाजार का नारा बन गया है, तब हलमा ऐसी जीवन पद्धति की याद दिलाता है, जो बिना प्रचार के पर्यावरण की रक्षा करती है।
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पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण की योजनाओं और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने की रणनीतियों में उलझी है। वहीं भारत की जनजातीय परंपराओं में हलमा जैसी व्यवस्था सिखा रही है कि प्रकृति से कैसे रिश्ते निभाए जाते हैं। हलमा केवल खेत जोतने की एक सहकारी प्रथा नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन-दर्शन है, जिसमें मिट्टी, मनुष्य और समाज का सामंजस्य शामिल है। आज जब ‘ईको-फ्रेंडली’ शब्द बाजार का नारा बन गया है, तब हलमा एक ऐसी जीवन-पद्धति की याद दिलाता है, जो बिना प्रचार के पर्यावरण की रक्षा करता है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश के कई आदिवासी समुदायों में प्रचलित यह परंपरा बताती है कि ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ कोई नई खोज नहीं, बल्कि हमारे लोक जीवन का हिस्सा है। हलमा का मतलब है, जब कोई किसान अकेले अपने खेत की बुआई या सिंचाई न कर सके, तो पूरा गांव बिना पैसे, बिना मजदूरी के उसकी मदद के लिए आगे आए। इसमें श्रमदान, सामूहिकता और प्रकृति के प्रति सम्मान भी शामिल है।
इस प्रक्रिया में खेत की मिट्टी को विश्राम देने, फसल चक्र के अनुसार बुआई करने और पारंपरिक बीजों को बोने की समझ लोकजीवन में गहराई से मौजूद है। रासायनिक खाद या मशीनों का इस्तेमाल न होने से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता है। हलमा की खेती में बैल, हल और मानव श्रम का उपयोग होता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन नहीं के बराबर होता है। आज जब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान बढ़ रहा है, पानी के स्रोत सूख रहे हैं और भूमि बंजर हो रही है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है, क्या हम कुछ भूल तो नहीं गए? हलमा जैसी परंपराएं बताती हैं कि प्रकृति से सामंजस्य बैठाने के लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की नहीं, बल्कि एकजुट मन और समर्पित समाज की जरूरत होती है।
हलमा केवल काम करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्सव है। इस दौरान न कोई शोरगुल, न प्रदूषण। खेतों में काम करते हुए लोग प्रकृति के साथ संवाद करते हैं। हालांकि, यह संवाद मशीनों के शोर में कहीं खो गया है। आजकल जब सीएसआर, एसडीजी और ग्रीन इनिशिएटिव जैसी वैश्विक अवधारणाएं चलन में हैं, तब हलमा एक स्थानीय समाधान बनकर उभर सकता है। यह एक ‘ग्लोबल सॉल्यूशन इन लोकल कल्चर’ है। परंतु अफसोस कि यह प्रथा धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। कुछ जगहों को छोड़ दें, तो आज हलमा लोक साहित्य में रह गया है, जबकि हलमा केवल अतीत की नहीं, भविष्य की भी आवाज है, बस उसे सुनने के लिए हमें शोर से बाहर निकलना होगा।