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लखनऊ की त्रासदी: बच्चों का लालन-पालन और मसालेदार स्वादिष्ट सब्जियां

Thu, 09 Jun 2022 12:10 PM IST
Dinesh Pathak दिनेश पाठक
Updated Thu, 09 Jun 2022 12:10 PM IST
सार

दिल दहलाने वाली खबर लखनऊ से आई है। 10वीं का छात्र अपनी मां को लाइसेंसी हथियार उठा गोलियों से भून देता है। तीन दिन तक शव के साथ खुद रहता है और बहन को भी धमका कर रखता है।

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Online Games increasing criminality in Teenagers Children's Upbringing Should be like this
अगर बच्चे को गेम की लत लगी तो क्या एक दिन में? शायद नहीं। गेम खेलने में इंटरनेट और बेहतरीन स्मार्ट फोन या लैपटॉप कहां से आया? - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल दहलाने वाली खबर लखनऊ से आई है। 10वीं का छात्र अपनी मांं को लाइसेंसी हथियार उठा गोलियों से भून देता है। तीन दिन तक शव के साथ खुद रहता है और बहन को भी धमका कर रखता है। दुर्गन्ध उठने पर सेना में तैनात जेसीओ पिता को झूठी कहानी के जरिए सूचना देता है। प्रथम दृष्टया जो कारण सामने आया है, उसके मुताबिक मां ऑनलाइन गेम खेलने से रोकती थी। यह घटना निश्चित दुर्भाग्यपूर्ण है।

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यहां दोषी कौन है, क्यों है, ये हो सकता था, वो हो सकता था आदि-आदि लिखकर मैं मरहूम मां या सेना में तैनात जेसीओ पिता को दोषी नहीं ठहरा सकता क्योंकि वे तो अपनी समझ से अपना बेस्ट दे ही रहे थे। लेकिन यह तय है कि चूक हुई है।
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मसलन, घर में लाइसेंसी हथियार रखा था तो उसकी सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। अगर होते तो बच्चे को भला कैसे मिलता? बच्चा मां पर गुस्सा करता है। हथियार उठाता है। घर में उसे कारतूस भी मिल जाता है। उसे या तो वह खुद लोड करता है या तो उसमें कारतूस पहले से लोड होता है। दोनों ही सूरत किसी भी घर में सदस्यों की सुरक्षा के लिए खतरनाक है। इस घर का रिजल्ट सामने है।

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अगर बच्चे को गेम की लत लगी तो क्या एक दिन में? शायद नहीं। गेम खेलने में इंटरनेट और बेहतरीन स्मार्ट फोन या लैपटॉप कहां से आया? स्वाभाविक है, पैरेंट्स ने ही दिलाया। सारी सुविधाएं देने के बाद क्या बच्चे पर पैरेंट्स की उतनी नजर थी, जितनी होनी चाहिए। शायद नहीं। और यह हादसा हो गया। एक हंसता-खेलता परिवार टूट गया। बिखर गया। बच्चों के सिर से मां का आंचल और पति के लिए पत्नी का असमय जाना किसी भी परिवार के लिए असामान्य घटना है। पूरी की पूरी गृहस्थी उजड़ गई। उम्मीदें टूट गईं। संभावनाएं समाप्त हो गईं।


मैं उस मां को नमन करते हुए, पिता के प्रति विनम्र भाव रखते हुए कहना चाहता हूं कि बच्चों का लालन-पालन उस स्वादिष्ट मसालेदार सब्जी बनाने की प्रक्रिया की तरह होती है जिसे हम बड़े चाव से अपने और अपनों के लिए बनाते हैं। ऐसी सब्जी के लिए सामान्य सा नियम है।

धीमी आंच पर कड़ाही चढ़ाएं। तेल डालें। फिर हींग, जीरा, मेथी, लहसुन, प्याज का तड़का डाल दें। जब रंग सुनहरा हो जाए तो मसाला डालें और फिर धीमी ही आंच पर तब तक भूनें जब तक कि मसाला तेल न छोड़ दे। फिर सब्जी डालें और मद्धम आंच पर उसे धीरे-धीरे मसाले के साथ मिलाएं। कुछ देर यह प्रक्रिया चलने दें। इस पूरी प्रक्रिया में आपके हाथ से कल्छी छूटनी नहीं चाहिए। जरा सी चूक हुई नहीं कि सब्जी बेस्वाद हो सकती है।

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बच्चों को सुविधाएं दें, लेकिन उन्हें कमरे रूपी कुकर में न छोड़ें। - फोटो : Istock

जैसे ही आपको लगे कि सब्जी और मसाले मिल गए हैं, आपस में इनका रिश्ता गहरा हो गया है तो इसमें आवश्यकता के मुताबिक पानी, नमक डालकर आंच तनिक तेज कर दें। नजर रखें कि कड़ाही में उबाल तो आए लेकिन सब्जी का रस बहने न पाए। ऐसा हुआ तो भी स्वाद पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

यह नियम गैस चूल्हे पर भी लागू है, इन्डक्शन पर भी लागू है और अगर गलती से कहीं आपके घर में मिट्टी-लकड़ी का चूल्हा है तो उस पर भी लागू है। हम सब इस बात से परिचित हैं कि आजकल हर घर में मौजूद कुकर में बनी सब्जी में वह स्वाद नहीं होता जो ऊपर बनाई गयी विधि से मिलता है।

बस, बच्चों का लालन-पालन भी कुछ कड़ाही में बनने वाली मसालेदार सब्जी की तरह ही किया जा सकता है। गारंटी फिर भी आप नहीं ले सकते कि बच्चा सही रास्ते पर ही जाएगा लेकिन सम्भावना इस बात की है कि बेपटरी नहीं होगा।

आजकल हम कहीं भौतिकवाद में, कहीं पैसों के प्रदर्शन में तो कहीं अत्याधुनिक दिखने के दबाव में बच्चों को दे तो सब कुछ रहे हैं लेकिन बंद कुकर की तरह सारी सुविधाओं के साथ कमरे में छोड़ दे रहे हैं। फिर भाप निकलने की जगह न मिलने की वजह से कई बार कुकर फटने के हादसे हम सबने सुने हैं। जानते हैं क्यों? अरे क्या मूर्खतापूर्ण सवाल मैं पूछ रहा हूं। आप सब जानते हैं कि अगर कुकर की सीटी और भाप निकलने के रास्ते की सफाई नहीं की गई तो हादसे तय हैं।

ठीक इसी तरह बच्चों को सुविधाएं दें, लेकिन उन्हें कमरे रूपी कुकर में न छोड़ें। कड़ाही में सब्जी की तर्ज पर बचपन को पकने दें। उन पर नजर रखें। उस कमरे में अनिवार्य रूप से जाएं जहां बच्चा सोता/सोती है। पढ़ाई की जगह जरुर विजिट करें। समय-समय पर बस्ता, आलमारी, बिस्तर की जांच-पड़ताल भी करते रहें और अंतिम बात यह कि बच्चों के साथ समय जरुर गुजारें।

उनसे आज की दिनचर्या पूछें और कल का प्लान भी। दोस्तों के बारे में बात करें और पढ़ाई की योजना पर भी। और हाँ, दो-चार प्रेरक किताबें अपने आसपास रखें। बच्चे वही करते हैं जो बड़ों को करते हुए देखते हैं। अगर आप गीता, रामचरित मानस, कुरआन, बाइबिल पढेंगे तो प्रबल सम्भावना है कि बच्चों की रूचि भी इसमें जाग जाए। अगर स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जैसी हस्तियों को पढेंगे तो संभव है कि आपके बच्चे भी उन्हें पढ़ना शुरू कर दें।

कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप कितने व्यस्त हैं? थोड़ी कमाई कम कर दें लेकिन प्लीज व्यस्तता का बहाना न बनाएं और बच्चों को समय जरुर दें। उन्हें सही राह दिखाने का मात्र यही एक रास्ता है। मोबाइल, इंटरनेट का उपयोग तो हम सब कर ही रहे हैं।

इसके उपयोग-दुरुपयोग को भी हम सब आसानी से देख पा रहे हैं। और हाँ, बच्चे केवल परिवार के नहीं, देश के भी भविष्य हैं। इनका बेपटरी होना, हादसों को दावत देना है। मुझे उम्मीद है कि आप ऐसा कदापि नहीं करेंगे।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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