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नेपाल में विरोध प्रदर्शन: संसद को चिता में बदलने वाले इस जनाक्रोश के क्या हैं मायने?

Tue, 09 Sep 2025 07:59 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Tue, 09 Sep 2025 07:59 PM IST
सार

सवाल यह भी है कि आखिर नेपाल के युवाओं का मात्र 16 साल में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से इतना विश्वास क्यों उठ गया? इसका एक कारण तो यह है कि नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र अचानक ही आ गया। 

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नेपाल में सरकार विरोधी प्रदर्शन - फोटो : एएनआई

विस्तार

लोकतांत्रिक देश होने के साथ-साथ जिस पड़ोसी नेपाल के साथ हमारा रोटी-बेटी का रिश्ता रहा हो, उस नेपाल की संसद को धू-धू जलते देखना बेटी का मायका अपनी आंखों से राख में बदलते देखने जैसा है। जो हुआ और हो रहा है, वह इस बात की चेतावनी है कि  अगर जनता अपनी वाली पर आ जाए तो कोई माई का लाल सत्ता और सत्ताधीशों को नहीं बचा सकता।

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भारत और उसके तीन पड़ोसी देशों में बीते दो वर्षों में सत्ता परिवर्तन का जो तरीका रहा है, उसमे एक खास पैटर्न, आक्रोश की अभिव्यक्ति का तरीका, सत्ता परिवर्तन और उसके बाद की स्थितियों को देखना जरूरी है। इन तीनों मामलों में नायक जनता थी, भले ही उसके पीछे कुछ धूर्त विदेशी या स्वदेशी शक्तियां रही हों। मुद्दे कमोबेश समान ही थे।
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लोग जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अपनो को रेवड़ी बांटने, बेरोजगारी, महंगाई और सत्ता द्वारा जनता का मुंह बंद करने की चालों से भड़के हुए थे।

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श्रीलंका से हुई शुरुआत

इसका पहला लावा श्रीलंका में फूटा, जहां आम लोगों ने राष्ट्रपति भवन लूट लिया और राष्ट्रपति को देश छोड़ने पर विवश किया। बांग्लादेश में छात्रों की नाराजी से शुरू हुआ आंदोलन इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हाई जैक कर अपने ही राष्ट्रपिता की प्रतिमाएं तोड़ डालीं। विरोधियों और हिंदुओं के घर जला दिए। अब नेपाल में जनाक्रोश इससे भी एक कदम आगे जाकर उस लोकतंत्र के मंदिर को ही जला बैठा है, जहां जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को भेजती रही है। जहां से नेपाल का समूचा तंत्र नियंत्रित होता है।


लोगों का गुस्सा अपनी जगह है, लेकिन इसकी परिणति संसद को चिता में तब्दील करने में हो तो यह हर लोकतांत्रिक मन को खिन्न करने वाला है। अब सवाल यह है कि नेपाल के युवा और बाकी जनता संसद को ही खत्म करने पर खुश है तो वह चाहती क्या है? क्या राजशाही की वापसी? क्या फिर कोई निरंकुश सत्ता अस्तित्व को न्यौता?

अगर वह एक ओली की जगह किसी दूसरे ओली की आस में सड़कों पर निकली है तो जिस बदलाव की उम्मीद वह पाले हुए है, वह कैसे पूरी होगी? बांग्लादेश में आंदोलन की आड़ में छात्रों को कैसे ठग लिया गया, हम देख रहे हैं। 

कई सवाल जिसके जवाब आने बाकी

सवाल यह भी है कि आखिर नेपाल के युवाओं का मात्र 16 साल में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर से इतना विश्वास क्यों उठ गया? इसका एक कारण तो यह है कि नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र अचानक ही आ गया। हालांकि भारत की आजादी के बाद नेपाल में राणाओं के सामंती शासन के खिलाफ जनता ने आवाज उठाना शुरू कर दिया था। बाद में राजा ने अपने हाथ में सत्ता ले ली और संवैधानिक राजतंत्र चलाने की कोशिश की।

नेपाल की जनता तब भी बहुत सुखी नहीं थी और लोकतंत्र के नाम पर वहां जो मजाक डेढ़ दशक से चल रहा था, उसने लोगों का लोकतंत्र से पूरी तरह मोहभंग कर दिया। हालांकि राजतांत्रिक नेपाल में लोकतंत्र लाने की कोशिशों में भारत की भी अहम भूमिका रही है। लेकिन लोकतंत्र को लागू करने और उसे आत्मसात करने के पहले जिस तरह के सामाजिक जागरण, उदात्त और परिपक्व सोच तथा लोकतांत्रिक साक्षरता की जरूरत होती है, नेपाल में वह उतनी शिद्दत से कभी नहीं हुई। क्योंकि लोकतंत्र भी धीरे धीरे परिपक्व होता है।

नेपाल में राजशाही को हटाने के लिए लोकतांत्रिक आंदोलन और कम्युनिस्टों के सशस्त्र विद्रोह जैसे कई प्रयास समय-समय पर होते रहे, लेकिन नेपाल के सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक अंतर्विरोधों के कारण ज्यादा  सफल नहीं हो पाए। वहां पारिवारिक अंतर्कलह के कारण राजतंत्र का खात्मा भी एकाएक हो गया। 

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नेपाल में संसद भवन के बाहर प्रदर्शन - फोटो : ANI

अंतिम राजा ज्ञानेन्द्र कमजोर शासक थे। हालांकि वो अभी भी सत्ता में लौटने का सपना देखते रहे हैं। देश में एक वर्ग यह चाहता भी है कि नेपाल पूर्ववत राजतांत्रिक हिंदू राष्ट्र बन जाए, यानी पत्थर से ईंट भली। लेकिन यह आसान नहीं है, क्योंकि नेपाल के आंदोलनकारी जेन जेड के लिए राजशाही अतीत की बात है। यह नेपाल के राजनेताओं की घोर असफलता है कि वो जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की जगह अपनी स्वार्थ सिद्धि में ही मगन रहे।

देश में नया संविधान लागू होने और चुनावों में कभी भी किसी पार्टी को बहुमत न मिलने से नेपाल परिवर्तन की उस वैचारिक प्रतिबद्धता से भी दूर चला गया, जिसके आधार पर राजनीतिक दलों को जनहित के कुछ तो काम करने ही पड़ते हैं।

नेपाल के राजनेता, चाहे किसी पार्टी के हों, इस गरीब देश को विकास और समृद्धि के मार्ग पर आगे ले जाने के बजाए भारत और चीन के बीच शक्ति संतुलन तथा अपने हित साधने में ही व्यस्त रहे। 

प्रधानमंत्री का इस्तीफा

मजबूरी में हुए प्रधानमंत्री ओली के इस्तीफे, संसद के राख होने, दो दर्जन जानें जाने, कइयों के घायल होने, आक्रोशित भीड़ के आगे सेना और पुलिस के घुटने टेक देने, करोड़ों की सार्वजनिक और निजी सम्पत्ति नष्ट होने के बाद नेपाल में आगे क्या होगा, इस पर सभी की नजर रहेगी। क्या सेना सत्ता हाथ में ले लेगी, क्या राष्ट्रपति किसी युवा लेकिन अनुभवहीन व्यक्ति के हाथों में सत्ता सौंप देंगे? देश के बूढ़े और भ्रष्ट नेताओं का भविष्य क्या होगा तथा इन सबका भारत कितना और कैसा असर होगा, यह देखने की बात है।

लेकिन एक छोटे से निमित्त की बुनियाद पर जिस तरह नेपालवासियों और खासकर युवाओं का गुस्सा सड़कों पर उतरा और पूरी सरकार की बलि ले गया, वह उन सभी राजनेताओं के लिए गंभीर चेतावनी है, जो सत्ता पाकर निरंकुश, मगरूर, असंवेदनशील और खुद को व्यवस्था से ऊपर स्वयंभू मानने लगते हैं। सत्ता को अपनी जागीर और जनता को चेरी समझने लगते हैं। 

नेपाल में संसद का जलकर राख हो जाना, विश्व में सर्वाधिक मान्य शासन प्रणाली यानी जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता के शासन की भी ट्रेजिडी है। संसद भवन का खाक होना वहां की जनता की सत्ताकांक्षा की ट्रेजिडी है। साथ ही उस ऐतिहासिक विरासत के भस्म होने की भी ट्रेजिडी है, जिसमें बैठकर नेपाल ने कभी  अपने भविष्य के सपने बुने थे।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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