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परिवार और संस्कारः रिश्तों और संबंधों को लेकर आखिर क्या सीख रहे हैं बच्चे?

Sun, 24 Jan 2021 09:39 AM IST
Kanchan Singh कंचन सिंह
Updated Sun, 24 Jan 2021 09:39 AM IST
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parenting issues in indian family and upbringing of children
हर चीज़ का एक विकास क्रम होता है और चीज़ें उसी हिसाब से विकसित हो तो संतुलन बना रहता है। - फोटो : pixabay

हर चीज़ का एक विकास क्रम होता है और चीज़ें उसी हिसाब से विकसित हो तो संतुलन बना रहता है। यही बात बच्चों के लिए भी लागू होती है, मगर आजकल के हालात को देखते हुए तो लग रहा है बच्चे उम्र से काफी पहले ही बड़े होते जा रहे हैं और बच्चों का यह बढ़ना पैरेंट्स के लिए राहत नहीं, बल्कि चिंता की बात है।

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मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं, क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने अपनी 7 साल की बेटी के मुंह से जो कुछ सुना उसे सुनकर स्तब्ध रह गई और समझ नहीं पाई कि उसकी बात पर कैसे प्रतिक्रया दूं। मेरे सामने बैठी मेरी भाभी ने बस इशारा किया कि बेटी को डांटिए मत, वरना जो आज आपसे बातें शेयर कर रही है, कल को कुछ नहीं बताएगी, मुझे उनकी बात सही लगी, इसलिए मैंने उसकी बातों को घुमा दिया।
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क्या कहा मां ने बेटी से?  
जानना चाहेंगे क्या कहा था 7 साल की बच्ची ने, रात को खाने के समय वह अचानक कहती है, ‘ममा आपको कुछ बात बतानी है’ मैंने कहा हां बोले, वह बोली, ‘मेरे क्लास में वो आराध्या है न वह कह रही थी कि दिव्या अभिनव को लव करती है।’ क्या यह सुनकर आपको अजीब नहीं लगा? मैं तो बुरी तरह चौंक गई थी, इतनी छोटी उम्र में बच्चों को ऑपोज़िट जेंडर के प्यार की बातें कैसे समझ आती है? जिस उम्र में उन्हें सारे क्लासमेट सिर्फ दोस्त होते हैं बात समझनी चाहिए उस उम्र में ऐसी बातें... क्या यह चिंता का विषय नहीं है। 
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बच्चों में संस्कार ही उनकी परवरिश की सही दिशा तय करते हैं। - फोटो : फाइल फोटो

खैर, बेटी को तो मैंने समझा दिया कि बेटे क्लास में सब दोस्त होते हैं और किसी के बारे में ऐसा नहीं कहते सब सिर्फ दोस्त हैं। मगर आज तो समझा दिया कल कुछ और ऐसी ही बात हुई तो किस तरह हैंडल करुंगी यही सोचकर परेशान रहती हूं।

आखिर क्यों और कैसे सीख रहे हैं बच्चे?  
पहले जहां बड़ी क्लास में जाने पर बच्चों की संगत और उनके व्यवहार को लेकर चिंता करने की ज़रूरत पड़ती थी, अब तो पहली-दूसरी क्लास से ही उनकी हर हरकत, उनके हर व्यहार को बारीकी से परखने की ज़रूरत है, पता नहीं हमारी पीठ पीछे बच्चे क्या सीख रहे हैं।

हालांकि बच्चों के उम्र से पहले बड़े होने के इस ट्रेंड के लिए टीवी और सोशल मीडिया जितना ज़िम्मेदार है, शायद उतने ही ज़िम्मेदार हम पैरेंट्स भी हैं। बच्चे ने थोड़ा सा रोना शुरू किया नहीं कि उसके हाथ में स्मार्टफोन थमा देते हैं फिर उसके जो जी में आए वो देखे। बॉलीवुड के लटके-झटके वाले गानों पर किसी वयस्क की तरह ही उनकी अदाएं देखकर खूब खुश होते हैं... क्या ये सही है?

 

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बच्चों को बहलाने के लिए उनसे बातें करें ना की उन्हें मोबाइल फोन थमा दिया जाए। - फोटो : फाइल फोटो

मोबाइल से दूर रखें अपने बच्चों को 
बच्चे को अव्वल तो मोबाइल से दूर रखने की कोशिश करें। और यदि दे रहे हैं तो इस बात पर नज़र रखें कि वह टीवी और मोबाइल पर किस तरह के कार्यक्रम यहां तक कि कार्टून देखता है। बच्चों को लेकर बॉलीवुड फिल्म देखने न ही जाएं तो अच्छा है। उन्हें उम्र के हिसाब से धीरे-धीरे चीज़ें समझाना शुरू करें।

प्यार का मतलब सिखाएं, मगर इन सबमें बहुत ज़्यादा इन्वॉल्व न करें, उससे कहें कि वह अभी बहुत छोटे हैं इसलिए पढ़ाई पर अपना पूर फोकस रखें और बेहतर होगा कि बच्चों को क्रिएटिव एक्टिविटी में बिज़ी रखें ताकि वह इंटरनेट और टीवी पर कम से कम समय बिताएं। सबसे महत्वपूर्ण है बच्चे का विश्वास आप पर बना रहे। इस बात का ध्यान रखें, क्योंकि ये विश्वास रहेगा तभी वह आपसे हर बात शेयर करेगा। 

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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