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विकास की दौड़ में पिछड़े गांव की कहानीः ना शिक्षा पहुंची ना पेयजल, कैसे सुधरेगा 'कल''

Mon, 18 Mar 2019 01:53 PM IST
Anuj Dwivedi dwivedi Dwivedi
Updated Mon, 18 Mar 2019 01:53 PM IST
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problems of bundelkhand region in hindi crisis of drinking water and health facilities
बुंदेलखंड के गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल की समस्या है। - फोटो : Anuj Dwivedi

आजादी के बाद विकास की दौड़ लगाते भारत ने बीते 6 दशकों में नई बुलंदियों को छुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और बुनियादी सुविधाएं दूर-दराज के इलाकों में पहुंची हैं। लेकिन डिजिटल होते और चमचमाते इंडिया में ऐसे गांव भी हैं जहां आज भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंची हैं। ये कहानी एक ऐसे ही गांव की है।

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दरअसल, इस गांव में सरकारी सिस्टम कैसे फेल नजर आता है इसकी बानगी भर ये है कि गांव मे लेखपाल भी कभी नही आता। बाकी प्रधान जी महीने में तीन-चार बार आ ही जाते हैं। चुनावी बयार के बीच सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि आखिर इस लोकतंत्र में मतदाता कब तक सियासी हुक्मरानों की बेड़ियों में जकड़े रहेंगें और उनके झूठे आश्वासन पर हर 5 वर्ष शांति से बिता देंगे?
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गरीबी हटाओ और अंत्योदय की बात करने वाली सरकारों के दावे चित्रकूट जिले के इस आखिरी गांव में दम तोड़ते नजर आते हैं। जिला प्रशासन का सबसे छोटा कर्मचारी लेखपाल तक कभी इस गांव नहीं जाता। जनप्रतिनिधियों की गाड़ियां ज्यादा बड़ी हैं शायद इसलिए इस गांव में घुसने की वो हिमाकत नही करते।
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शर्म आनी चाहिए इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को जिसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से सहयोग देने वाले आजादी के बाद से आज तक इस गांव की मौजूदा चौथी पीढ़ी तक को स्कूल नहीं भेज पाए। सनी जैसे सैकड़ों कोलादिवासी बच्चे पढ़ना चाहते हैं, लेकिन शायद इन्हें अपने पूर्वजों की तरह ऐसे ही अशिक्षित रहकर जीवन बिताना पड़ेगा ।

 

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कोल आदिवासी समाज आज भी मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाया है। - फोटो : Anuj Dwivedi

दरअसल, कोल आदिवासी समाज को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का बीड़ा उठाए तथाकथित ठेकेदार और संस्थाओं से लेकर फोटॉस और छपास रोग से पीड़ित नेताओं को शर्म आनी चाहिए जिनके रहते भी इस गांव में शिक्षा ,स्वास्थ्य और पेयजल जैसी मूलभूत सूविधाओ की समुचित व्यवस्था नही हो सकी। प्रयास अधूरे रहे और आदिवासी समाज की स्थिति वैसी की वैसी ही। ना पीने का साफ पानी है, ना शिक्षा की व्यवस्था और ना ही बीमारी पड़ने पर स्वास्थ्य और चिकित्सा की सुविधा। बदलते भारत में आखिर ऐसे गांवों की सुनवाई कहां होगी?

वैसे प्रशासन की भी कम गलती नही है क्योंकि हर कार्य को धरातल पर उतारने का कार्य उन्हीं का है। हालांकि गढ़चपा ग्राम पंचायत के प्रधान धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने इन आदिवासी गांवों में कुछ ठोस और सार्थक पहल की है जो देखने लायक है। लेकिन बदलते भारत और डिजिटल होते इंडिया में बहुत कुछ ऐसा है जो यहां नहीं पहुंचा है। यहां के लोगों को इंतजार है कि आखिर उम्मीद की नई रौशनी यहां कब पहुंचेगी।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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