राजनीतिक व्यंग्य: अद्भुत भारत के अद्भुत रंग जो देखोगे वही दिखेगा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत जी बड़े मौसमी व्यक्ति हैं, मौसमी नहीं समझे? अरे वही जिसे अंग्रेजी में 'सीजंड' कहते हैं। मौसम के हिसाब से ही उनकी विशेषज्ञता बदलती रहती है। पिछले साल क्रिकेट के विशेषज्ञ थे। 'अरे उ कोहलिया को कोई कप्तानी थोड़े आता है। हमारे गांव का भूटेलिया इससे अच्छा कप्तानी करेगा। भला सेमीफाइनल में जाकर भी कोई हारता है?'
ऐसे कह रहे थे, जैसे सेमीफाइनल में हारना किसी नेता के ईमानदार होने जैसी दुर्लभ बात हो। सेमीफाइनल में पहुंच कर कोई हारता नहीं है तो सेमीफाइनल होता ही क्यों है ये मुझ दुर्बुद्धी को कहां समझ में आएगा।
'अरे जहां बुमराह को गेंद फेंकवाना था वहां रमी से गेंद फेंकवा दिया।' किसी ने टोका, 'रमी नहीं शमी, मोहम्मद शमी!' तुरंत जवाब दिया, 'रे नाम में क्या रखा है? फेंकवाया तो गलत बालर से ना? वह इंपॉर्टेंट है कि नाम? उसको भी देखो, वह गर्दभ लंठ को लगातार खिलाया जा रहा था।' सुनने वाला गड़बड़ा गया, यह कौन है?' अरे वही, क्या नाम है?'.... किसी ने पूछा ऋषभ पंत? बोले, 'हां! हां! वही, वही! नाम में क्या रखा है? कोहलिया को कुछ आता जाता नहीं है।' पूरी दुनिया का ज्ञान भारतजी के पास ही जो है, बिचारा कोहली तो चड्डी बेच रहा था, किसी भले आदमी को उसकी चड्डी पसंद आ गई तो पकड़ कर कप्तान बना दिया। हमारे देश में दिन में 16 घंटे जुबान से व्यायाम करने वाला 18 घंटे मैदान पर पसीना बहाने वालों से खुद को हमेशा श्रेष्ठ समझता है।
चुनाव आते ही भारत जी चुनाव विशेषज्ञ बन जाते हैं। 'अरे राहुल गांधी को कुछ आता थोड़े है, हम होते तो ऐसा भाषण देते, ऐसा भाषण देते कि जनता मैदान से भागकर सीधा इलेक्शन बूथ पर जाकर हाथ पर उंगली पटक देती....और मोदी, उ सर्जिकल स्ट्राइक थोड़ा और लेट किया होता ना, तो उसको 400 सीट आता। ई लोग अभी राजनीति में बच्चा-बुतरू हैं।'
किसी ने टोक दिया, 'तो आप ही चुनाव लड़ के नेता क्यों नहीं बन जाते? नेता बन के देश का भविष्य उज्ज्वल बनाइए।' फौरन जवाब दिया उन्होंने, 'अरे पॉलिटिक्स बहुत गंदी चीज है, और हम ठहरे साफ सुथरे आदमी। इसलिए हम तो कभी भोट भी नहीं देने जाते।' फिर पान का पीक थूकते हुए उन्होंने अपनी बात जारी रखी, 'वैसे हम चुनाव लड़ते तो जीत ही जाते लेकिन क्या करें, पार्लियामेंट का सीढ़ी बड़ा ऊंचा है, और हमको है दमा का बीमारी, चढ़ते चढ़ते सांसवे हुल-बुला जाएगा तो संसद के अंदर कुलबुलायेंगे कैसे?'
इस साल कोरोना वायरस आया तो हेल्थ एक्सपर्ट बन बैठे, स्वास्थ्य विशेषज्ञ। अरे हमारे पास पक्का सूचना है कि यह भायरस है ही नहीं बक्टीरिया है। हमारी बुआ की ददिया-सास अगर जिंदा होती तो ऐसा नुस्खा बताती कि कोरोना भायरस बाप-बाप करके भागता। यह अलग बात है कि जैसे ही उनके पड़ोस में एक को कोरोना वायरस हुआ, वो खुद ही अपने घर से बाप-बाप करते ससुराल भाग लिए। फिर एक दिन कहने लगे, अरे लॉकडाउन?
लॉकडाउन इनको जनवरी में ही कर देना चाहिए था। एक्को केस नहीं होता भारत में। इस सरकार को कुछ आता थोड़े है, खाली नेशनलिस्ट सेंटीमेंट भड़का कर जीत गया है। थोड़े दिन गुजरे नहीं कि मौसम फिर बदल गया। 'लॉकडाउन कर दिया, किसी के बारे में सोचा नहीं? देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? लोग भूखे मर जाएंगे, कोरोना से तो बाद में मरेंगे।
यह सरकार हर मोर्चे पर फेल है। देखिए तो कितने मजदूर सड़क पर ऐसे ही भूखे प्यासे चले जा रहे हैं, कोई पूछने वाला नहीं है।' और जिस समय भारत जी यह बोल रहे थे उनके घर के नीचे से पंद्रह-बीस मजदूर बूढ़ी औरतों और छोटे-छोटे दुधमुंहे बच्चों के साथ गुजर रहे थे, भूखे प्यासे, नंगे पांव; लेकिन छह महीने का राशन घर में ठूंस चुके, पूरी और आलूदम का भोग लगाते भारत जी की नजर उन पर नहीं गई। इस समय तो उन पर उनका समाजशास्त्री और अर्थशास्त्री हावी था, समाजसेवी की बारी नहीं आई थी।
वैसे भी समाज सेवा करने की चीज होती है बोलने की नहीं। 'यही मजदूर देश को बनाते हैं, सारे कल-कारखाने, ऐश के साजो सामान, सूई से लेकर हवाई जहाज तक, सभी मजदूर ही तो बनाते हैं। दादा हो दादा! इनको पूछने वाला कोई नहीं है!' अद्भुत हैं भारत जी भी, जिस मुख से गरमा-गरम पूड़ी आलू दम के साथ अंदर जा रहा था उसी श्री मुख से गरीबों के भूखे होने का दुख दर्द भी बाहर आ रहा था।
मजदूर घर पहुंच गए तो मौसम फिर बदल गया। 'अरे, इस सरकार को कुछ आता है? इतना लोग कहां-कहां पहुंच गया, अब करोना फैला रहा है। इनको जहां थे वहीं रोक देना चाहिए था, सब मजदूर घर पहुंच जाएंगे तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? कैसे चलेगा फैक्टरी? अरे हम होते तो लॉकडाउन लगाते ही नहीं। पूरा देश का अर्थव्यवस्था चौपट कर के रख दिया है सरकार।
इतना दिन तक सब को अच्छे से कमाने-खाने देता और फिर सब मजदूर को घर पहुंचा कर तब लॉकडाउन लगाता, ई ब्यूरोक्रेसी फेल है, यह सरकार फेल है, सारा सिस्टम फेल है।' वैसे जानकारी के लिए बता दूं कि भारत जी खुद ही 10वीं फेल थे। इतना ही नहीं, उन्होंने इतनी बार फेल फेल कहा बिजली ही फेल हो गई और बिजली के फेल होते ही उनकी विशेषज्ञता इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की तरफ बह चली।
जब भारत, नेपाल और भारत चीन के बीच तनातनी बढ़ी तो रक्षा विशेषज्ञ बनने का मौसम आ गया। 'जैसे नेपाली संसद में प्रस्ताव पारित करके नेपाल ने भारत के भू-भाग को अपने में शामिल करवा लिया है वैसे ही भारत को भी अपने संसद में नक्शा पास करके सारे नेपाल को ही अपने में मिला लेना चाहिए। अरे नक्शा ही पास करना है ना, उनके संसद से ज्यादा लोग हमारे संसद में हैं। और चीन, इसको तो सबक सिखाना हो तो चाइनीज खाना बंद कर दो। चाउमिन, मोमो, फ्राइड राइस सब खाना बंद कर दो।
चीनी सामान का तो ऐसा बहिष्कार करो, ऐसा बहिष्कार करो कि बस, बहिष्कार कर दो! और कुछ नहीं जानते हम।' कहते-कहते आवेश में उनका चेहरा लाल हो गया, सांस फूलने लगी। आसपास खड़े लोगों की आंखों में तो उनका देशप्रेम देखकर आंसू छलछला आए।
गौरतलब है कि यह सारा भाषण किसी को वह चाइनीज मोबाइल पर चाइना की बनी चप्पल, टी शर्ट और घड़ी पहने हुए ही दे रहे थे। किसी ने टोक दिया तो तुरंत सांसों का फूलना बंद हो गया और चेहरे का रंग तो ऐसा बदला कि दूर से देख रहे एक बिचारे गिरगिट ने हीन भावना से ग्रसित होकर आत्महत्या कर ली। 'अरे दुगो पैसा बचता है तो क्या करें, पैसा बचाना भी तो जरूरी है ना। जरूरत के समय पैसा ही हमारे काम आएगा, तुम नहीं।' कहकर तेजी से खिसकते समय उन्होंने बिल्कुल ही नहीं सोचा था कि अगर सरहद पर खड़ा सिपाही भी यही सोचने लगे तो पता नहीं उनके काम कौन आएगा।
आत्महत्या से याद आया, सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण आत्महत्या ने तो उनकी इंसानियत सचमुच जगा दी। बोलने लगे- 'यह भारत की जनता, यह नहीं सुधरेगी। दिन-रात ऐश्वर्या बच्चन और करीना कपूर के बच्चों का वीडियो देखने वाले लोग नेपोटिज्म की बात करते हैं।' यह शब्द उन्होंने मौके की नजाकत को देखते हुए अच्छे से सीख लिया था इसलिए इसमें नहीं गड़बड़ाये।
कहते चले गए- 'सजायाफ्ता मुजरिमों की फिल्मों को सुपरहिट बनाने वाले लोग सुशांत सिंह राजपूत के मुजरिमों को सजा देने की मांग कर रहे हैं। दुश्मन देश के कलाकारों की फिल्मों को देखने के लिए लाइन लगाने वाले लोग दुश्मन देश को सबक सिखाने की मांग करते हैं।
इतनी हिप्पोक्रेट जनता दुनिया के किसी और देश की नहीं है।' यह शब्द भी उन्होंने बहुत अच्छे से सीख रखा था। अब लोगों पर रौब झाड़ने के लिए थोड़े बहुत अंग्रेजी शब्द तो सीखने ही पड़ते हैं ना। बिना अंग्रेजी के भारत में आदमी को आदमी थोड़े न समझा जाता है। फिर थोड़ा शांत हुए तो कहने लगे- 'लोनली हो गया था वह टॉप पर जाकर। कोई सच्चा दोस्त नहीं रह गया था उसका।
कुछ लोगों ने गुटबाजी करके उसको क्वारंटाइन भी कर दिया था इसलिए डिप्रेस हो गया था।' उनका मनोवैज्ञानिक जाग चुका था। 'आईक्यू लेवल तो बहुत अच्छा था उसका लेकिन एक और कौन सा क्यू होता है ना, उसी में वीक रह गया था वो, काश कि कोई उसको हमारा नंबर दे देता, हम से बात करता ना वह तो सब ठीक हो जाता, और क्यू तो क्या, डब्ल्यू और जेड भी मजबूत हो जाता।
हम तो रिकमेंड करेंगे कि सब बच्चा का सब क्यू मजबूत करवाया जाए। क्यू ही क्यों, ए से जेड तक सब मजबूत करवाया जाए। और जिसका इ सब मजबूत नहीं है उसकी सहायता के लिए ऐसे समय में हर आदमी को हर आदमी से बात करते रहना चाहिए।
एक दूसरे का मनोबल बढ़ाना चाहिए।' आज सुबह ही भारत जी का पड़ोसी अपनी परेशानी लेकर उनके पास आया था, पहले तो उन्होंने उसे टालने का पूरा प्रयास किया लेकिन वह बेचारा सचमुच बहुत परेशान था और किसी से बात करना चाहता था,भारत जी की बुद्धिजीविता से प्रभावित होकर चला आया था, जब वह टस से मस ना हुआ तो उन्हें दुत्कार कर भगाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी- 'अरे हमारे अपने जीवन में परेशानी कम थोड़े है जो तुम्हारा भी सर पर लेकर घूमते रहें, भाग यहां से!' सचमुच अद्भुत हैं भारत जी, आपको भी ऐसा लग रहा है ना? वैसे उनका नाम कुछ और होता तब भी वह ऐसे ही होते, एकदमे अलग, नाम में क्या रखा है?
उद्घोषणा:- इस लेख का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। किसी भी तरह की समानता महज एक संयोग मात्र है और लेखक इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। फिर भी यदि भारत जी में आपको अपनी छवि दिखाई दे तो कृपया मुझे दोष ना दें; इसका ठीकरा साहित्य के सर फोड़ें क्योंकि कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और दर्पण, वह तो कभी झूठ बोलता ही नहीं!... धन्यवाद
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।