प्रचंड की भारत यात्रा के मायने: एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ के विकास की नई इबारत
ये वही प्रचंड हैं जो किसी ज़माने में कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बेहद प्रगतिशील और क्रांतिकारी नेता हुआ करते थे और जो पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद संविधान संशोधन कर नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा देना चाहते थे। लेकिन लगता है इतने सालों में उनकी सोच बदल गई है और वह भी अब हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के समर्थक हो गए हैं।
ये वही प्रचंड हैं जो किसी ज़माने में कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बेहद प्रगतिशील और क्रांतिकारी नेता हुआ करते थे और जो पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद संविधान संशोधन कर नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा देना चाहते थे। लेकिन लगता है इतने सालों में उनकी सोच बदल गई है और वह भी अब हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के समर्थक हो गए हैं।
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नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की भारत यात्रा से पहले उनकी सरकार में सहयोगी और पूर्व प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली ने ये सवाल उठाया था कि क्या प्रचंड भारत के प्रधानमंत्री के सामने वो सारे मुद्दे उठाएंगे जो उनके कार्यकाल में विवाद की वजह बने थे चाहे वह विवादित नक्शे का मामला हो या सीमा से जुड़े मामले। यह माना भी जा रहा था कि बुधवार की रात भारतीय सुरक्षा सलाहवार अजीत डोभाल के साथ हुई मुलाकात के दौरान भी शायद ये मामले उठे हों, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।
दरअसल, दोनों देशों के शीर्ष नेता जब मिले तो पूरी गर्मजोशी से मिले और दोनों देशों के बीच जो समझौते हुए, उससे बेशक दोनों देशों की जनता को कई फायदे होने की उम्मीद जताई जा रही है। खासकर बिजली के क्षेत्र में हुए अहम समझौते, आने वाले 10 सालों में 10 हजार मेगावाट बिजली आयात का लक्ष्य, नई तेल पाइपलाइन, पर्यटन से लेकर क्यूआर कोड के जरिये व्यापारिक लेन देन जैसे समझौते अहम माने जा रहे हैं।
नेपाल प्रेस के मुख्य संपादक मात्रिका पौडेल ने काठमांडू से फोन पर बताया कि नेपाल की जनता को प्रचंड की इस यात्रा से काफी उम्मीदें हैं और दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर जिस तरह के तनाव का माहौल दिखता रहा है, इस यात्रा से अब वह बदलेगा।
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खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पेट्रोलियम पाइपलाइन भंडारण और दीर्घकालिक विद्युत व्यापार समझौते किए, उससे यहां के लोगों को काफी लाभ होगा। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को खत्म करने की कोशिश अहम होगी और इससे पर्यटन के क्षेत्र में भी फायदा होगा।
मात्रिका बताते हैं कि सियासी तौर पर देखें तो जाहिर है के पी शर्मा ओली इस यात्रा को लेकर कोई खास उत्साहित नहीं हैं और उनका यही मानना है कि जबतक विवादित मुद्दे नहीं उठाए जाएंगे, तबतक यात्रा का कोई लाभ नहीं है। हां, भौगोलिक तौर पर भारत के साथ व्यापारिक समझौते चीन की तुलना में बेशक व्यावहारिक और बेहतर होंगे।
नेपाल मामलों के विशेषज्ञ और ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा प्रचंड की इस भारत यात्रा को एक अलग नज़रिये से देखते हैं। उनका कहना है कि ये वही प्रचंड हैं जो किसी ज़माने में कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बेहद प्रगतिशील और क्रांतिकारी नेता हुआ करते थे और जो पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद संविधान संशोधन कर नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा देना चाहते थे। लेकिन लगता है इतने सालों में उनकी सोच बदल गई है और वह भी अब हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के समर्थक हो गए हैं। वैसे यह बात तो समझ ही लेनी चाहिए कि नेपाल का कोई भी प्रधानमंत्री हो, अगर वह अपनी जनता का हित चाहता है तो उसे भारत के साथ अपने रिश्ते मधुर रखने ही पड़ेंगे।
किसी तरह के टकराव की स्थिति उसके लिए नुकसानदेह ही साबित होगी। ये उस देश की भौगोलिक मजबूरी भी है क्योंकि नेपाल तीन तरफ से भारत से घिरा हुआ है। एक तरफ से चीन है, लेकिन वहां तक पहुंचना भागोलिक तौर पर बहुत आसान नहीं है। यह आम धारणा भी है कि जब नेपाल का कोई भी प्रधानमंत्री बनता हो तो वह सबसे पहले भारत आता है, लेकिन जब ओली पहली बार प्रधानमंत्री बने तो वह भारत से पहले चीन चले गए। इससे भारत में उनके प्रति धारणा बदल गई और यह माना जाने लगा कि यह माओवादी प्रधानमंत्री चीन की तरफ ज्यादा झुकाव रखता है।
आनंद स्वरूप वर्मा बताते हैं कि जब 2015 में नेपाल का नया संविधान बना तब भारत से तत्कालीन मंत्री सुषमा स्वराज और नेपाल मामलों को देख रहे भगत सिंह कोश्यारी वहां गए और प्रचंड से मुलाकात की थी। उसके बाद अखबारों में छपा कि कोश्यारी ने प्रचंड से साफ तौर पर कहा कि नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बना रहने दें ताकि जो हमारे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंध हैं, वह और गहरे बने रहें। तब भी प्रचंड ने इस बारे में कोश्यारी को भरोसा दिलाया था।
और अब वह भारत में मौजूदा प्रधानमंत्री से मिलकर इस अवधारणा को और मजबूत कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह वही प्रचंड हैं जो किसी जमाने में क्रांतिकारी सोच और धर्मनिरपेक्षता की बात करते थे। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद शायद यह उनकी मजबूरी भी कह सकते हैं। लेकिन सबसे अहम बात नेपाल की जनता के हित में अगर कोई समझौता होता है, तो वह बेशक कहीं न कहीं फायदेमंद होगा।
आनंद स्वरूप वर्मा प्रचंड की इस यात्रा को इसलिए और महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि उनकी नज़र में अपने देश से हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को खत्म करके एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की बात करने वाला प्रधानमंत्री आज उस प्रधानमंत्री से मिल रहा है जो एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोशिश में लगा है। वह कहते हैं कि दोनों देशों के बीच समझौते तो होते रहेंगे लेकिन इस दृष्टि से यह यात्रा मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण है। वैसे भी बहुत से पुराने ऐसे समझौते हैं जो लंबे समय से लंबित पड़े हुए थे, जो नेपाली जनता के हित में हैं और कोई भी प्रधानमंत्री चाहेगा कि वह समझौते हों। जाहिर है उस लिहाज से जो भी समझौते हो रहे हैं वह दोनों देशों के लिए जरूरी भी हैं।
के पी शर्मा ओली के ज़माने में जो भारत के साथ नेपाल के रिश्ते बिगड़े, उस सवाल पर आनंद स्वरूप वर्मा कहते हैं कि ओली को कम्युनिस्टों के बीच हमेशा से भारत समर्थक माना जाता था, लेकिन पीएम बनने के बाद जब वह पहले चीन चले गए तो यह धारणा बदल गई। दरअसल भारत ने नेपाल की जब आर्थिक नाकेबंदी कर दी और कई महीने तक वहां व्यापारिक आवागमन बंद रहा, तब ओली ने चीन की मदद ली और इसके लिए पहले से ही तैयार बैठे चीन ने मौके का फायदा उठाया और कई सारी विकास परियोजनाएं नेपाल में शुरु कर दीं। चीन का नेपाल में अब इतना दबदबा है कि चाहे ओली की भारत यात्रा हो, या प्रचंड की, उससे पहले चीन का उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल नेपाल आ जाता है।
अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और नेपाली पीएम प्रचंड की साझा प्रेस कांफ्रेंस पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि इसमें खास तौर से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान की बात, धार्मिक समझौते के तहत रामायण सर्किट से संबंधित परियोजनाओं का पूरा किया जाना अहम है। ट्रांजिट समझौतों, रेल संपर्क बढ़ाने और विद्युत व्यापार जैसे अहम समझौतों के अलावा तेल पाइपलाइन के विस्तार, नई तेल पाइपलाइन और दोनों देशों के बीच वित्तीय संपर्क को आसान बनाने की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
मात्रिका पौडेल कहते हैं कि सियासत अपनी जगह है लेकिन भारत हमेशा से नेपाल की मदद करता रहा है और बड़े भाई की तरह हमारे विकास में भागीदार रहा है, ऐसे में प्रचंड का यह दौरा बेशक नेपाल की जनता के लिए बेहद अहम और आने वाले वक्त में दोनों देशों के बीच और गहरे रिश्ते की नई बुनियाद रखने वाला है।