पंडित गोवर्धन मिश्रा स्मृति शेष: तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला
- 'टप्पा गायन' में पंडित गोवर्धन मिश्रा का जोड़ मिलना मुश्किल था।
-
संगीत का स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
वर्ष 6 जून 2019 की सुबह 8:43 मिनट पर भारत के हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र ने एक अनमोल रत्न को खो दिया। पूरे एक वर्ष हो गए और उन्हें याद करके आंखें नम हो रही हैं। ठुमरी-दादरा तो कई गायक-गायिकाएं गाते हैंं, लेकिन 'टप्पा गायन' में पंडित गोवर्धन मिश्रा का जोड़ मिलना मुश्किल था।
वैसे तो वे बिहार के गया शहर में रहते थे, पर मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में हुई। वे किसी कार्यक्रम में प्रस्तुति देने के लिए दिल्ली आए थे। करीब ढ़ाई-तीन घंटे तक हमारी बात होती रही। उस दिन उनके पास भी वक़्त था और मेरा जिज्ञासु दिमाग वहांं से उठना नहीं चाहता था।
मैंने उनसे पूछा कि आप अपने बारे में कुछ बताएंं? तब एकदम से खुश होकर कहने लगे मेरे पिता बनारस घराने के मशहूर शास्त्रीय संगीत के गायक स्वर्गीय पंडित रामप्रसाद मिश्र उर्फ़ ' रामूजी' सन् 1939 के आसपास बनारस से कलकत्ता चले गए थे।
मेरी माता का नाम अन्नपूर्णा देवी था। मेरा जन्म 10 मई 1941 में कोलकाता में हुआ। उस समय कोलकाता देश की सांस्कृतिक राजधानी हुआ करती थी और देश के सभी बड़े कलाकार प्रस्तुति के लिए आते और कई आकर वहीं बस जाते थे। मेरे पिताजी कि गायकी शीर्ष पर थी उस वक़्त, इसलिए बचपन में मुझे कई बड़े कलाकारों के दर्शन हुए और उनकी बातचीत और गायन सुनने का मौका मिला।
उस समय बिहार के गया जिले में गया वाल पंडों की वजह से संगीत का माहौल बहुत अच्छा था। यहां के लोगों ने मेरे पिता से यहां आने का आग्रह किया। गया वाल पंडे बहुत धनी होते थे। उन्होंने पिताजी को यहां बसा लिया। जब पिताजी यहां रहने लगे तो उनकी जान पहचान तो करीब- करीब सभी बड़े कलाकारों से थी तो उनके आमंत्रण पर भारत के लगभग सभी नामी-गिरामी कलाकार गया आए और आकर प्रस्तुति दी।
गयावाल पंडे संगीत के सिर्फ प्रेमी ही नहीं बड़े संरक्षक भी थे। तो इस प्रकार मैं भी गया आ गया और मेरी पढ़ाई-लिखाई, गाने की तालीम पिताजी के संरक्षण में होने लगी। करीब दो- ढ़ाई वर्ष की उम्र में पिता मुझे गोद में बिठाकर सिखाने लगे थे। शुरू में आ , आ , आ की रियाज , कुछ तुतलाकर बोलते हुए शुरू हुई और बाद स्वर लगाने का तरीका धीरे-धीरे आने लगा।
मुझे याद है उस समय द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ा हुआ था और उसका प्रभाव हिन्दुस्तान पर भी पड़ा था। कलाकार भी इससे प्रभावित हुए थे। वे भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए इधर-उधर जा रहे थे। सन् 1947 की एक बात याद है, एक बार सभी बड़े कलाकार गया में जुटे थे तो एक ही दादरा और ठुमरी को सबने अलग- अलग ढंग से गाया था।
एक ठुमरी जो शुरू हुई तो शाम से सुबह हो गई थी। उस समय में बहुत शांति का माहौल था लोगों में स्थिरता थी। संगीत सीखने और सिखाने का माहौल था। हमारे यहां उस्ताद बड़े गुलाम अली, पंडित ओंकारनाथजी, बड़ी मोती बाई, मलकाजान आगरेवाली, पंडित बड़े रामदासजी ( जो मेरे दादाजी भी थे ), विदुषी सिद्धेश्वरी देवी, विदुषी बेगम अख्तर सभी आते रहते थे और मुझे उन सबों को सुनने का अवसर मिलता रहता था। संगीत पर खूब परिचर्चा होती।
वे एक ही राग की ना जाने कितनी चीजें जानती थी...
इस प्रकार मेरा भी संगीत का ज्ञान बढ़ता जा रहा था। कॉमर्स का विद्यार्थी होते हुए भी मैंने संगीत में पूरी रूचि ली और पिताजी के संरक्षण में शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की ।
गया में ठुमरी की शुरुआत तो मेरे पिताजी ने ही की थी। एक बार किसी बड़े कलाकार ने मुझसे कहा कि आपकी गायकी में किसी प्रकार की मिलावट नहीं अर्थात् आपके गायन पर अन्य जगहों के गायन का, समय का और दूसरे साहित्य का प्रभाव नहीं पड़ा है। उस दिन मुझे अपने को समझने की और मुझमें अपनी कला को सहेजने की प्रवृत्ति जागृत हुई।
मैंने पूछा कलाकार में रचनात्मकता कैसे पैदा होती है? तो कहने लगे कि एक कलाकार में रचनात्मकता तब आती है जब सुर, लय, स्वर समुदाय को बनाने की समझ आने लगती है और कई लोगों का गायन सुनते हैं तो अपने काव्य , धुनों में मौलिकता के साथ कलाकार कुछ रचना करने लगता है।
कौन सा गाना बनेगा ये पता नहीं होता लेकिन कई स्वरूप अलंकारों को मिलाकर रागों की रचनात्मकता, उचित लय बढ़ता और सुरों की रचनात्मकता के साथ एकाएक कुछ नया बन जाता है और कई बार आवश्यकतानुसार भी कुछ चीजें रची जाती हैंं परन्तु उसके लिए रचनाकार का कोष या ' स्टोर हाउस' काफी समृद्ध होना चाहिए।
मैं एक बात बताना चाहूंगा कि ठुमरी सीखने के लिए साहित्य का अच्छा ज्ञान होना चाहिए और सीखने वाले को अहम् मुक्त और उसके अंदर सीखने की प्यास होनी चाहिए। फिर मुझसे कहने लगे कि मैं आपकी गुरु की मां अर्थात् स्वर्गीया सिद्धेश्वरी देवी जी की बात कर रहा हूं उनमें सीखने की इतनी प्यास थी कि मैं बता नहीं सकता।
वे एक ही राग की ना जाने कितनी चीजें जानती थी, वो एक ही बंदिश कई तरीके से पेश करती थीं । जब समझ पैदा हो जाए तो रास्ता सरल हो जाता है। पर कलाकार में समझ के साथ अपनी कल्पनाशक्ति भी होनी चाहिए।
मैंने पूछा 'गया घराने' की कुछ विशेषताएंं बताएं। तो कहने लगे कि इसकी विशेषता है कि हर सुर पर काफी देर तक न्यास होता है। दो या तीन सुरों के सहारे बढ़त करते हैं।
बोल के हिसाब से सुरों का चयन होता है। कभी-कभी श्रोताओं की पसंद को ध्यान में रखकर भी बोल बनाया जाता है पर परिवर्तन सोच-समझ कर करना चाहिए। गया में छ- सात हारमोनियम, सारंगी, इसराज , सरोद , तबले आदि साजों का प्रयोग होता था।
फिर मैंने पूछा आपके जीवन पर संगीत का क्या प्रभाव पड़ा? कहने लगे हमारे शरीर का हिस्सा है संगीत। हमारे लिए तो खाने-कमाने, लोगों से सोशलाइज करने , नाम - यश कमाने, हर चीज़ का जरिया है संगीत। संगीत का स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और मैं उसी की वजह से जिन्दा हूं।
गया जी के नादरागंज के अपने मकान में प्रतिदिन सुर और ताल के बीच...
आप किसी भी प्रस्तुति से पहले क्या तैयारी करते हैं? उन्होंने थोड़ा गंभीर होते हुए कहा कि कार्यक्रम के लिए तैयार होते वक़्त एक मिश्र भाव रहता है। थोड़ा उमंग और थोड़ी कार्यक्रम की सफलता की चिन्ता। कोशिश करता हूं कि अपने आसपास ऐसे लोग नहीं हों जिन्हें देखकर मन परेशान होता हो या कोई दुखद घटना याद आ जाए। अर्थात् अपने माहौल को सुरीला और हल्का रखना चाहता हूंं। ये तो मानसिक तैयारी की बात है और शारीरिक तैयारी में गले की सेहत का खास ख्याल रखना पड़ता है।
क्या आपका समस्त जीवन गया में ही बीता है? नहीं मैं पटना में भी रहा हूं। बाद में मध्यप्रदेश के खैरागढ़ स्थित इंदिरा कला संगीत महाविद्यालय में पांच वर्षों तक विजिटिंग प्रोफेसर रहा। इस दौरान मैंने मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार , दिल्ली के कई बड़े मंचों पर से अपने गायन की प्रस्तुति दी है।
एक वाकया याद है- लगभग 18 वर्ष का था मैं जब दिल्ली प्रस्तुति देने आया था तो समारोह में पंडित शम्भु महाराज जी भी आए थे। सुनते-सुनते वे हंसने लगे और बोले 'वाह'। तब मुझे बहुत अच्छा लगा था। मैंने उनसे पूछा कि क्या आपकी तालीम सिर्फ अपने पिताजी के संरक्षण में हुई थी तो कहने लगे नहीं मैं अपने दादाजी बड़े रामदास जी के पास बनारस आकर भी रहता था और उनसे भी मैंने तालीम ली है।
सन् 2015 में मेरी मुलाकात पंडित गोवर्धन मिश्रा जी से हुई थी और उसके बाद उनकी मृत्यु तक हमारा रिश्ता बरकरार रहा। जब कभी वे दिल्ली आते तो मुलाकात होती और फोन पर तो अक्सर बातें होती रहती थी। वे ज्ञान का सागर थे। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वे मेरे 'संगीत-शास्त्र' के गुरु बन गए थे। करीब - करीब मेरे सभी प्रश्नों का जवाब उनके पास होता था।
गया जी के नादरागंज के अपने मकान में प्रतिदिन सुर और ताल के बीच ख्याल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आदि की शिक्षा उन्होंने अपने कई शिष्यों को दी। और ये आवाज सारे हिन्दुस्तान में फैल गई। सन् 2007 में इन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी द्वारा भारत सरकार का प्रतिष्ठित सम्मान 'संगीत नाटक अकादमी' पुरस्कार प्राप्त हुआ।
बिहार सरकार द्वारा उन्हें ध्रुपद गायक 'राम चतुर मलिक अवॉर्ड से नवाजा गया। वे और भी कई सम्मान से सम्मानित किए गए। वे अपने पीछे अपनी पत्नी, दो पुत्र और दो पुत्रियों को छोड़ गए।
गया के 'सुर - सलिला' संस्था द्वारा आयोजित तीन दिवसीय शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम में उन्होंने अंतिम प्रस्तुति दी थी। वे शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ थे। ये देश उनके शिष्यों के गायन के माध्यम से उन्हें हमेशा याद रखेगा। हम सभी उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।