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कितनी आसान है भाजपा के लिए एक देश एक कानून की राह?

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Sat, 10 Aug 2019 05:20 PM IST
संसद में 371 को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
संसद में 371 को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। - फोटो : PTI
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नरेन्द्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के बारे में एक बेहद साहसिक कदम उठाते हुए बहुचर्चित धारा 370 की विभेदकारी उपधारा दो और तीन को तो संवैधानिक तरीकों से सदा के लिए दफन कर दिया। लेकिन अगर कोई कहे कि केन्द्र सरकार के इस क्रांतिकारी कदम से एक देश एक कानून का राज स्थापित हो गया तो यह महज गलतफहमी ही होगी।
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वास्तव में अब एक देश और दो संविधान भले ही नहीं रह गए हों मगर धारा 371 जैसा कानून अब भी मौजूद है जिसके अंदर एक नहीं बल्कि अनेक व्यवस्थाएं हैं। स्थिति यह है कि किसी राज्य के लिए यह अनुच्छेद वरदान है तो दूसरे राज्य के लोग उसे अभिश्राप बता रहे हैं। यह धारा नागालैण्ड और मिजोरम जैसे राज्यों के लिए वरदान है तो अरुणाचल के लोग इसे अभिश्राप मान रहे हैं।

सवाल केवल धारा 371 का ही नहीं है। सवाल संविधान की अनुसूची 6 के राज्यों के लिए स्वायत्तशसी परिषदों  के जैसे संवैधानिक प्रावधानों का भी है। इन क्षेत्रों में संविधान का 73वां और 74वां संशोधन लागू नहीं होता। इसी तरह अनुसूची पांच के क्षेत्रों में भी संविधान के 73वें संशोधन के बाद भी अलग प्रावधान हैं। ऐसी स्थिति में एक देश एक कानून का दावा कहां ठहरता है?

धारा 371 कुछ राज्यों पर बोझ तो कुछ का विशेषाधिकार
संविधान के अनुच्छेद 371-ए के तहत नागालैंण्ड तथा 371-जी के तहत मिजोरम के नागरिकों को उनके धार्मिक कानूनों, रीति-रिवाजों और यहां तक कि उनकी परम्परागत न्याय प्रणाली को मान्यता दी गई है और संसद को इन परम्पराओं के अधिकारों को सीमित करने का अधिकार बहुत सीमित रखा गया है।

अरुणाचल विधानसभा ने सितंबर 2013 में एक संकल्प पारित कर संविधान में संशोधन कर इस प्रदेश को भी नागालैण्ड और मिजोरम की तरह 371 का संवैधानिक दर्जा देने का प्रस्ताव पारित कर उसे केन्द्रीय गृह मंत्रालय को भेजा था। अरुणाचल का गठन 24वें राज्य के रूप में 1987 में हुआ और तब से लेकर निरन्तर वहां लागू धारा 371-एच को समाप्त कर 371-ए और 371-जी की तरह जनजातियों के परम्परागत रीति-रिवाजों, धार्मिक परम्पराओं और परम्परागत पंचायतों को मान्यता देने की मांग की जाती रही है।

अरुणाचल जिसे कभी नॉर्थ फ्रण्टियर ऐजेंसी  (नेफा) भी कहा जाता था, सामरिक दृष्टि से बहुत संवेदनशील होने के साथ ही यहां अपातानी, अबोर, डाफला, गैलॉन्ग, मोम्बा, शेरडुकपेन, सिंगफो जैसी कम से कम 25 जनजातियां और उनकी कई उपजातियां निवास करती हैं। जबकि 1963 में बने नागालैण्ड में केवल 16 जनजातियां ही हैं। अरुणाचल प्रदेश के नागरिकों को इसी धारा की उपधारा-एच के तहत स्वायत्तता देने के बजाय वहां के राज्यपाल को असीमित अधिकार दिए गए हैं।

यहां तक कि अरुणाचल की सरकार या वहां की विधानसभा के निर्णय वहां के राज्यपाल पर बाध्यकारी नहीं हैं। जबकि संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति या राज्यपाल के सभी कार्यकारी अधिकार सरकार में निहित होते हैं और राज्यपाल या राष्ट्रपति को महज रबर स्टैम्प माना जाता है, इसलिए अगर कोई सोचता है कि कश्मीर में धारा 370 की सर्जरी करने से देश के 135 करोड़ लोगों पर एक कानून लागू हो गया या एक देश एक कानून का सिद्धान्त लागू हो गया तो इससे बड़ी गलतफहमी कुछ और नहीं हो सकती। 
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