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भोपाल में कला और साहित्य का संगम: 14 देश, 103 भाषाओं के 575 लेखक, एक छत के नीचे

Tue, 08 Aug 2023 04:34 PM IST
Shakeel Khan शकील खान
Updated Tue, 08 Aug 2023 04:34 PM IST
सार

उदघाटन सत्र का शुभारंभ करते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने कहा कि ‘मानवता का वास्तविक इतिहास विश्व के महान साहित्य से ही मिलता है।’ उन्होंने कहा कि है। ’साहित्य के आदान-प्रदान से ही दुनिया में एक बेहतर समझ का निर्माण होता है।

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President of India inaugurated the Unmesha and Utkarsh festivals international literature festival in bhopal
इस अनूठे चार दिवसीय आयोजन का उद्घाटन महामहित राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने किया। - फोटो : Social Media

विस्तार

जहां 14 देशों  के 103 भाषाओं के 575 लेखक-रचनाकार एक जगह जमा हों वह बिरला और दिलचस्प साहित्य समागम तो माना ही जाएगा। इतना बड़ा ‘उत्सव’ अगर पूरी तरह व्यवस्थित भी नजर आए तो कहना ही क्या। बहरहाल, अपनी तरह के इस अनूठे चार दिवसीय आयोजन का उद्घाटन महामहित राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने किया। इस साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजन ‘उन्मेष’ और ‘उत्कर्ष’ का साक्षी बना भोपाल रवीन्द्र भवन सभागार। एशिया के सबसे बड़े इस लिटररी प्रोग्राम को ‘इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टीवल’ के नाम से ‘सही ही’ पुकारा गया। साहित्य अकादेमी ने 03 से 06 अगस्त तक चलने वाले अपने इस चार दिवसीय आयोजन को नाम दिया था – ‘उन्मेष’।

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ये दौर विज़ुअल्स का दौर है जहां लोगों को सिर्फ सुनना नहीं सुहाता उनकी आंखें हलचल भी देखना चाहती हैं, सो इस आयोजन में दर्शक-श्रोताओं के लिए इसका भी इंतज़ाम था। इसी सभागार में तीन दिन (03 से 05 अगस्त) तक भारत की लोक एवं जनजातीय अभिव्यक्तियों का राष्ट्रीय उत्सव भी देखने को मिला। इसमें देश भर के लोक 750 से ज्यादा कलाकारों ने शिकरकत की। 35 दलों में बंटे ये कलाकार 29 राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ‘उत्कर्ष’  शीर्षक के तहत संगीत नाटक अकादेमी नई दिल्ली और मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग इसके आयोजक थे।
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उदघाटन सत्र का शुभारंभ करते हुए राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने कहा कि ‘मानवता का वास्तविक इतिहास विश्व के महान साहित्य से ही मिलता है।’ उन्होंने कहा कि है। ’साहित्य के आदान-प्रदान से ही दुनिया में एक बेहतर समझ का निर्माण होता है। इस आयोजन में प्रदेश के माननीय राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और अकादेमी के अध्यक्ष श्री माधव कौशिक भी मौजूद थे।
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भोपाल के जिस रवीन्द्र भवन में ये प्रतिष्ठा आयोजन हुआ उसके नये भवन का निर्माण कुछ साल पहले ही हुआ है। नए भवन में छोटे-बड़े आयोजनों के हिसाब से अलग-अलग आकार के एकाधिक सभागार बने हैं। इन सभागारों का एक साथ समांनांतर प्रयोग होते देखना भी कम रोचक नहीं था।

यह चार दिन तक और हर रोज पूरे दिन चलने वाला आयोजन था। अलग-अलग सभागार में एक साथ कार्यक्रम चलते थे, सो सबको समेटना और उन पर बात करना संभव नहीं है। लेकिन जिन समसामयिक और साहित्यिक विषयों पर चर्चाएं और परिचर्चाएं हुईं,  उनके शीर्षक विषयागत जानकारी दे देते हैं। इनकी रोचकता इनके शीर्षकों से जाहिर होती है।

उदाहरणार्थ ‘बहुभाषी कविता पाठ’ ‘सिनेमा और साहित्य पर चर्चा’ ‘ ‘सागर साहित्य पर परिचर्चा’ ‘आदिवासी कवि सम्मेलन’  ‘मेरे लिए स्वतंत्रता का अर्थ’  ‘ भारत @ 75 पर कविता पाठ’ ‘भारत की अवधारणा’  ‘मध्य प्रदेश की गीत’ ‘बहुभाषी कहानी पाठ’ ‘युवा साहिती – नई फसल’ ‘मशीनों का उदय – लेखक विहीन साहित्य’ ‘एक नया विश्व बुनना’ ‘अनूठा पूर्वोत्त्र साहित्य’ ‘भारतीय नाटकों में अलगाव की भावना’ ‘भारतीय भक्ति साहित्य’ ‘योग साहित्य’ ‘फंतासी और विज्ञान कथा साहित्य’ ‘हाशिए का स्वर – उत्पीडि़तों का उत्थान’ ‘भारतीय लोक साहित्य की गाथा’ ‘भारत में बच्चों के साहित्य का अनुवाद’ ‘भारत में कहानी सुनाने की परंपरा’ ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता की भूमिका’ ‘वैचारिकता और साहित्य’ ‘नारीवाद और साहित्य’ ‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों में पुस्तकों की भूमिका’ ‘भारतीय भाषाओं में अनुवादकों के समक्ष चुनौतियां’ ‘मैं क्यों लिखता हूं/लिखती हूं’ और ‘विविधता में एकता’ इत्यादि।

इनमें से कुछ को टटोल लेते हैं

साहित्य और सिनेमा का रिश्ता सदाबहार


‘सिनेमा और साहित्य’ पर चर्चा करते हुए दिलीप कासरवल्ली ने कहा कि इन दौनों विधाओं की क्षमताएं और इनकी प्रामाणिकता अलग-अलग है। सिनेमा से साहित्य कभी गायब नहीं हो सकता। तमाम दबावों के बावजूद यह अलग-अलग रूपों में यहां आता रहेगा। कार्यक्रम की शुरूआत में त्रिपुरारी शरण ने कहा कि सिनेमा और साहित्य का रिश्ता हमेशा से रहा है और हमेशा रहेगा भी। लेकिन वह एक दूसरे के पूरक नहीं हो सकते। उन्होंने खासतौर पर सत्यजीत रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’  और कवि शैलेन्द्र की ‘तीसरी कसम’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ये साहित्य द्वारा सिनेमा में रची गई ऐसे दुनिया है जो हमारे समाज को सामने लाती है। रत्नोत्तमा सेनगुप्ता ने कहा कि नई तकनीक आने से सिनेमा की पूरी दुनिया बदली है, लेकिन निर्देशक पर ही निभर है। ओपी श्रीवास्तव ने कहा कि दौनों की दुनिया अलग है। रचना की कोई सीमा नहीं होती लेकिन सिनेमा एक खास समय में सीमित रहता है।

एलजीबीटीक्यु समाज के लोगों का आमंत्रण स्वागतयोग्य

बहुभाषी कविता पाठ में कार्यक्रम के अध्यक्ष कल्कि सुब्रहमण्यम ने जो कहा उससे इस कार्यक्रम की झलक मिल जाती है। उन्होंने कहा कि जहां ब्रिटिश शासनकाल में एलजीबीटीक्यू समुदाय का शोषण और उन पर अत्याचार होता था वहीं आज इस समाज के लोगों को आयोजन में बराबरी से आमत्रित किया गया है, जो स्वागतयोग्य है।

समुद्र जब शालीनता तोड़ता है तो सुनामी आ जाती है

सागर साहित्य पर परिचर्चा में मेल्विन रोड्रिग्स ने कहा कि समुद्र जब अपनी शालीनता तोड़ता है तो सुनामी आ जाती है। 1857 के युद्ध के ताप को अंडमान निकोबार ने सहा है, इसकी आत्मा की आवाज को उन्होंने कविता के माध्यम से जाहिर किया ‘ काले मन के गोरों ने मेरा नाम खराब किया, मैं अनुपम गोरा था फिर भी काला पानी नाम दिया।’ सत्र में हसित मेहता, के दामोदर राव और व्यासमणि त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे।

आदिवासी गीत अंधविश्वासों का पुलिंदा नहीं हैं

‘आदिवासी कवि सम्मेलन’ में गोंडी,  कैकाडी, मिज़ो, कॅकबरॅक, खासी, तिवा, देसिया आदि भाषाओं की कविता का पाठ किया गया। कहा गया कि आदिवासी कविता धरती के मूल गीत हैं। जैसा कि प्राय: कहा जाता है ये गीत अंधविश्वासों का पुलिंदा नहीं हैं। बल्कि इनमें उदात्त दर्शन और आधुनिक जीवन के चिह्नों से रहित उनकी प्राचाीन दुनिया की सूचनाएं और विविध रूप की उत्कृष्ट कविताओं का समावेश है।

कवयित्री शब्द ही आपत्तिजनक

‘मेरे लिए स्वतंत्रता का अर्थ’ विषय पर परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए अर्जुनदेव चारण ने प्राचीन साहित्य से उदाहरण देते हुए स्वतंत्रता की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि ‘स्व’ की प्रतिष्ठा में ‘पर’ की चिंता होना बहुत जरूरी है। ‘भारत @ 75 पर कविता-पाठ’  पंजाबी कवि वनीता ने ‘रंग’ पर कविता सुनाई – जिस उम्र में मिले उसे रंगों की पहचान न थी/ जब तक उसने की रंगों की पहचान, रंगों ने अपना रंग बदल लिया। लीलाराम जगूड़ी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कवयित्री शब्द पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि कवि होने के लिए पुरूष या महिला होना आवश्यक नहीं, बल्कि व्यक्ति होना जरूरी है।

भारत की अवधारणा विषयक परिचर्चा में बात करते हुए मोहन गोहाणी ने कहा कि विविधताओं के बावजूद भी भारत की भौगोलिक संरचनाओं – नदियों, पहाड़ों जनजातीय समाजों के साथ अद्भुत है।

शिक्षा अपने आप में रचनात्मकता बढ़ाने वाली है

बिस्वा भूषण हरिचंदन ने कहा कि शिक्षा अपने आप में रचनात्मकता बढ़ाने वाली है। कार्यक्रम में देश के अनेक जाने-माने शिक्षाविदों ने भाग लिया। स्वागत उद्बोबधन में के। श्रीनिवासराव ने कहा कि संपूर्ण शिक्षा सीखने व उसे जीवन में उतारने का उपक्रम ही है।

President of India inaugurated the Unmesha and Utkarsh festivals international literature festival in bhopal
आरिफ मोहम्मद खान ने भी की शिरकत - फोटो : PTI

भारतीय परंपरा सबसे समावेशी परंपरा

‘भारत का भक्ति साहित्य’ विषय पर सत्र की अध्यक्षता केरल के राज्यपाल माननीय श्री आरिफ मोहम्मद खान ने की। उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी भक्ति से जुड़ी गहन और गंभीर किताबों को छोटी-छोटी कहानियों में परिवर्तित करके आम जन तक पहुंचाएं तो बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि हमारी सनातन परंपरा इतनी समावेशी है कि चाहकर भी किसी को अलग नहीं किया जा सकता। यह भारत में ही संभव है कि स्वर्ण मंदिर की नींव मुस्लिम सूफी मियां पीर रखें।

चैट जीपीटी से इमोशनल टच नहीं ला पाएंगे

‘मशीनों का उदय – लेखक विहीन साहित्य’  बहुत ही रोचक और आजकल का सबसे चर्चित टॉपिक है। वक्ताओं ने सबसे पहले चैट जीपीटी पर अपने विचार रखे। सभी का मानना था कि चैट जीपीटी से शायद हम वो इमोशनल टच नहीं ला पाएंगे जैसे सामान्य रूप से लिखते समय आता है। एक वक्ता ने कहा कि चैट जीपीटी को संपादित करते समय हमें इंसानी समझ को तरजीह देना होती है जो वहां नदारद होती है। परिचर्चा में सेल्फ पब्लिशिंग पर भी बात हुई। वक्ताओं ने कहा कि इससे एक बड़ा नुकसान ये है कि इसमें गलतियों की भरमार होती है और अच्छे कंटेंट को जगह नहीं मिल पाती। यह भी कहा गया कि सबसे अधिक किताबें नॉन फिक्शन हैं, क्योंकि इनकी डिमांड ज्यादा है।

नाटक वही जो दर्शक को सोचने पर मजबूर करे

‘भारतीय नाटकों में अलगाव की भावना’ विषय पर रोचक संवाद हुआ। अंजला महर्षि ने भारतीय और पाश्चात्य नाटकों के अंतर पर बात की। असगर वज़ाहत ने कहा कि मानव हमेशा यथार्थ को मानता भी है और नहीं मानने की कोशिश भी करता है। उसने हमेशा प्रत्यक्ष से आगे देखने की कोशिश में साहित्य रचा है। आतमजीत ने कहा नाटक में अलगाव की कोई विधि नहीं अपितु विचारधार है। विजयकुमार सत्पथी ने नाटककार ब्रेख्त को ‘क्लासिकल मॉडनिस्ट’ बताया। वामन केन्द्रे ने कहा कि भारत के नाटक में अलगाव का अर्थ बहुत अलग है। उन्होंने कहा कि भारत के नाटक में अलगाव का अर्थ बहुत अलग है। महेश दत्तानी ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि सार्थक नाटक वही होता है जो दर्शकों को चिंतन पर मजबूर करे।

‘पूर्वोत्तरी – अनूठे पूर्वोंत्तर साहित्य’ सत्र में वक्ताओं ने कहा कि पूर्वोत्तर का साहित्य पूरे भारत का साहित्य है। उन्होंने कहा कि हमारे साहित्य में सभी विषयों,  त्यौहार,  फसल,  मौसम और देवी-देवताओं को भी स्थान दिया गया है। हमारा साहित्य लोक कथाओं और आख्यानों से परिपूर्ण है। हमारे साहित्य में जन्म एवं मृत्यु को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। एक वक्तव्य में कहा गया कि पूर्वोत्तर का साहित्य ज्ञान और बुद्धिमत्ता से परिपूर्ण है।

ये इश्क नहीं आसां... एआग का दिरया है और डूबकर जाना है

‘कविता : आत्मा की अभिव्यक्ति’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में महिलाओं कवयित्रियों की संख्या ज्यादा थी। अध्यक्षता कर रहीं सुकृता कुमार पाल ने कबीर का दोहा सुनाया – लाली मेरे लाल की जित देखुं तित लाल, लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल। जिगर मुरादाबादी का शेर भी सुनाया – ये इश्क नहीं आसां इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है। ये सुनाकर उन्होंने समझाया कि इन कविताओं की भाषा सरल है लेकिन कवियों के मन की अभिव्यक्ति शीर्ष पर है। न्यूयार्क वासी आद्रा मानसी ने कहा कविता आपके भीतर वर्षों तक चलती रहती है। दुनिया में सब कुछ ब्लैक एण्ड व्हाइट नहीं होता।

साहित्य अकादेमी बहुभाषा-भाषी साहित्यकारों की प्रतिनिधि संस्था है

विजेता चन्द्रशेखर कंबार ने करते हुए कहा कि साहित्य अकादेमी बहुभाषा-भाषी साहित्यकारों की प्रतिनिधि संस्था है। उन्होंने कहा कि बहुत सारे साहित्यकार अपने स्थानीय कलेवर में लिखना पसंद करते हैं, यहां तक कि मुझे भी कन्नड में लिखना पसंद है। इस सत्र में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष श्री माधव कौशिक भी उपस्थ्ति थे। यहां असमिया, बांग्ला, नेपाली, बोडो, डोंगरी, हिंदी, कश्मीरी, कोंकणी, राजस्थानी और उर्दू के कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।  

कबीर को किसी प्रमोशन की जरूरत नहीं

‘विदेशी भाषाओं में भारतीय साहित्य का प्रचार-प्रसार’ विषय पर आयोजित परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए लिंडा हेस ने कहा कि मेरे दोस्त कहते हैं कि मैं कबीर पर काम कर रही हूं या कबीर लिंडा पर। कभी-कभी सोचती हूं कि मैं कबीर का प्रमोशन कर रही हूं या कबीर मेरा। लेकिन सब जानते हैं कि कबीर को किसी प्रमोशन की जरूरत नहीं है, मैं तो बस कबीर की आयरनी को आगे ले जाने का काम कर रही हूं। सत्र में अभय के. चिन्मय गुहा, हिरीयुकी सातो, मोनिका ब्रोवर्चेक, एस.पी. गांगुली, सुरेश गोयल और विभा मौर्या ने शिरकत की, विचार रखे। अभय के. ने कहा कि भारतीय साहित्य का विदेशी भाषाओं मे दो तरीके से प्रचार-प्रसार हो सकता है। सरकार की सहायता से या लोगों के आपसी सहयोग से। उन्होंने अकादेमी से

हम सभी बहुआयामी विरासत के उत्तराधिकारी हैं

‘भारत की साहित्यिक विरासत’ विषय पर ‘आयोजित सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य नंद किशोर ने की। उन्होंने कहा कि हम सभी बहुआयामी विरासत के उत्तराधिकारी हैं। हर भाषा की एक अपनी एक समृद्ध विरासत है। प्रतिष्ठित पंजाबी लेखक मनमोहन ने कहा कि विरासत को समझने के लिए समय के साथ-साथ भौगोलिकता की भूमिका को भी समझना महत्वपूर्ण है। साहित्यिक विरासत को समझने के लिए वाचिक और लोक साहित्य को समझना आवश्यक है।

‘’बिना सीमाओं के कविता’ सत्र में आयरलैण्ड, भारत, तिब्बत, मॉरीशस, मालदीव, और नाइजेरिया के कवियों ने भाग लिया। बहुभाषी कविता पाठ के दूसरे सत्र मं बांग्ला, हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम, ओडि़या, तेलुगु और उर्दू के कवियों ने शिरकत की। ‘बहुभाषी कहानी पाठ’  में बांग्ला, अंग्रेजी, हिंदी, कन्नड़, ओडि़या और पंजाबी भाषा के कथाकारों ने कहानी पाठ किया। बहुभाषी कवि सम्मेलन में विभिन्न भाषा की कविता सुनाई गईं। आदिवासी कवि सम्मेलन भी हुआ। ‘भारत में बच्चों के साहित्य का अनुवाद’ विषय पर हुए सत्र में बच्चों के साहित्य की चिंता की गई।    

फंतासी और विज्ञान कथा साहित्य हमें नई सीख देते हैं

एक विशेष सत्र में ‘फंतासी और विज्ञान कथा साहित्य’ पर रोचक संवाद हुआ। इसमें साधना शंकर (अध्यक्षता),  अनिल मेनन, इरा मुरूकन और चित्रा देवकारूणी (अमेरिका से ऑनलाईन) ने अपनी बात सामने रखी। साधना शंकर ने नारी एवं नारीवाद को रेखांकित करते हुए कहा कि नारी पात्रों पर आधारित उपन्यास भविष्य में बहुत प्रभावित रूप में सामने आने वाले हैं। चित्रा ने पुरातन भारतीय महाकाव्यों तत्व से जोड़ते हैं। अनिल मेनन ने विज्ञान कथा साहित्य की मुख्य प्रवृत्तियों पर डिटेल में चर्चा की। उन्होंने विज्ञान कथाओं और विज्ञान फिल्मों के अंतर को भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि फंतासी और विज्ञान कथा साहित्य हमें नई सीख देते हैं।

‘भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में पत्रकारिता की भूमिका’ विषय पर भी सार्थक संवाद देखने को मिला। ‘भारतीय लोक साहित्य की गाथा’  में कपिल तिवारी ने कहा कि जब हम लोक में देखने का प्रयास करते हें तो स्वयं को ही देखने का उपक्रम करते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में हमें अपनी आधुनिकता स्वयं ही पैदा करना होगी। सत्र की अध्यक्षता केसरी लाल ने की। हरिराम मीणा ने कहा कि जनजातीय लोक में व्यक्तिवाद नहीं सामूहिकता होती है।

‘हाशिए के स्वर : उत्पीडि़तों का उत्थान’

‘हाशिए के स्वर : उत्पीडि़तों का उत्थान’ विषय पर हुए सत्र की अध्यक्षता के। इनोक ने की। सत्र में बांग्ला, हिंदी, मराठी, और तमिल भाषी विद्वानों ने भाग लिया। एक वक्ता ने कहा कि आज दलित साहित्य के आयाम बदले हैं और ये जनता की आवाज़ बनकर उभरे हैं। एक और वक्ता का कहना था कि जब हम हाशिए की बात करते हैं तो हमारे सामने बहुत सारे पर्याय सामने आते हैं। जैसे पीडि़त, वंचित या दलित। उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर के कथन का संदर्भ लेते हुए कहा कि सच मेहसूस करने के बाद ही लिखा जाना चाहिए।

डिजि़टल साहित्य सबसे ज्यादा पापुलर

एक सत्र में ‘ई -साहित्य’ पर दिलचस्प बातचीत हुई। अध्यक्षता निर्मलकांति भट्टाचार्जी ने की। नवनीता सेनगुप्ता ने कहा कि आजकल उपन्यास भी हाईपर टैक्स्ट मे आ चुका है। आज हर स्थान पर क्यू आर कोड है, लिंक है जिसके माध्यम से आप किसी भी विषय के बारे में संपूर्ण जानकारी एक क्लिक में प्राप्त कर सकते हैं। यह विशेषता साहित्य में भी अपना स्थान बनाती जा रही है। अदिति माहेश्वरी ने कहा कि डिजि़टल साहित्य सबसे ज्यादा पापुलर और एक आवश्यकता बन चुका है। तृषा नियोगी ने कहा ई-साहित्य हमें एक नया दृष्टिकोण प्रदान करेगा। इस क्षेत्र में बहुत संभावनाएं हैं जो भविष्य में दिखेंगी। तान्या चक्रवर्ती ने कहा कि ई-साहित्य एक क्रांति के रूप में सामने आया है।  

एशिया के इस चार दिवसीय आयोजन का समापन रविवार को समापन हो गया। अंतिम दिन नारीवाद और साहित्य पर सार्थक बातचीत हुई। इसमें ट्रांसजेंडर समाज की समस्याओं को भी सामने लाया गया। इसमें कहा गया कि सच्चा नारीवाद वही है जिसमें सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखा जाए। अंतिम दिन कुल चौबीस विषयों पर संवाद हुआ, 160 साहित्कारों ने अंतिम दिन के विभिन्न सत्रों में हिस्सा लिया। कुल मिलाकर यह साहित्यिक और सांस्कृतिक समागम भोपाल के और मध्य प्रदेश के कला रसिकों के दिमाग़ में लंबे समय तक घर करने वाला है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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