पार्वती-कालीसिंधु-चंबल नदियों को जोड़ अटल बिहारी वाजयेपी का एक और सपना पूरा करेगी भाजपा
वर्ष 2014 में दिल्ली में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद एक बार फिर नदी जोड़ो परियोजना की फाइलों को निकाला गया। नदियों को जोड़ने की उम्मीद जागी। केन और बेतवा नदियों को लेकर जोड़ने को लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार में सहमति बन गई है और काम शुरू हो चुका है।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का एक और सपना पूरा होने के करीब पहुंच गया है। वर्ष 2004 से पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने देश में नदियों को जोड़ने की परिकल्पना की थी। उन्होंने 31 रिवर इंटरलिंक्स चिन्हित किए थे, लेकिन अटल सरकार लोकसभा चुनाव हार गई। केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार आने से यह प्रोजेक्ट दस साल तक ठंडे बस्ते में रहा और यह सपना अधूरा रह गया।
वर्ष 2014 में दिल्ली में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद एक बार फिर नदी जोड़ो परियोजना की फाइलों को निकाला गया। नदियों को जोड़ने की उम्मीद जागी। केन और बेतवा नदियों को लेकर जोड़ने को लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार में सहमति बन गई है और काम शुरू हो चुका है। अब मध्य प्रदेश और राजस्थान भी पार्वती-कालीसिंधु-चंबल (पीकेसी) नदियों को जोड़ने के लिए सहमति बनाने के लिए आगे बढ़ गए हैं। इस प्रोजेक्ट से पूर्वी राजस्थान में नई हरित क्रांति की शुरुआत हो सकती है।
नए पीकेसी लिंक से पानी के लिए तरस रहे पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों जयपुर, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, अजमेर, करौली, दौसा, टोंक, सवाईमाधोपुर, कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां में न केवल अगले 30 साल तक पीने का पानी सुचारू रूप से मिलता रहेगा, बल्कि 7 लाख हेक्टेयर नई भूमि सिंचित भी होगी। मध्य प्रदेश में मालवा और चंबल क्षेत्र में 2.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई हो सकेगी। इस नए लिंक को राजस्थान में ईस्टर्न राजस्थान कैनल प्रोजेक्ट (ईआरसीपी) के साथ जोड़ा जाएगा। इसको नया नाम ईआरसीपी-पीकेसी लिंक प्रोजेक्ट दिया गया है।
दरअसल, ईआरसीपी की कवायद वर्ष 2016 में राजस्थान की भाजपा नेतृत्व वाली वसुंधरा राजे सरकार ने शुरू की थी। उन्होंने एक डीपीआर भी तैयार करा ली थी, लेकिन डीपीआर में खामी के चलते प्रोजेक्ट में विलंब हुआ। डीपीआर में सुधार होता, उससे पहले वर्ष 2018 में राजस्थान में सरकार बदल गई। अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी तो उसने खामी वाली डीपीआर को ही आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
उस समय मध्यप्रदेश में भी कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की ही सरकार थी, लेकिन उन्होंने राजस्थान के साथ सहमति नहीं बनाई। फिर यह एक राजनीतिक मुद्दा बनकर रह गया। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य में अशोक गहलोत सरकार आपस में पानी को लेकर राजनीति में फंसते चले गए। कांग्रेस ने पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों में इस मुद्दे को काफी जोर-शोर से उठाया। बजट में कुछ धन भी ईआरसीपी के नाम पर रखा, लेकिन राज्य अपने संसाधनों से इसे पूरा नहीं कर सकता था, यह बात अशोक गहलोत भलीभांति जानते थे।
पहले से माना जा रहा था कि यदि राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार आती है तो ईआरसीपी-पीकेसी लिंक प्रोजेक्ट को एक बार फिर गति मिल सकती है। ऐसा हुआ भी। जैसे ही दोनों राज्यों में भाजपा नेतृत्व की सरकार बनी, केंद्र में जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जो पहले से इस लिंक प्रोजेक्ट को पूरा करने का वादा करते आ रहे थे, सक्रिय हो गए। अभी राजस्थान में मंत्रिमंडल का गठन नहीं हुआ है, लेकिन शेखावत ने राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकारियों को दिल्ली बुलाकर इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू करा दिया है।
लोकसभा चुनाव से पहले दोनों राज्यों और केंद्र सरकार के बीच सहमति बनाकर बजट स्वीकृत किया जा सकता है। भाजपा इस प्रोजेक्ट के माध्यम से राजस्थान के 13 जिलों के वोटर्स को साधना चाहती है। यह प्रोजेक्ट नौ लोकसभा सीटों जयपुर, जयपुर ग्रामीण, अजमेर, कोटा, दौसा, भरतपुर, धौलपुर-करौली, टोंक-सवाईमाधोपुर, बारां-झालावाड़ पर भाजपा को लाभ पहुंचाएगा।
इस प्रोजेक्ट पर करीब 50,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा, जिसमें 90 प्रतिशत राशी यानी 45,000 करोड़ रुपए केंद्र सरकार वहन करेगी। शेष 10 प्रतिशत की राशि राजस्थान और मध्य प्रदेश अपने क्षेत्र में होने वाले खर्च में से देंगे। राजस्थान को 3725 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं। 5 साल से अटका यह प्रोजेक्ट जब पूरा होगा तो पूर्वी राजस्थान में एक नई हरित क्रांति देखने को मिलेगी। उम्मीद है कि केन-बेतवा और पार्वती-कालीसिंधु-चंबल के बाद देश के शेष 29 रिवर इंटरलिंक्स पर भी सहमति बनाकर काम शुरू जाए।
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