महिला खिलाड़ी और खेलतंत्र का मर्दवादी रवैया: क्यों पहनने पड़ते हैं छोटे कपड़े?
पुरुषवादी समाज महिला एथलीटों के प्रति एक ख़ास रवैया रखता है और यही कारण है कि महिला खिलाड़ियों की प्रतिभा को दरकिनार कर उनके कपड़ों, उनके लुक पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
किसी भी खिलाड़ी का मूल्यांकन करते हुए उसकी एथलैटिक क्षमता और उसकी निपुणता पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है लेकिन महिला खिलाड़ियों के मामले में तस्वीर बिलकुल उलटी दिखती है।
नूतन यादव महिला समानता और लैंगिक मुद्दों पर लगातार लिखती रही हैं। इस लेख के माध्यम से उन्होंने खेल की दुनिया के भीतर महिला खिलाड़ियों की ड्रेस कोड और उसे लेकर मौजूद मानसिकता पर गंभीर और सार्थक सवाल उठाएं हैं-
विस्तार
पुरुषवादी समाज महिला एथलीटों के प्रति एक ख़ास रवैया रखता है और यही कारण है कि महिला खिलाड़ियों की प्रतिभा को दरकिनार कर उनके कपड़ों, उनके लुक पर अधिक ध्यान दिया जाता है। किसी भी खिलाड़ी का मूल्यांकन करते हुए उसकी एथलैटिक क्षमता और उसकी निपुणता पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है लेकिन महिला खिलाड़ियों के मामले में तस्वीर बिलकुल उलटी दिखती है। उनके खेल को उनके द्वारा बनाए गए रिकॉर्ड्स को छोड़कर उनके कपड़ों, दैहिक गठन, उनकी त्वचा आदि पर बात की जाती है। अगर वह गर्भवती हो गईं तब तो यह मान लिया जाता है कि उनका करियर खत्म हो गया।
आमतौर पर महिला खिलाड़ियों की सुडौल मांसपेशियों वाली देह को बहुत सकरात्मक रूप से नहीं देखा जाता। उदाहरण के लिए महिला बॉक्सर की मसल्स वाली देह को देखने से पुरुष परहेज करते हैं। यहां तक कि वे महिलाएं जो बॉडी-बिल्डिंग से जुडी हैं उनकी बॉडी भी पुरुषों की बॉडी जैसे सराहना नहीं पाती। अपनी सुगठित देह को लेकर वे बॉडी शेम्ड हो जाती हैं।
वहीं दूसरी ओर टेनिस और स्केटिंग जैसे खेलों में महिला खिलाड़ियों की मजबूत जांघों पर मर्दवादी समाज की नजर हमेशा बनी रहती है। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में टेनिस खिलाड़ियों की स्कर्ट की लंबाई का मुद्दा हमेशा छाया रहता है। पूरी दुनिया में सेरेना विलियम्स से लेकर सानिया मिर्ज़ा तक की जांघों और स्कर्ट की लम्बाई पर अलग-अलग तरह के विचार देखने को मिलते हैं।
अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में आकर्षक और सुन्दर महिला खिलाड़ियों के उत्तेजक पोज़ दिखते हैं, वहीं पुरुष खिलाड़ियों की तस्वीरों के केंद्र में उनकी परफॉरमेंस उनके परिश्रम को दिखाती तस्वीरें प्रमुखता से छापी जाती हैं। महिला खिलाड़ियों के पसीने से भीगी देह देखने को लोग लालायित भी रहते हैं।
2020 (2021) ओलिंपिक में ही नॉर्वे की बीच हैंडबॉल महिला टीम का रुख
महिला खिलाड़ियों के साथ हुए भेदभाव की ऐसी खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं। टोक्यो ओलंपिक में रविवार को जर्मनी की महिला जिम्नास्ट की टीम क्वालीफाइंग राउंड के दौरान अन्य प्रतियोगियों द्वारा पहनी गई पारंपरिक बिकनी-कट लियोटार्ड्स के बजाय यूनिटार्ड पहनकर बाहर निकलीं। इस तरह खेलों में महिलाओं के सेक्सुअलाइजेशन (sexualization) के खिलाफ एक कड़ा काम उठाया। सारा वॉस, पॉलीन शेफ़र-बेट्ज़, एलिज़ाबेथ सेट्ज़ और किम बुई की यह चार सदस्यी टीम ने गुरूवार को हुए प्रशिक्षण के दौरान ही यूनिटार्ड पहन रखे थे।
टीम की एक सदस्य सारा वॉस कहती हैं- हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कपड़ों में हर कोई सहज महसूस करे और हम सभी को दिखाना चाहते हैं कि वे जो चाहें पहन सकते हैं और अद्भुत दिख सकते हैं, अद्भुत महसूस कर सकते हैं, चाहे वह लंबे लियोटार्ड में हो या छोटे में। वॉस ने यह भी कहा कि उनकी टीम सभी महिलाओं के लिए "रोल मॉडल" बनना चाहते हैं और टीम के इस साहसिक कदम के लिए अन्य महिला एथलीटों ने भी उनकी सराहना की है। इस टीम ने पहली बार अप्रैल में हुई यूरोपीय चैंपियनशिप के दौरान बॉडीसूट पहने थे।
2021 ओलिंपिक में ही नॉर्वे की बीच हैंडबॉल महिला टीम ने एक हैरतअंगेज कारनामा कर दिखाया है। उन्होंने अपने खेल में पारम्परिक रूप से पहने जाने वाली बिकनी ड्रेस को छोड़ बड़े शॉर्ट्स पहने। नार्वे की महिला बीच हैंडबॉल टीम पर खेल के यूरो 2021 टूर्नामेंट में एक खेल के दौरान बिकनी बॉटम्स में खेलने से इनकार करने पर जुर्माना भी लगाया गया था।
यूरोपीय हैंडबॉल एसोसिएशन के डिसिप्लिनरी कमिशन के एक बयान के अनुसार इम्प्रॉपर क्लोथिंग के लिए टीम पर कुल 1,500 यूरो (1,700 डॉलर) का जुर्माना लगाया गया था। महिला टीम द्वारा शॉर्ट्स पहने जाने का अपनी सरकार की ओर से समर्थन मिला और साथ ही सोशल मीडिया पर लोगों का सराहना और भरपूर समर्थन मिला।
दरअसल, नॉर्वे ने 2006 से बीच हैंडबॉल में शॉर्ट्स को आधिकारिक तौर पर स्वीकार्यता प्रदान किए जाने के लिए अभियान चलाया हुआ है। केवल महिला टीम द्वारा पहनी जाने वाली बिकनी को लेकर परम्परावादी खेल समीक्षकों का कहना है कि उनकी मूवमेंट में किसी तरह की बाधा नहीं आती, लेकिन खिलाड़ियों को इस तरह की बिकनी पहनने में कई तरह की समस्याएं आती थीं। साथ ही उन्हें बिकनी को बार-बार खींचकर ठीक करते रहना पड़ता था जबकि बीच हैंडबॉल की पुरुष टीम को इस तरह के कपड़े नहीं पहनने पड़ते और उन पर किसी तरह का कोई दबाव भी नहीं डाला जाता। इस तरह के शरीर दिखाने वाले कपड़े पहने महिला खिलाड़ी लोगों और मीडिया की आंखों को बहुत सुहाती हैं। फैशन इंडस्ट्री को इस तरह की छवियां बेचने में लाभ होता है।
जब ओलिविया ब्रीन के स्प्रिन्टिंग शॉर्ट्स पर सवाल
हाल ही में एक महिला खिलाड़ी के कपड़ों पर अनुचित टीका टिप्पणी का एक और मामला सामने आया है। पैरालिंपियन ओलिविया ब्रीन के स्प्रिंटिंग शॉर्ट्स को अंग्रेज अधिकारियों ने अनुचित बताया। दो बार की पैरालंपिक विश्व चैंपियन रहींं ओलिविया ब्रीन ने बताया कि वे उस समय अवाक रह गईं जब इंग्लिश चैंपियनशिप के अधिकारियों ने उनके स्प्रिन्टिंग शॉर्ट्स को अत्यंत छोटा और बेढंगा बताया। बता दें कि 24 वर्षीय ब्रीन को सेरेब्रल पाल्सी नाम रोग है।
ब्रीन ने बीते रविवार की शाम ट्विटर पर इस घटना की बाबत पोस्ट किया कि यह घटना उस दिन इंग्लिश चैंपियनशिप में लंबी कूद प्रतियोगिता खत्म करने के बाद घटी। ख़ास शैली में बने इन शॉर्ट्स के बारे में वे कहती हैं-
मैं वर्षों से इसी तरह के शॉर्ट्स पहनती आई हूं और इन्हें ख़ास इन प्रतियोगिताओं के लिए ही डिजाइन किया गया है। टोक्यो ओलंपिक्स में भी मैं इसी तरह के शॉर्ट्स पहनूंगी। क्या यही सवाल पुरुष प्रतियोगियों के शॉर्ट्स पर भी उठाए जाएंगे? हम 18 वीं सदी में नहीं जी रहे हैं। मैंने अपने 9 साल के करिअर में हमेशा इसी तरह के शॉर्ट्स पहने हैं। मैं चाहती हूं कि अंग्रेज अधिकारियों द्वारा थोपे गए कड़े नियम बदले जाएं।
कट्टरपंथी जमात और खिलाड़ी
महिला खिलाड़ियों के कपड़ों के मामले में कट्टरपंथियों का पुरातनपंथी नजरिया भी भारत की प्रमुख टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा भी अपवाद नहीं है। भारत में कट्टरपंथियों ने उनकी स्कर्ट की लम्बाई पर उन्हें निशाने पर लिया था। 2005 में कट्टर मुस्लिम संगठन सुन्नी उलेमा बोर्ड ने सानिया मिर्ज़ा को पथभ्रष्ट बताते हुए कहा कि वह युवा मुस्लिम लड़कियों को इस्लाम के रास्ते से हटाने का काम कर रही है। बोर्ड ने सानिया के खिलाफ एक फतवा भी जारी किया और उसे मैचों के दौरान पूरे कपड़े पहन कर खेलने के लिए कहा गया और साथ ही उसके कपड़ों को गैर-इस्लामिक करार दिया।
सानिया का कट्टरपंथियों के बयान पर कहना था-
अगर मैं खेल में जीत हासिल कर रही हूं तो मेरी स्कर्ट के 6 इंच लम्बे होने या 6 इंच छोटे होने से क्या फर्क पड़ता है? मैं कैसे कपडे पहनती हूं यह मेरा निजी मामला है।
सोशल मीडिया और बेलगाम ट्रोल्स
एक तरफ जहां मीडिया टैलेंट पर सौंदर्य को तरजीह देता है, वहीं कुछ ऐसे उदाहरण भी देखने को मिलते हैं जहां वे अलग दिखने की चाह रखने वाले महिला खिलाड़ियों की भरसक आलोचना भी करता है। रेबेका एडलिंगटन एक तैराक हैं जिन्होंने अपने नाम चार ओलंपिक पदक किए हैं। स्वर्ण पदक विजेता रेबेका ने जब अपनी नाक की सर्जरी करवाई तो ट्विटर पर उनकी खिल्ली उड़ाई गई और उन्हें बुरी तरह से ट्रोल किया गया। एक मशहूर कॉमेडियन ने तो उनकी नाक की तुलना डॉल्फिन से कर से डाली।
दरअसल, मीडिया में बहुत से लोगों ने एक तरफ उनकी नाक का मजाक बनाया तो कई आलोचकों ने उनके समर्थन में आगे बढ़कर यह भी कहा कि अगर हम महिला की खेल प्रतिभा के ऊपर उसके चेहरे-मोहरे और उनके रूप रंग को प्राथमिकता देंगे तो हम अन्य महिला खिलाड़ियों को देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए किस तरह प्रोत्साहित करेंगे?
समाज द्वारा गढ़ी गई सौंदर्य की विक्षिप्त परिभाषाओं को महिला खिलाड़ियों को ही आगे बढ़कर तोड़ना होगा। महिला तैराकों को तो सपाट वक्ष या फ़्लैट चेस्ट भी कहा जाता है। ट्विटर पर उनकी स्पोर्ट्स ब्रा को लेकर बेहूदे कमैंट्स भी किए जाते रहे हैं।
हाल ही में द गार्जियन अखबार ने स्पोर्ट इंग्लैंड की एक रिपोर्ट के आधार पर लिखा कि कुछ महिलाओं पर किए गए सर्वेक्षण में 75% महिलाओं ने बताया कि वे खेलों में भाग लेना चाहती थीं लेकिन समाज और मीडिया द्वारा उनके रूप रंग और शारीरिक गठन के कारण उनके बारे में राय न बना लेने के डर से उन्होंने अपने कदम पीछे हटा लिए।
दरअसल, जहां खेलों को महिलाओं के लिए समान अधिकार लाने में एक ठोस भूमिका निभानी चाहिए थी उसके उलट वह सोशल मीडिया ट्रोल्स को महिलाओं की आलोचना करने के नए नए विषय प्रदान कर रहा है। उनके कपड़े उनके शरीर को एक खिलाड़ी की तरह नहीं बल्कि किसी मॉडल की तरह देखने के लिए बाध्य करता है।
मीडिया और समाज को इन मर्दवादी विचारों को बदलना ही होगा अन्यथा लैंगिक समानता का लक्ष्य एक सपना ही बना रहेगा।
नूतन यादव स्त्री मुद्दों पर लगातार लिखती रही हैं- उन्होंने 'नारी-छवि के निर्माण में हिंदी की लोकप्रिय पत्रिकाओं में प्रकाशित विज्ञापनों की भूमिका' विषय पर पीएचडी की है।
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