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पहलगाम हमला/ कानपुर से लौटकर:  जहां पसरा है सन्नाटा और रह-रहकर गूंजती है सिसकियां.!

Wed, 30 Apr 2025 03:39 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Wed, 30 Apr 2025 03:39 PM IST
सार

पहलगाम का हादसा राष्ट्र के भीतर स्मृतियों की ऐसी ही अंतहीन श्रृंखला है, जहां अपनों के चले जाने से घरों के भीतर मरघट सा सन्नाटा पसरा है और आंगन से रह-रहकर सिसकियां उठ रही हैं.! वेदना से भरे चेहरों के बीच उस घर में मेरी उपस्थिति पसरे हुए दुख के मौन में दखल भर थी। रह-रहकर चीखें और डर फैलता है और हादसे की स्मृतियां देर रात को और ज्यादा काली सुर्ख हो जाती है और इस राष्ट्र की सबसे काली स्याह स्मृति का चेहरा बन जाती है..!
 

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Pahalgam terror attack: A tribute to the victims pahalgam shubham dwivedi family kanpur wife eshanya and other
पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए कानपुर के शुभम द्विवेदी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

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कुछ नियतियां क्रूर और अप्रत्याशित होती हैं। आकस्मिक और घात लगाकर काम करने वाली। वहां दुर्योगों का कोई सिरा नहीं टूटता।जीवन से जुड़े कोई सुखद संजोग नहीं जुड़ते। एक अनहोनी उठती है और अभागे समय का चक्र रचती पीछे छोड़ जाती हैं सूनी, वीरान स्मृतियों का मरघट..!


पहलगाम का हादसा राष्ट्र के भीतर स्मृतियों की ऐसी ही अंतहीन श्रृंखला है, जहां अपनों के चले जाने से घरों के भीतर मरघट सा सन्नाटा पसरा है और आंगन से रह-रहकर सिसकियां उठ रही हैं.!

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घाटी में हुए इस हमले में मारे गए कानपुर के शुभम द्विवेदी से पारिवारिक संबंध रहे हैं। विशेष रूप से उनके चाचा मनोज कुमार द्विवेदी से। दो वर्ष पूर्व शुभम की बहन आरती की विवाह में शामिल होना हुआ और शुभम से बातचीत और मुलाकात भी। इस बीच दो माह पूर्व निजी कारणों से शुभम के विवाह में शामिल नहीं हो पाया। 
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कल कानपुर में शुभम के पैत्रक घर पहुंचा तो हवा में दुख और पीड़ा का मौन रिस रहा था। सामने बैठे पिता संजय द्विवेदी और भाई मनोज द्विवेदी की आंखें पथरायी हुई थीं। जो लोग सामने बैठे थे और आसपास मौजूद थे उनकी चुप्पियों की परछाइयां हवा में तैर रही थीं। दरवाजे से घुसते ही दीवार से सटकर लगी शुभम की फोटो पर निगाह पड़ते ही मैं स्तब्ध था। गहरे धारियों वाले नीले रंग के टीर्शट में मुस्कारते हुए उसका चेहरा देखकर मन धक्क रह गया। आत्मा में मानों विस्फोट हो गया

खामोश सा देर तक उसकी फोटो देखता रहा और दो वर्ष पूर्व एक समय में लौट गया। 
 

वेदना से भरे चेहरों के बीच उस घर में मेरी उपस्थिति पसरे हुए दुख के मौन में दखल भर थी। शुभम के पिता संजय मेरी ओर देखते हुए उस रोज के हादसे का जिक्र करने लगे और अचानक भावुक हुए और फिर ट्रांस में प्रवेश कर गए। मैं समझ नहीं पाया क्या हुआ। उनकी चुप्पी को भाई मनोज ने हाथ छूकर तोड़ा तो भूल गए कि वे कहां थे। ऐसा रोज हो रहा है, वे सो नहीं पाते हैं। हादसे वाले दिन से ही नींद गायब हो चुकी है जबकि देर रात अचानक चिल्लाकर उठ खड़े होते हैं।


वे सदमे से बाहर आने और उन हादसे की काली स्मृतियों से बाहर आने के लिए रोज एक जंग लड़ रहे हैं..!

मैं चुप था कि तभी बाहर कार के गेट बंद होने की आवाज से सभी का ध्यान टूटा तो दूर से एशन्या आते हुए दिखी। शुभम की पत्नी जो महज दो माह पहले परिवार का हिस्सा बनीं। बीते कुछ दिनों से उसका चेहरा वीडियो और टीवी पर देख रहा हूं। आज सामने से देखा। आंखों के नीचे गहरे काले घेरे और रुलाई से मुरझा और थक चुका चेहरा। 
 

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पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए कानपुर के शुभम द्विवेदी के परिजन - फोटो : Amar Ujala

परिजन बताते हैं- हर 10 मिनट में उसकी रुलाई फूट पड़ती है और सिसकने लगती है। हादसे के बाद शुभम का चेहरा उसकी आंखों में आखिरी बार दर्ज हुआ था, उसके बाद शुभम का चेहरा उसने कभी नहीं देखा, उसने ही नहीं बल्कि ना पिता ने ना मां ने क्योंकि सिर में सीधी गोली लगने से ना आंखें बची, ना नाक ना मुंह ना ऊपर का हिस्सा।

दरअसल, किसी ने शुभम का चेहरा आखिरी बार नहीं देखा। अंतिम संस्कार के समय भी चेहरे से पट्टियां हटाई नहीं गई थीं। वैसे कोई देखता भी क्योंकि शुभम का चेहरा था ही कहां और जो था वह एशन्या की स्मृतियों में दर्ज था जिसे खून से सने कपड़ों  लिए एशन्या आज भी घूम रही है। 

मैं एशन्या से ज्यादा देर बात नहीं कर पाया और ना ही शुभम की मम्मी से। एशन्या उस हादसे को भूलने और याद करने के बीच कहीं अटकी हुई है और बात करते-करते गुम हो जाती है और जब वहां से लौटती है तो रोती है, फूटफूटकर रोती है जबकि उसके कांपते हुए हाथों को थामना होता है-
 

-एशन्या ने कुछ तस्वीरें और वीडियोज बताए 
-कुछ बातें और वह समय जो घटनास्थल  पर पहुंचने और हादसे हो जाने के बीच का अंतराल था।  उसकी बातें सुनकर सिंहर गया और वह बताते-बताते अस्थिर और असहज होकर रोने लगी। 


मां अंदर के कमरे में पलंग पर लेटी हुई थी। बदहवास सी। ना देह स्थिर है ना मन को समेट पा रही है। मां और पिता उन 10 लोगों में से एक थे जिन्होंने बेटे शुभम को आखिरी बार वहां जाते हुए देखा था उसके बाद वह अपने बउआ को उसके बचपन को और साथ बिताए आखिरी दिनों में याद करती हैं-
 

कैसे हो गया ये 
भगवान ने ये क्या कर दिया 
वह दूर एक शून्य में देखने लगती हैं और पास की महिलाएं उन्हें जगाती हैं
वह बचपन के शुभम को याद करती हैं और रुलाई फूट पड़ती है-


बहन आरती से लंबी बातें हुईं। वह उन चश्मदीदों में शामिल है जिसकी नियति उसके भाग्य से हार गई।  वह घटनास्थल पर जाने से कुछ देर पहले ही असहज थी और घोड़े पर बैठने का डर उसे नीचे ले आया और उसके साथ-साथ परिवार के सारे सदस्यों को। आरती को लगता ही नहीं है कि भैया अब नहीं रहा ऐसा लगता है कि बस वह आने वाला है अभी या फिर उसका कॉल आएगा..!

कल दिनभर शुभम के घर रहते हुए एक शब्द भीतर से नहीं निकला। लगा मानों मौन ने दिलो दिमाग पर कब्जा कर लिया है। केवल मिलने और सांत्वना देने वाले लोगों को देखता और सुनता रहा और उन्हें सुनते हुए  शुभम की कहानी के समानांतर उन 26 घरों की कहानियों के भीतर प्रवेश कर गया। बीते सात दिनों में हादसे से जुड़े अनगिनत हिस्से जहन में रहे। 

पहलगाम हादसा जघन्य, अमानवीय और बर्बर था। अपनी पहली श्रद्धांजलि पोस्ट में मैंने इस हमले की मंशा को भांप लिया था कि यह पहले से ही बिखरे हुए  सामाजिक ताने-बाने के सामने नई आंधी की तरह होगा। 

मैं आज भी कई तस्वीरें, फोटो और वीडियों में पीड़ितों और अपनों के चले जाने से बदहवास हुए परिजनों को देख रहा हूं। 

हर जगह दारुण दुख में डूबे हुए चेहरे हैं। 
विलाप करते लोग हैं और समय के एक हिस्से में पलटकर उस दुर्योग से हटकर एक सुखद संजोग के बारे में सोचते हैं जहां जीवन बच जाता। 
वे काल के पार जाकर उस काश के साथ खुदको जोड़ने के लिए छटपटाते दिखते हैं जहां वे अकाल और अपघाती मौत से बचकर निकल आते। 
वे उस अनहोनी के चक्र में प्रवेश से पहले ही लौट आते या कि वे नियति के उस सबसे कोमल हिस्से को स्पर्श कर उसे टालने में सफल होते और भाग्य को पूजते.!

अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ.
दुखद की वे आतंक के सबसे क्रूरतम चेहरे का शिकार हुए
त्रासद कि वे उस नरसंहार का हिस्सा बन गए जिसमें धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को मारा गया
और सबसे दुर्भाग्य की इस राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने में यह आतंकी हमला वैमनस्य का ऐसा कड़वा बीज बो गया जिसकी परिणिती घातक होगी और इसकी गूंज दशकों तक गूंजती रहेगी…!


मैं शुभम के घर में होते हुए भी वहां नहीं रहा बल्कि हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र सहित उन तमाम परिजनों के बीच प्रवेश कर गया जहां शुभम के घर की तरह ही दारुण दुख बह रहा है। हवा में पीड़ा का मौन घुला हुआ है। विलाप और सिसकियां गूंजती है। रह-रहकर चीखें और डर फैलता है और हादसे की स्मृतियां देर रात को और ज्यादा काली सुर्ख हो जाती है और इस राष्ट्र की सबसे काली स्याह स्मृति का चेहरा बन जाती है..!

शाम का धुंघलका गहरा रहा है। शुभम की फोटो के सामने फूल, धूपबत्ती महक रही है जिसका धुआं अनंत में विलीन हो रहा है। जैसे आकाश से आकाश में। शुभम और वे तमाम लोग सदा के लिए ऐसे ही विलीन हो गए। 

फोटो के पास एक दीपक जल रहा है। गरुण पुराण का पाठ चल रहा है जहां मृत्यु और उसके शोक का वर्णन है और उसे सुनाया जा रहा है। लेकिन इस मृत्यु के बीच चुप्पी है तो बस निर्दोष, अकाल और अपघाती मौतों पर, जिसके बारे में सोचते हुए देर रात लौट आता हूं..!   
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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