मृत्यु से पहले काफ्का ने की थी अपने साहित्य को आग में जलाने की विनती
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लाल घपरैल की छत के घर के बाहर आपको अंग्रेजी अक्षर का लकड़ी के लॉकेट की तरह बने निशान पर 'के' लिखा है। यानी आप काफ्का के म्यूजिम पहुंच गए। मैं सोचता हूं ये लकड़ी, उसी डॉगवुड ट्री से बनी है, जिस दरख्त की लकड़ी से बनी सूली पर ईसा मसीह को लटकाया गया होगा। 'के' यानी काफ्का। काफ्का यानी विचित्र कथानक और रहस्यमय शब्दों का जादूगर। जो कहता था- हमें ऐसी किताबें पढ़नी चाहिए, जो कुल्हाड़ी की तरह हमारे अंदर के जमे बर्फ के समंदर को चीरती चली जाए, हमें चोट पहुंचाए, हमें भीतर तक घायल कर दे। हम ऐसी किताबें पढ़े, जिसे पढ़ने के बाद हम बिल्कुल वैसे न रहें जैसे हम किताब पढ़ने से पहले थे।
मरने से पहले काफ्का ने की थी अपने साहित्य को आग में जलाने की विनती
वही, फ्रेंज काफ्का, जो केवल इकतालिस साल की उम्र में एक बंद अंधेरे कमरे में गले के 'वायस बाक्स' के तपेदिक से खांसते हुए मर गया। वही काफ्का, जिसने मरने से पहले अपने दोस्त और अपनी प्रेमिका से वादा लिया कि वह उसके अब तक लिखे सारे साहित्य को आग में जला दे क्योंकि वो सब कचरे के अलावा और कुछ नहीं। लेकिन उनके दोनों करीबी दोस्त ये हिम्मत नहीं जुटा सके।
भाप बनकर उड़ जाती है हर क्रांति
उसका लिखा छपा और पूरी दुनिया में तहलका मच गया। उसकी कलम में जादू था। एक तरह का अति-यर्थातवाद। वह रातों रात एक इंसान से एक कीड़े में तब्दील होकर उसकी तरह सोच सकता था। गंदे कीड़े की तरह खुद को रेंगता हुआ महसूस कर सकता था। वो काफ्का, जो नौकरशाही से बेतरह नफरत करता था और कहा करता था कि 'हर क्रान्ति आखिरकार भाप बन कर उड़ जाती है, और अपने पीछे नई नौकरशाही का कीचड़ छोड़ जाती है।'
वो काफ्का, जो कहता था-"मैं आपको समझा नहीं सकता। मैं किसी को भी ये समझा नहीं सकता कि मेरे भीतर क्या चल रहा है। और हैरत की बात है कि इसे मैं खुद को समझा भी नहीं सकता कि मेरे अंदर क्या चल रहा है।” वो काफ्का, जो प्राग के शानदार महल (प्राग कासैल) के चट्टानी पत्थरों से छोटे से सर्वेंट क्वाटर नम्बर-22 में आकर अपने अंदर का सारा जहर कागजों पर उतार देता था। वह काफ्का, जो खून की उल्टियां करते हुए लिखता रहा, लिखता रहा जब तक कि वह मर नहीं गया।
काफ्का प्राग में वैसे ही मशहूर है जैसे क्यूबा में चे-ग्वेरा
काफ्का न प्राग को कभी भूल पाया और न प्राग उसे कभी भूल पाया। काफ्का प्राग में वैसे ही मशहूर है जैसे क्यूबा में चे-ग्वेरा। चे-ग्वेरा की तरह काफ्का के नाम के प्रतीक चिन्ह, टी शर्ट, पोस्टर, बीयर मग आपको वहां हर पर्यटन स्थल पर मिल जाएंगे। दुनिया भर के साहित्यकार प्राग को काफ्का के शहर के नाम से पहचानते हैं।
साहित्य में दिलचस्पी रखने वाला हर भारतीय पर्यटक प्राग जाकर काफ्का का घर उसके नाम पर बना म्यूजियम एक बार जरूर देखना चाहता है। भारत के सैलानी प्राग में निर्मल वर्मा के बियर में बहके हुए कदमों के पद चिन्हों को भी खोजते हैं। या उस बैंच को ढूंढते हैं जहां लैंपपोस्ट की पीली रोशनी की छाया के नीचे वे अपने नोट्स बनाया करते थे। काफ्का को पढ़ते हुए आप एक यातना को झेलते हैं। मैं प्राग में काफ्का की जिन्दगी से लेकर उसके अंतिम ठिकाने तक को देखना चाहता था।
एक अनजान शहर में ये सब आसान नहीं है, जबकि आप और उस शहर के बीच भाषा की एक मजबूत लोहे की दीवार हो। मजेदार बात है कि काफ्का का अधिकांश लेखन चेक के बजाए जर्मन में है जिसका दुनिया की तकरीबन हर भाषा में अनुवाद हुआ। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा ओल्ड टाउन स्कवायर के अपने पुराने घर में बिताया। आप किसी से उनके घर का पता पूछिए तो वो आपको सेंट निकोलस चर्च के पास मशहूर खगोलीय घड़ी के पीछे का रास्ता बता देगा।
पिता के बारे में काफ्का ने लिखी थी यह बात
प्राग सरकार इसे भी एक संग्रहालय में तब्दील कर रही है। काफ्का के पिता एक यहूदी बस्ती में एक बड़ी दुकान चलाते थे। खुद काफ्का ने लिखा- 'वे एक मतलबी किस्म के दबंग और पेशेवर कारोबारी थे।' लेकिन 20 वीं सदी की दहलीज पर जन्मे फेंज काफ्का का अपना व्यक्तित्व उतना ही संवेदनशील और सहज था। लेकिन उनकी मन:स्थित इतनी सहज नहीं थी। जैसा कि मैंने उनकी कहानियों में पाया।
दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मन सेना ने यहूदी बस्ती जला दी थी जिसमें काफ्का का घर भी था। ये इत्तेफाक ही है कि हिटलर के उत्थान से पहले ही काफ्का दुनिया से विदा हो गए थे, वर्ना इस यहूदी लेखक का साहित्य कुछ और जहरीला होता।
मार्केज को काफ्का से मिली थी जादुई यथार्थ की प्रेरणा
काफ्का को नोबल नहीं मिला जबकि ये पुरस्कार उन्हीं के जमाने में अभी शुरू ही हुआ था। और जब काफ्का को कोई ठीक से जानता तक नहीं था। कहते हैं नोबल पुरस्कार जीतने वाले बीसवीं सदी के चर्चित लेखक गाब्रिएल गार्सिया मार्केज़ को जादुई यथार्थ की प्रेरणा काफ्का से मिली।
यह बात मार्केज ने खुद स्वीकार भी की है। एक बार उनके किसी दोस्त ने उनको काफ्का की किताब 'मेटामॉर्फोसिस' (कायापलट) की एक प्रति भेंट की। इस किताब की शुरूआत में ही एक सेल्समैन ग्रेगर साम्सा रात में एक अजीब-सा सपना देखता है। और सुबह सो कर जब उठता है तो खुद को एक बड़े भयानक कीड़े में तब्दील हुआ पाता है। वह समझ नहीं पाता है कि यह सब सच है या उसका सपना अभी तक जारी है। उसे ठीक से फिर सो जाना चाहिए। शायद उसकी नींद अभी पूरी नहीं हुई। लेकिन वो फिर सोने में नाकाम रहता है। फिर धीरे धीरे उसे पक्का यकीन हो जाता है कि वह दरअसल एक रेंगने वाला 'राक्षसी कीड़ा' बन चुका है।
इस किताब के कथानक ने मार्केज़ के होश उड़ा दिए। तब उसने पहली बार सोचा कि यथार्थ और कल्पना के समिश्रण से ऐसा भी कुछ "बेहूदा" लिखा जा सकता है जो असंभव होते हुए भी यथार्थ हो। और तब उसने जादुई यथार्थवाद की लेखन शैली विकसित की, जो बहुत जल्द पूरी दुनिया में चर्चा का केन्द्र बन गई।
बक्सों में कैद हैं काफ्का की किताबें और चित्र
प्राग के मशहूर चार्ल्स ब्रिज के दो दरवाजे हैं। ये ओल्ड टाउन और लेसर टाउन को जोड़ते हैं। लेसर टाउन के हिस्से में कोई दस मिनट आगे बढ़ते हुए वाल्तावा नदी के किनारे आपको 'माला स्त्रेना' स्ट्रीट काफ्का का म्यूजिम मिल जाएगा। ये म्यूजियम और यहां बनी कलाकृतियां देखने लायक हैं। काफ्का की कहानियों के कुछ दृश्य इस घर की खिड़कियों से दिखते हैं। म्यूजिम में कांच के बक्सों में कैद काफ्का की किताबें, उनकी डायरी के लिखे पन्ने हैं, जिसे आप पढ़ सकते हैं। इसमें उनकी तस्वीरें और कुछ हस्त लिखित दस्तावेज भी हैं। कुछ प्रूफ सुधारे हुए पन्ने हैं। कुछ अधूरे रेखा चित्र हैं जो खुद काफ्का ने बनाए हैं।
प्राग में काफ्का से जुड़ी दो प्रतिमाएं सैलानियों का ध्यान खासतौर पर खींचती हैं। एक सूट पहने एक बिना चेहरे के आदमी के कंधे पर सवार काफ्का। मूर्तिकार जार्सोल्वा की इस ब्रांस प्रतिमा का आइडिया काफ्का की कहानी 'डिस्क्रिप्शन ऑफ स्ट्रगल' से लिया गया है जिसमें लेखक एक व्यक्ति के कंधे पर घोड़े की तरह सवार हो जाता है। दूसरी चर्चित लेकिन अजीबो गरीब प्रतिमा काफ्फा म्यूजिम के बाहर दो युवाओं की है जो एक दूसरे के सामने पेशाब करने की प्रतियोगिता करते दिख रहे हैं।
जिस छोटे से ताल में उनका पेशाब गिर रहा है, वह चेक गणराज्य के नक्शे के आकर का है। इस प्रतिमा को लेकर खास विवाद हुआ। कहते हैं मूर्तिकार डेविड कार्ने इस कृति के जरिए कहना चाहते हैं कि चेक और स्लाविया के विभाजन के बाद चेक केवल इसी काम के लिए रह गया है।
अंत समय में काफ्का को उदासी और मायूसी ने लिया था घेर
अंत समय में काफ्का को उदासी और मायूसी ने घेर लिया था। उनके लेखन को तब ज्यादा लोग नहीं जानते थे। वह चाहते भी नहीं थे कि कोई उन्हें जाने। उन्होंने अपने मनोभावों को अपनी डायरी में दर्ज किया। काफ्का की डायरी उनकी मौत के बाद में छपी। वे लिखते हैं- जब अंत के करीब लगता है, ठीक तभी कहीं से एक अलग तरह की ऊर्जा और ताकत मिलती है और तब महसूस होता है कि ऐसे उदास लम्हों में आप जिन्दा हैं। लेकिन, अगर आप ऐसा महसूस नहीं करते तो तब आपके लिए सब यहीं और इसी वक्त खत्म हो गया। वे लिखते हैं- 'मरना एक मानवीय प्रक्रिया है, इसलिये मनुष्य मरते हैं, लेकिन बंदर समूची मानव जाति में जीवित रहता है......यह अतीत से मिले एक कठघरे के अलावा कुछ नहीं, जिसमें भविष्य की सुनहरी सलाखें जुड़ी हुई हैं।'
आधुनिक साहित्यकारों के लिए हमेशा एक रहस्य और प्रेरणा बने रहे काफ्का
'मेटामॉर्फोसिस' और 'इन द पीनल कॉलोनी' जैसी क्लासिकल कहानियों और 'द ट्रायल', 'द कॉसल' और ट्रैजिक-कॉमिक उपन्यासों के लेखक फ्रांज काफ्का आधुनिक साहित्यकारों के लिए हमेशा एक रहस्य और प्रेरणा बने रहे। यूरोप के सामाजिक ताने बाने ने काफ्का की उदासी को और भी गहरा दिया था। वह समलैंगिक भी थे। उनके कई महिला व पुरुष प्रेमी रहे। उन्होंने शादी नहीं की। वे यहूदी थे और जबकि उनकी अंतिम प्रेमिका मीलिना जेंस्सक ईसाई। वह पेशे से एक चेक पत्रकार थी।
संग्रहालय में काफ्का के प्रेम पत्र भी रखे हैं। वे मिलिना को लिखते हैं- 'तुम्हारे सबसे सुंदर खत वे हैं, जिनमें तुम मेरे डर से सहमत हो और साथ ही यह समझाने की कोशिश करती हो कि तुम मेरे लिए कोशिश करती हो कि मेरे लिए डर का कोई कारण नहीं है। शायद तुम्हें कभी-कभी लगता हो जैसे मैं अपने डर को खुद ही पाल रहा हूं पर तुम इससे भी इंकार नहीं कर सकती कि ये डर मुझमें बहुत गहराई तक बस चुका है। शायद यही मेरा वह अकेला रूप है, जिसे तुम प्यार करती हो क्योंकि तुम्हे मुझमें प्यार के काबिल और क्या मिलेगा? सच है इंसान को किसी को प्यार करना है तो उसकी कमजोरियों को भी खूब प्यार करना चाहिए। तुम यह बात जानती हो, इसीलिए मैं तुम्हारी हर बात का कायल हूं। तुम्हारा होना मेरी जिंदगी में क्या मायने रखता है यह बता पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है।'
प्राग के महल में उनके पत्थर के छोटे से कमरे में अब काफ्का की किताबों, उनसे जुड़े प्रतीक चिन्हों की दुकान है। इसके संचालक मैथ्यूज बताते हैं कि यहां काफ्का अपनी बहन के साथ रहे। उनका सबसे बेहतरीन लेखन यही इस छोटे से कमरे में हुआ। अपनी मौत के बाद काफ्का प्रसिद्ध हुए खासतौर से दूसरे विश्वयुद्ध के बाद। प्राग के यहूदी कब्रिस्तान में आज भी उनकी कब्र है जिसे बाद में मशहूर वास्तुशिल्पकार लियोपोल्ड एहरमन ने डिजाइन किया। काफ्का की कब्र पर उनका परिचय हिब्रू में 'एक शानादार गैरशादीशुदा' इंसान के रूप में आदर के साथ दिया गया है।
मैं उस यहूदी कब्रिस्तान में काफ्का की कब्र के पास कभी देर से बैठा हूं। उनकी कब्र पर एक सूखा-सा पेड़ उग आया है। उस विरान सी कब्र पर कुछ मुराझाए हुए गुलदस्ते पड़े हैं। हजारों मील का सफर पूरा कर आखिर में मैं उस कब्र तक पहुंच गया। काफी थक गया हूं। लेकिन एक सकून है। मैं काफ्का की कब्र की तरफ देखता हूं। जैसे काफ्का मुझसे कहना चाहते हैं-'अपने ज़ुनून को पूरा करने में पूरी निर्दयता बरतो।' शायद इस लम्बे सफर पर निकल कर मैं यही तो कर रहा हूं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।