इंदौर में मोहसिन खान मामला: पॉक्सो के फास्ट ट्रैक कोर्ट, आखिर कितने तेज और कितने धीमे?
फास्ट ट्रैक कोर्ट का मतलब त्वरित प्रक्रिया से है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि न्याय की गुणवत्ता से समझौता किया जाए। अदालतों में लंबित मामलों की भरमार है। अक्सर देखा गया है कि जनता की तीव्र भावना को शांत करने के लिए त्वरित फैसले लिए जाते हैं, लेकिन बाद में उच्च न्यायालयों में वे टिक नहीं पाते।
फास्ट ट्रैक कोर्ट का मतलब त्वरित प्रक्रिया से है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि न्याय की गुणवत्ता से समझौता किया जाए। अदालतों में लंबित मामलों की भरमार है। अक्सर देखा गया है कि जनता की तीव्र भावना को शांत करने के लिए त्वरित फैसले लिए जाते हैं, लेकिन बाद में उच्च न्यायालयों में वे टिक नहीं पाते।
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साल 2000 से अब तक रिपोर्टिंग के दौरान नाबालिगों के साथ बलात्कार की अनगिनत दिल दहला देने वाली घटनाएं सामने आई हैं। दुधमुंही बच्चियों से लेकर किशोरियों तक, यौन हिंसा, हत्या और ब्लैकमेलिंग जैसे जघन्य अपराधों ने समाज को बार-बार झकझोरा है। इन अपराधों पर लगाम लगाने के लिए 2012 में ‘पॉक्सो एक्ट’ (POCSO Act) अस्तित्व में आया, जो बच्चों के यौन शोषण के मामलों में त्वरित न्याय देने के उद्देश्य से लाया गया था।
इसके तहत फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था की गई, लेकिन आज भी यह सवाल कायम है- क्या ये फास्ट ट्रैक कोर्ट वाकई में तेज हैं? क्या त्वरित न्याय की अवधारणा मात्र कल्पना ही है।
इंदौर केस: फिर फास्ट ट्रैक में ट्रायल की तैयारी
इंदौर में शूटिंग के बहाने युवतियों से दुष्कर्म करने वाले आरोपी मोहसिन खान के मामले को पुलिस ने ‘संवेदनशील अपराध’ की श्रेणी में रखा है। आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत भी एफआईआर दर्ज की गई है।
पुलिस ने एक विशेष टीम गठित कर इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में प्रस्तुत करने की तैयारी की है। यह टीम एफआईआर में दर्ज जानकारी के आधार पर आरोपी के खिलाफ साक्ष्यों को जुटा रही है ताकि केस को फास्ट ट्रेक में ले जाया जा सके।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की आवश्यकता
जब भी राज्य में किसी वीभत्स यौन अपराध की खबर आती है, फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग जोर पकड़ती है और यह जायज भी है। बलात्कार या ब्लैकमेल जैसी घटनाओं में पीड़िता मानसिक और सामाजिक रूप से टूट जाती है। यदि उसे समय पर न्याय न मिले, तो यह अन्याय के बराबर हो जाता है। जैसा कि कहा गया है-
न्याय की धीमी रफ्तार, अन्याय का हथियार बन जाती है। इसलिए विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां पीड़िता समाज के तानों, मानसिक प्रताड़ना और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से जूझ रही हो, न्याय में देरी, न्याय से इनकार की तरह महसूस होती है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट- कितने तेज़?
मध्यप्रदेश में कई चर्चित मामले फास्ट ट्रैक कोर्ट के तहत निपटाए गए, लेकिन उनके नतीजे पूरी तरह संतोषजनक नहीं रहे। उदाहरण के तौर पर-
20 अप्रैल 2018 को इंदौर में एक चार माह की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। आरोपी नवीन गड़के, जो पीड़िता की मां का चचेरा भाई था, को इंदौर जिला सत्र न्यायालय ने केवल 23 दिनों में दोषी ठहराकर मृत्युदंड की सजौ सुनाई थी। हाईकोर्ट ने भी यह सजा बरकरार रखी, लेकिन मार्च 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने न केवल सज़ा पर रोक लगाई, बल्कि मामले की पुनः सुनवाई का आदेश भी दिया।
जिला न्यायालय के अधिवक्ता महेंद्र मौर्य कहते हैं-
फास्ट ट्रैक कोर्ट का मतलब त्वरित प्रक्रिया से है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि न्याय की गुणवत्ता से समझौता किया जाए। अदालतों में लंबित मामलों की भरमार है। अक्सर देखा गया है कि जनता की तीव्र भावना को शांत करने के लिए त्वरित फैसले लिए जाते हैं, लेकिन बाद में उच्च न्यायालयों में वे टिक नहीं पाते।
भारतीय न्याय प्रणाली की मूल भावना यह है कि "दोषी भले छूट जाए, लेकिन निर्दोष को सजा न मिले।"
यही कारण है कि आरोपी के पास जिला कोर्ट के बाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार होता है। ऐसे में ‘त्वरित न्याय’ अक्सर सिर्फ एक परिभाषा बनकर रह जाता है- वास्तविकता नहीं।
पॉक्सो अधिनियम भारत के सबसे संवेदनशील और आवश्यक कानूनों में से एक है, लेकिन यदि इसका क्रियान्वयन धीमा, ढीला और असंगठित हो, तो यह बच्चों के साथ अन्याय ही कहलाएगा। मध्यप्रदेश में फास्ट ट्रैक कोर्ट में पॉक्सो मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन उनका निपटारा वर्षों तक लटकता है। यह राज्य की न्याय प्रणाली की एक गंभीर चुनौती है।
आज जरूरत है कि सरकार, न्यायपालिका, समाज और मीडिया- सभी एक साथ मिलकर यह सुनिश्चित करें कि "बचपन की रक्षा सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि समय पर न्याय से होती है।"
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