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पुण्यतिथि विशेष: दादा माखनलाल जी ने देखा था पत्रकारिता के विश्वविद्यालय का सपना

Professor Dwivedi प्रो. संजय द्विवेदी
Updated Wed, 28 Jan 2026 01:35 PM IST
सार

माखनलाल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कवि, लेखक, पत्रकार, संपादक, स्वतंत्रता सेनानी अनेक भूमिकाओं में सामने आते हैं। वे अप्रतिम वक्ता भी थे।

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Pandit Makhanlal Chaturvedi Punyatithi special story
आजादी के बाद 30 अप्रैल, 1968 तक वे जीवित रहे पर सत्ता का लोभ उन्हें स्पर्श भी नहीं कर पाया। - फोटो : instagram

विस्तार

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जनसंचार और पत्रकारिता की शिक्षा आज एक विशिष्ट अनुशासन बन चुकी है। देश में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा पर केंद्रित चार विश्वविद्यालय कार्यरत हैं, लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने ही सबसे पहले पत्रकारिता विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) का सपना देखा था। उन्होंने भरतपुर(राजस्थान) में 1927 में आयोजित संपादक सम्मेलन में कहा था-

“हिंदी समाचार पत्रों में कार्यालय में योग्य व्यक्तियों के प्रवेश कराने के लिए, एक पाठशाला आजकल के नए नामों की बाढ़ में से कोई शब्द चुनिए तो कहिए कि एक संपादन कला के विद्यापीठ की आवश्यक्ता है। ऐसी विद्यापीठ किसी योग्य स्थान पर बुद्धिमान, परिश्रमी, अनुभवी, संपादक-शिक्षकों द्वारा संचालित होना चाहिए। उक्त पीठ में अन्यान्य विषयों का एक प्रकांड ग्रंथ संग्रहालय होना चाहिए।”

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यह संयोग ही है कि उनके इस स्वप्न को 1990 में मध्यप्रदेश सरकार ने साकार करते हुए उनके नाम पर ही भोपाल में पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की। बाद के दिनों में रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय और जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इसके साथ ही दो साल पूर्व भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) को भी डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल चुका है। यह बात बताती है कि हमारे पुरखे किस तरह अपनी विधा को अकादमिक रुप से स्थापित होते देखना चाहते थे। 

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माखनलाल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कवि, लेखक, पत्रकार, संपादक, स्वतंत्रता सेनानी अनेक भूमिकाओं में सामने आते हैं। वे अप्रतिम वक्ता भी थे। इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा-

“हम सब लोग तो बात करते हैं, बोलना (भाषण) तो माखनलाल जी ही जानते हैं।” इतना ही नहीं राष्ट्रपिता ने कहा- “मैं बाबई जैसे छोटे स्थान पर इसलिए जा रहा हूं क्योंकि वह माखनलालजी का जन्मस्थान है, जिस भूमि ने माखनलालजी को जन्म दिया, उसी भूमि को मैं सम्मान देना चाहता हूं।”

यह संयोग ही है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और माखनलाल जी पुण्यतिथि एक ही दिन 30 जनवरी को मनाई जाती है। चर्चित शायर श्री फिराक गोरखपुरी भी माखनलाल जी कलम के प्रशंसक थे। उनका कहना था कि-

“उनके लेखों को पढ़ने से ऐसा मालूम होता था कि आदि-शक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। यह शैली हिंदी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई है। मुझ जैसे हजारों लोंगो ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखनलाल जी  से ही सीखी।”


पं.माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में निकला ‘कर्मवीर’ एक ऐसा पत्र है, जिसकी धमक हम आज भी महसूस करते हैं। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘कर्मवीर’ एक ऐसा नाम है, जिसे छोड़कर भारतीय पत्रकारिता का समग्र मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इसी तरह उसके संपादक पं. माखनलाल चतुर्वेदी और उनकी संपूर्ण जीवनयात्रा, आत्मसमर्पण के खिलाफ लड़ने वाले संपादक की यात्रा है। वस्तुतः वे एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे और कोई मोर्चा ऐसा न था, जहां उन्होंने अपनी छाप न छोड़ी हो। सही मायने में ‘कर्मवीर’ के संपादक ने अपने पत्र के नाम को सार्थक किया और माखनलाल जी स्वयं कर्मवीर बन गए।

4 अप्रैल, 1889 को होशंगाबाद(मप्र) के बाबई जिले में जन्में माखनलालजी ने जब पत्रकारिता शुरू की तो सारे देश में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव देखा जा रहा था। राष्ट्रीयता एवं समाज सुधार की चर्चाएं और फिरंगियों को देश बदर करने की भावनाएं बलवती थीं। इसी के साथ महात्मा गांधी जैसी तेजस्वी विभूति के आगमन ने सारे आंदोलन को एक नई ऊर्जा से भर दिया। दादा माखनलाल जी भी उन्हीं गांधी भक्तों की टोली में शामिल हो गए। गांधी के जीवन दर्शन से अनुप्राणित दादा ने रचना और कर्म के स्तर पर जिस तेजी के साथ राष्ट्रीय आंदोलन को ऊर्जा एवं गति दी वह महत्व का विषय है।

इस दौर की पत्रकारिता भी कमोबेश गांधी के विचारों से खासी प्रभावित थी। हिंदी पत्रकारिता का वह जमाना ही अजीब था। आम कहावत थी – “जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।” और सच में अखबार की ताकत का अहसास आजादी के दीवानों को हो गया था। इसी के चलते स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेताओं ने अपने पत्र निकाले। जिनके माध्यम से ऐसी जनचेतना पैदा की कि भारत आजादी की सांस ले सका। वस्तुतः इस दौर में अखबारों का इस्तेमाल एक अस्त्र के रूप में हो रहा था।

माखनलाल जी ने 1913 में ‘प्रभा’ नाम की एक उच्चकोटि की पत्रिका के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता में भी सार्थक हस्तक्षेप किया। लोगों को झकझोरने एवं जगानेवाली रचनाओं के प्रकाशन के माध्यम से ‘प्रभा’ हिंदी जगत का एक जरूरी नाम बन गयी। दादा की 56 वर्षों की ओजपूर्ण पत्रकारिता की यात्रा में प्रताप, प्रभा व कर्मवीर उनके विभिन्न पड़ाव रहे। साथ ही उनकी राजनीतिक वरीयता भी बहुत उंची थी। वे बड़े कवि थे, पत्रकार थे पर उनके इन रूपों पर राजनीति कभी हावी न हो पायी। इतना ही नहीं जब प्राथमिकताओं की बात आयी तो मप्र कांग्रेस का वरिष्टतम नेता होने के बावजूद उन्होंने सत्ता में पद लेने के बजाए मां सरस्वती की साधना को ही प्राथमिकता दी।

आजादी के बाद 30 अप्रैल, 1968 तक वे जीवित रहे पर सत्ता का लोभ उन्हें स्पर्श भी नहीं कर पाया। इतना ही नहीं 1967 में भारतीय संसद द्वारा राजभाषा विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति को वह पद्मभूषण का अलंकरण भी लौटा दिया जो उन्हें 1963 में दिया गया था। वे समझौतों के खिलाफ लोगों में चेतना जगाते रहे। उन्होंने लिखा है-

अमर राष्ट्र, उदंड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र, यह मेरी बोली
यह सुधार-समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली।

‘कर्मवीर’ के संपादक कैसे संपादक थे, इसे बताने के लिए उन्होंने कहा-

“हम फक्कड़ सपनों के स्वर्गों को लुटाने निकले हैं। किसी की फरमाइश पर जूते बनानेवाले चर्मकार नहीं हैं हम। यह निर्भीकता ही उनकी पत्रकारिता की भावभूमि का निर्माण करती थी। स्वाधीनता आंदोलन की आंच को तेज करने में उनका कर्मवीर अग्रणी बना। कम ही लोग जानते होंगें कि दादा को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उनके संपादकीय कार्यालय यानी घर पर तिरसठ बार छापे पड़े, तलाशियां हुयीं। 12 बार वे जेल गए। कर्मवीर को अर्थाभाव में कई बार बंद होना पड़ा।


लेखक से लेकर प्रूफ रीडर तक सबका कार्य वे स्वयं कर लेते थे। पत्रकारिता उनके लिए राष्ट्रसेवा और समाज के जागरण का ही एक माध्यम थी। भरतपुर के संपादक सम्मेलन में वे पत्रकारिता जगत का आह्वान करते हुए कहते हैं-“यदि समाचार पत्र संसार की एक बड़ी ताकत है तो उसके सिर जोखिम भी कम नहीं है। पर्वत की जो शिखरें हिम से चमकती हैं और राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवार बनती हैं, उन्हें ऊंची होना पड़ता है। जगत में समाचार पत्र यदि बड़प्पन पाए हुए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी भारी है।बिना जिम्मेदारी के बड़प्पन का मूल्य ही क्या है? ”



(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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