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पश्मीना: एक जीवंत संस्कृति, जानें कहां होता है इसका उगम

Mon, 15 Jul 2024 03:53 PM IST
Ajay Bijur अजय बिजूर
Updated Mon, 15 Jul 2024 03:53 PM IST
सार

उत्तरी तिब्बत एक बहुत बड़ा पहाड़ी मैदानी इलाका है जिसे चांगथांग के नाम से जाना जाता है। चांगथांग- चांग यानि उत्तर और थांग यानि मैदान इन दो तिब्बती शब्दों का जोड़ है। चांगथांग लगभग 25 लाख वर्ग कि.मी. इलाके में फैला है जिसमें से लगभाग 17,000 वर्ग कि.मी. हिस्सा लद्दाख के पूर्वी भाग में पड़ता है।

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Pashmina A vibrant culture know where it originates
चांगपा समुदायों के लिए उनके जानवर सबसे महत्वपूर्ण हैं। - फोटो : अजय बिजूर

विस्तार

क्या आपने पश्मीना के बारे में सुना है? हो सकता है आपने सुना हो कि ये दुनिया का सबसे मुलायम धागा है। सत्रहवीं शताब्दी में पश्मीना से बने कश्मीरी शॉल पश्चिमी देशो में बहुत मशहूर हुए। आज भी पश्मीना दुनिया भर में कश्मीर और भारत की पहचान है। दरअसल, इसी वजह से पश्मीना को दुनिया भर में ‘कैशमेयर’ के नाम से भी जाना जाता है। अब अगर मैं आप से पूछूं कि पश्मीना कहां बनता है तब आप क्या कहोगे? कश्मीर में? चीन से आता है? या कहीं और से? चलिए आज हम आप को ले चलते हैं उन ऊंची पहाड़ी वादियों में जहां पश्मीना का उगम होता है।
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उत्तरी तिब्बत एक बहुत बड़ा पहाड़ी मैदानी इलाका है जिसे चांगथांग के नाम से जाना जाता है। चांगथांग- चांग यानि उत्तर और थांग यानि मैदान इन दो तिब्बती शब्दों का जोड़ है। चांगथांग लगभग 25 लाख वर्ग कि.मी. इलाके में फैला है जिसमें से लगभाग 17,000 वर्ग कि.मी. हिस्सा लद्दाख के पूर्वी भाग में पड़ता है। चांगथांग में रहनेवाले लोगों को चांगपा के नाम से जाना जाता है और इनके जीवन बसर करने का तरीका बिलकुल निराला है।
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चांगथांग का अधिक्तम् हिस्सा 4,000 मीटर की ऊंचाई से ऊपर है। क्या आप सोच सकते हैं कि 4,000 मीटर पर जीने में किस तरह की दिक्कतें आती होगी? अव्वल तो यहां बहुत ज्यादा ठंड होती है, खास कर जादे में जब तपमान -35C तक गिर जाता है। चांगपा समुदाय जिन स्थानों में बस्ते हैं वो अति दुर्गम है। तो यहाँ कोई कैसे और क्यों जीता है? 
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चांगपा सदियो से पशुपालन करते आ रहे हैं। क्योंकि यहां के हालात कृषि के योग्य नहीं हैं, पशुपालन उनके पास एक मात्रा विकल्प है। और क्योंकि इन ऊंचाइयों में घास की उपज सीमित मात्रा में होती है चांगपा समुदाय घुमंतू जीवन बसर करते हैं। लद्दाख में चांगपा समुदाय अलग-अलग घाटियों में रहते हैं। हर बड़ी घाटी में रहने वाले समुदाय को एक गांव की तरह देखा जा सकता है। लद्दाख चांगथांग में कुल 22 समुदाय हैं और हर समुदाय में 20 से 300 परिवार हैं।

हर परिवार में 5-6 लोग होते हैं और सारा परिवार रेबो में रहता हैं। रेबो एक खास प्रकार का तंबू है जिसे याक के बाल से बनाया जाता था और ये सर्दी-गर्मी दोनों में काम देता है। चांगपा मानते हैं कि सर्दियों में रेबो गरम रहता है और गर्मियों में ठंडा। जब एक घाटी से दूसरी घाटी जाने का समय आता है तब पूरा परिवार अपना रेबो समेट कर अगले पड़ाव के लिए चल देते हैं। हर पड़ाव पर गांव 2 से 3 महीने बिताता है। इस तरह पूरा गांव साल भर पूर्वनिर्धारित घाटियों में समय बिताता है।

घर के हर सदस्य को काम में हाथ जुटाना पड़ता है। पशुओं को सुबह पहाड़ों में ले जाना और शाम होते होते लौटना दिन का सब से बड़ा काम है। सर्दीयों के लिए गोबर चुगने का काम भी साल भर करना पड़ता है। ये सब और इसके अलावा सभी घरेलू काम परिवार के महिलाएं और पुरुष मिलकर करते हैं। एक घाटी से दूसरी घाटी जाने के निर्णय गांव के मुखिया - जिसे गोबा कहते हैं - द्वार किया जाता है।

हर गांव अपना गोबा एक से तीन साल की अवधि के लिए नियुक्त कर्ता है। गोबा की जिम्मेदारी हर परिवार को निभानी पड़ती है। गोबा का काम मुश्किल है और इसे निशुल्क सेवा के तौर पर किया जाता है। याद रहे कि गोबा, पंचायत प्रधान से अलग है और ये रिवाज चांगपा समाज में कई सदियों से पाला जा रहा है। गांव के बड़े फैसलो में गोबा गांव के लोगों की राय लेते हैं। 

चांगपा समुदायों के लिए उनके जानवर सबसे महत्वपूर्ण हैं। इनमें याक, घोड़े, गधे और भेड़-बकरियां शामिल हैं। और रही बात पश्मीन की, तो वो इन्हीं बकरियों के बाल से बनता है। चांगथांग में पाली जाने वाली बकरियां सर्दियां में खास किसम के बाल उगते हैं जिससे वो अत्यधिक ठंड बर्दाश्त कर पाती हैं। हर साल गर्मियों में बकरियों के बाल झड़ने लगते हैं जिन्हें चांगपा कंघी करके निकाल लेते हैं। हर साल जून-जुलाई के महीनों में चंपगा पश्मीना के बाल निकालने के काम में व्यस्त हो जाते हैं।

इस चारागाही समुदाय के लिए ये साल का सब से महत्वपूर्ण फसल है। इन बालों को व्यापारी 3,000 रुपये प्रति किलो के दाम से खरीद लेते हैं। इन्ही बालों को साफ़ करके पश्मीना धागे बनने तक इनकी कीमत 16,000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। पश्मीना धागों से शाल बुनाई करने का हुनर कश्मीर घाटी में सदियों से रहा है। चांगथांग और कश्मीर का ये नाता कम से कम 400 साल पुराना है। अधिकार लोग पश्मीना को कश्मीर के साथ जोड़ते हैं पर चांगथांग के बारे में कम लोगों को पता है।

भारत के कई जनजाति समुदायों की तरह चांगपा ज़मीन से जुड़े हैं और पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर हैं। चांगपा समाज का सारा संगठन उन्हें मुश्किल हालात से संघर्ष करने में मददगार रहा है। पश्मीना इन्हीं समुदायों के मंथन से बनता है। पश्मीना सिर्फ एक धागा नहीं बल्कि हजारों साल से चली आ रही एक जीवंत संस्कृति है जिसे चांगथांग के लोग आज भी जी रहे हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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