महिलाओं पर ऑनलाइन हिंसा: ट्रोलिंग को गंभीरता से लेना होगा और कड़े कानून बनाने होंगे
सोशल मीडिया पर महिलाओं के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उतनी सहज नहीं जितनी दिखाई पड़ती है। ट्रोलिंग, ऑनलाइन धमकियां और भद्दी व अश्लील टिप्पणियां उनके प्रति हिंसा का नया रूप है जिससे उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहरे में आती है। एक तरह से महिलाएं डर के साये में जीने को अभिशप्त हैं।
खास बात यह है कि कई बार ऑनलाइन हिंसा का यह रूप इतना खतरनाक हो उठता है कि महिलाएं इसका शिकार हो जाती हैं। दुनिया में स्त्रियों के प्रति ऑनलाइन हिंसा के ढेरो ऐसे मामले हैं जो एक समय बाद धमकी, हिंसा, पिटाई और यहां तक कि जीवन के लिए भी खतरा बन पड़े हैं।
स्त्री मुद्दों पर लंबे समय से लिख रहीं नूतन यादव बता रही हैं, महिलाओं के प्रति ऑनलाइन हिंसा कैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित कर रही हैंं और कैसे इससे निपटने के लिए कड़े कानूनों की जरूरत है-
विस्तार
महिलाओं के साथ सोशल मीडिया पर बदतमीजी और दुर्व्यवहार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। ट्रोल्स महिलाओं को गन्दी-गन्दी गालियां देते हैं और कई बार स्थिति इतनी भयानक हो जाती है कि वे महिलाओं को बलात्कार की धमकी देने से भी नहीं झिझकते।
इस तरह की ट्रोलिंग से बड़ी बड़ी हस्तियां और लेखिकाएं भी नहीं बच पाती हैं। ऑनलाइन ट्रोलिंग से महिलाओं में एक डर का माहौल पैदा होता है और इस तरह सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थिति और अभिव्यक्ति कम होने लगती है।
ऑनलाइन हिंसा कैसे बचें? आखिर क्या है इलाज?
ऑनलाइन हिंसा का मूल कारण पुरुषों का महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी नजरिया है। पुरुष इंटरनेट पर महिलाओं की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को बर्दाश्त नहीं कर पाते। वे उन्हें एक यौन वस्तु (sexual object ) रूप में देखने के इतने आदी हो चुके हैं कि आज जब महिलाएं सामाजिक राजनीतिक विषयों पर मुखर राय देती दिखती हैं तब वे उनके साथ ऑनलाइन हिंसा करते हैं। अक्सर इस ऑनलाइन हिंसा पर महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं।
सोशल मीडिया पर लगभग हर वर्ग की महिलाओं को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। अपने धर्म, अपनी जाति,रंग के आधार पर लोगों की बदतमीजी का निशाना बनना पड़ता है। अधिकतर ग्रामीण इलाकों की महिलाएं या मुस्लिम महिलाएं तो अपनी तस्वीर तक लगाने से परहेज करती हैं। इसका स्पष्ट कारण उनके इलाके के पुरुषों को अपनी पहचान न बताना है।
कभी-अभी तो हैरानी होती है कि क्या सचमुच भारतीय पुरुषों को ऑनलाइन स्पेस में व्यवहार करना नहीं आता या उन्हें इसके इस्तेमाल की ट्रेनिंग देने की जरूरत है। अब सवाल उठ खड़ा होता है कि वे महिलाओं के प्रति इतने द्वेष से क्यों भरे हैं?
दूसरी तरफ सोशल मीडिया भी प्लेटफॉर्म्स अपने बनाए मानक तोड़ते रहते हैं। जब महिलाएं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से वहां अपने साथ हुए दुर्व्यवहार या किसी तरह की न्यूडिटी की औपचारिक शिकायत करती है तो वे अक्सर रटे रटाए जवाब देते हैं, जैसे उन्हें ये शिकायतें अपने मानकों का उललंघन करती नहीं दिखाई देती। ऐसे हालात में महिलाएं भारतीय न्याय व्यवस्था की ओर मुंह करने को मजबूर हैं।
भारत में सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ ट्रोलिंग को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। चाहे टिक-टॉक का ज़माना हो या आज रील्स पर बने वीडियो हों ट्रोल्स महिलाओं के वीडियोज पर भद्दे और अश्लील कमेंट करने से नहीं चूकते। इसी तरह के ट्रोल्स आपको ट्विटर पर भी मिल जाएंगे। ये ट्रोल्स हर मौके पर बेहूदे जवाबों के साथ तैयार मिलते हैं।
यही नहीं कई बार इनके कमैंट्स या ट्वीट्स में बलात्कार या हत्या तक की धमकियां दी जाती हैं। ये स्थितियां कमोबेश पूरी दुनिया में देखी जा रही हैं लेकिन अब कई देशों ने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया है। इन देशों में महिलाओं को ऑनलाइन धमकी देने या ट्रोलिंग को न्यायिक घेरे में रखकर उस पर कार्यवाही शुरू कर दी है।
फ्रांस का मामला हमें सचेत करता है
ताजा मामला फ़्रांस का है। फ्रांस में एक किशोरी को उसकी एक पोस्ट पर की गई ऑनलाइन धमकियां देने के मामले में 11 लोगों को दोषी पाया गया है। फ्रांस की मिला नाम की एक लड़की जब 16 साल की थी तब उसकी एक इंस्टाग्राम पोस्ट वायरल हुई थी जिसमें उसने अपनी सेक्सुअलिटी पर बात की थी। इस पर नाराज होकर एक समुदाय विशेष के व्यक्ति ने मिला को डर्टी लेस्बियन कहा।
जाहिर है इस कमेंट से नाराज होकर मिला ने कड़े शब्दों में आलोचना भी की और प्रतिक्रिया भी दी। इसके बाद ऑनलाइन ट्रोलिंग का सिलसिला शुरू हुआ। कुछ लोगों ने उसे जान से मारने की धमकियां दी तो कुछ ने उसकी पर्सनल जानकारियां इंटरनेट पर शेयर कर दीं।
इस घटना से फ़्रांस में न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ईशनिंदा के बारे में राष्ट्रव्यापी बहस को पुनर्जीवित किया है बल्कि ऑनलाइन बुलिंग से महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने और अपराधियों को सजा दिलवाने की शुरुआत भी की है। मिला को जान से मारने की धमकी देने और ऑनलाइन बेहूदगी करने के आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
बता दें कि इन अपराधियों में 18 से 30 वर्ष की आयु के दस पुरुष और तीन महिलाएं भी हैं जिन पर जून की शुरुआत में ऑनलाइन उत्पीड़न का मुकदमा चलाया गया। हालांकि एक को सबूतों की कमी के चलते छोड़ दिया गया और एक को क़ानूनी प्रक्रिया में कुछ समस्या के चलते रिहा कर दिया गया। इनमें से कुछ पर भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया गया है। पिछली अक्टूबर में एक व्यक्ति को मिला को ऑनलाइन मौत की धमकी दने के संबंध में 3 साल की सजा सुनाई जा चुकी है।
जहां बहुत से आलोचकों ने मिला की टिप्पणियों को अपमानजनक बताया वहीं दूसरी ओर कहा गया कि मिला को दी गई मौत की धमकी को किसी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
इंस्टाग्राम पर जब उनकी पहली पोस्ट वायरल हुई तब वे मात्र 16 साल की थी और मिली धमकियों के कारण उन्हें अपना स्कूल छोड़ना पड़ा और सरकार को आगे आकर उनके लिए एक नया स्कूल ढूंढना पड़ा। इस घटना के बाद उन्हें लगभग 1 लाख नफरत भरे मैसेज मिले और अब उन्हें 24 घंटे पुलिस सुरक्षा में रहना पड़ रहा है।
भारत में ट्रोलिंग और महिलाएं
सोशल मीडिया पर भारत में भी महिलाओं के साथ ट्रोलिंग की जाती रही है। चाहें राणा अयूब हों या गौरी लंकेश ट्रोल्स लगातार इनके खिलाफ लिखते रहे हैं। गौरी लंकेश की हत्या के बाद भी लोग उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग करते दिखे हैं। ट्रोल्स मलाला यूसुफजई और ग्रेटा थनबर्ग जैसी कम उम्र की लड़कियों को उनके साहसिक कामों के लिए ट्रोल किया जाता रहा है।
हाल ही में एप पर एक समुदाय विशेष की महिलाओं की तस्वीर साझा की गई। इस एप में जिस शब्द का प्रयोग किया गया था वह महिलाओं के लिए एक अपशब्द की तरह प्रयोग किया जाता है। ट्वीटर से 80 से ज्यादा महिलाओं की तस्वीर और उनसे जुड़ी जानकारियां एकत्र कर यूजर्स से साझा की गई जो किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
एडिटर गिल्डस ऑफ़ इंडिया ने भी मुस्लिम महिलाओं, महिला पत्रकारों पर हुए इस सायबर हमले की आलोचना की। संस्था के अनुसार सोशल मीडिया और डिज़िटल प्लेटफॉर्म का इस तरह का प्रयोग महिलाओं के लिए बहुत खतरनाक और चिंता पैदा करने वाला है। भारत में फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ट्रोलिंग संबंधित कार्यवाही पर चर्चा होती रही है और कई मामलों में न्यायिक कार्यवाही भी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और बदलाव
8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने फेसबुक के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अजीत मोहन और अन्यों द्वारा दिल्ली विधानसभा की शांति और सद्भाव समिति द्वारा जारी समन को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स के पास वह शक्ति और क्षमता है जो बहुत बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना था- फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर लोगों द्वारा लिखी गई पोस्ट या किसी भी तरह की बहसों में समाज का ध्रुवीकरण करने की संभावनाएं होती हैं और उन्हें कम करके नहीं आंका जा सकता। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स से जुड़े लोगों के पास इन पर पोस्ट की गई सामग्री की सत्यता को जांचने या सत्यापित करने का कोई साधन भी नहीं है।
पिछले साल विधान सभा की इस समिति ने उत्तरपूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मामले में फेसबुक भारत के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक को गवाह के रूप में पेश न होने के चलते फेसबुक को समन जारी किए गए थे। फरवरी में हुए दिल्ली दंगों के दौरान फेसबुक पर प्रसारित कथित नफरत भरे भाषणों के संबंध फेसबुक की भूमिका पर विवाद चल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने समिति के विशेषाधिकारों का उल्लेख करते हुए यह भी कहा-
भलाई और सामाजिक मुद्दों से जुड़े होने के कारण फेसबुक के प्रतिनिधियों को समिति के सामने पेश होना चाहिए। फेसबुक पिछले साल से लगातार समिति के सामने आने से बचता रहा है।
इसी साल मार्च में तत्कालीन केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने किसी मामले में जज द्वारा दिए फैसले की सोशल मीडिया पर आलोचना या ट्रोलिंग पर एक बयान दिया था। उन्होंने कहा था-
सोशल मीडिया एक स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा है इसलिए हम सभी उसे प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन जब लोग सोशल मीडिया पर न्यायपालिका या न्यायधीशों के किसी फैसले के खिलाफ प्रचार करने लगते हैं तो इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को उसके कर्तव्य पालन के लिए स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए। स्पष्ट है कि वे भी किसी न किसी रूप में ट्रोलिंग को सही नहीं मानते और इसके खिलाफ कदम उठाए जाने की बात स्वीकारते हैं।
स्पष्ट है कि सोशल मीडिया की भूमिका आज के परिवेश में बहुत महत्वपूर्ण है। महिलाओं की गरिमा , उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए न्यायिक प्रक्रिया को और कड़ा बनाना होगा साथ ही सोशल मीडिया को भी उनकी जिम्मेदारी तय करनी होगी। ये मीडिया दिग्गज अपनी जिम्मेदारियों से किसी भी रूप में भाग नहीं सकते।
आज जब हम सभी किसी न किसी रूप में सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं और यह हमारे जीवन का अपरिहार्य अंग बन गया है तब इस तरह का मर्दवादी रवैया बहुत निराशा और डर पैदा कर रहा है। जिस तरह से फ़्रांस में ट्रोल्स को अपनी बदतमीजियों के लिए क़ानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा कुछ वैसा ही माहौल भारत में भी पैदा किया जाना चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल कहने सुनने की वस्तु न रहे बल्कि महिलाओं को पूरी स्वतंत्रता के साथ उनकी पहचान और उनकी आवाज को अभिव्यक्त करने की आजादी मिले। वे डर के साये में जीने को अभिशप्त न हों।
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