बड़ा सवाल: पंचायती राज व्यवस्था की 30वीं सालगिरह, कितनी बढ़ी महिलाओं की सहभागिता?
इस में कोई दो राय नहीं की पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, किंतु क्या वास्तव में ग्रामीण शासन की बागड़ोर महिलाओं को मिली या महिला सशक्तीकरण के लक्ष्य के हम पास आए?
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लोकतंत्र में पंचायत विकास की पहली सीढ़ी है। पंचायत, प्राचीन काल से ही भारतीय लोकतांत्रिक व्यस्था का मूल आधार एवं सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग रहा है। संवैधानिक रूप से पंचायती राज व्यवस्था 24 अप्रैल 1993 से पूरे देश में लागू है।
73वें संविधान संशोधन के बाद, संविधान के अनुच्छेद 243 (डी) (3 ) एवं (4) के अनुसार, प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक-तिहाई स्थान (जिनके अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या भी है) स्त्रियों के लिए आरक्षित (एकल पद सहित) रहेंगे। 33% आरक्षण मिलने के बाद पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका और भागीदारी बढ़ी है।
देश के सभी राज्य (केवल उत्तर प्रदेश, मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश एवं 5 केंद्र शासित प्रदेश को छोड़कर) में महिला आरक्षण को 33% से बढ़ाकर 50% कर दिया गया है।
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देश में करीब 660 ज़िला पंचायतों, 6900 माध्यमिक पंचायतों, 2.6 लाख ग्राम पंचायतों में 32 लाख से अधिक निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं, जिसमें से 46% महिला प्रतिनिधि हैं, जो सत्ता में महिला के हिस्सेदारी को दर्शाती हैं।
महिलाओं की बढ़ी भागीदारी
इस में कोई दो राय नहीं की पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, किंतु क्या वास्तव में ग्रामीण शासन की बागड़ोर महिलाओं को मिली या महिला सशक्तीकरण के लक्ष्य के हम पास आए?
पुरुष प्रधान समाज में जनप्रतिनिधि बनने मात्र से महिलाओं का सशक्तीकरण हो सकता है? रिपोर्ट एवं रिसर्च की मानें तो महिलाओं के सशक्तीकरण एवं हिस्सेदारी के बीच कोई सीधा संबंध नहीं दिख रहा है। जनप्रतिनिधि बनने के बाद केवल 5-10 फीसदी महिलाएं ही घर की दहलीज पार कर अपनी राजनैतिक भागीदारी दे रही हैं।
अमेरिका की उप राष्ट्रपति कमला हैरिस ने संयुक्त राष्ट्र में अपने पहले संबोधन में कहा था कि किसी भी देश में लोकतंत्र का स्तर महिलाओं के सशक्तीकरण पर निर्भर करता है। केवल चुनाव जीतने से कुछ नहीं होता, निर्णय लेने की शक्ति मिली या नहीं, उस शक्ति के सदुपयोग करने के लिए किस तरह का वातावरण मिल रहा है, ये महत्पूर्ण है।
पंचायती राज व्यवस्था के 30 वर्ष
देश की पंचायती राज व्यवस्था जब 30वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, तब सच्चाई ये है कि महिला के आरक्षित पद पर जीते महिला जनप्रतिनिधि के पति, परिवार के दबंग पुरुष उस पद पर डी फैक्टो आसीन हो कर राज कर रहे हैं। किसी भी महिला के जीतने पर लोग उस महिला को कम बल्कि उसके पति, पुत्र, पिता, ससुर को अधिक बधाई देते हैं।
चौक चौराहों पर दिनचर्या में यह चर्चा आप ने भी सुनी होगी कि फलां की घरवाली या वाइफ जीत गई। महिला जन प्रतिनधियों की हालत ये है कि पंचायतराज अधिनियम के विपरीत सरकारी बैठकों में भी महिला जन प्रतिनधि की जग़ह उनके पति या परिवार के पुरुष बैठक में आते हैं और कामकाज में दखलंदाजी भी करते हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार सहित कई राज्य में पंचायती राज विभाग या पदाधिकारी को ऑफिस आर्डर निकालना पड़ा कि ग्राम पंचायतों और सभी सरकारी बैठकों में महिला जन प्रतिनधि स्वयं आएंगी एवं मीटिंग पंचायतघरों अथवा पंचायतघर नहीं होने पर प्राथमिक स्कूल में होंगी। केवल क़ानून बनाने से कुछ फ़र्क नहीं होगा बल्कि महिला वर्ग की सहभागिता बढ़ानी होगी ।
महिला जन प्रतिनिधि को आत्मनिर्भर बनना चाहिए, पहले घर के निर्णय में भागीदारी की लड़ाई लड़े। चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए, तभी सही अर्थ में महिला सशक्तीकरण एवं ग्रामीण लोकतंत्र मजबूत व सुदृढ़ होगा। साथ साथ समाज व व्यवस्था को महिला के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना होगा।
वर्तमान समय में प्रत्येक क्षेत्र में महिलाएं अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती चली आ रही हैं। इक्कीसवीं शताब्दी एवं वैश्वीकरण की इस दौड़ में महिलाएं, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। हमें सामाजिक परिवर्तन करना होगा। महिला जन प्रतिनिधयों को अपनी पहचान एवं धमक का एहसास कराना होगा। इसके लिए पति या ससुर के नाम की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए।
महिलाओं का सराहनीय प्रदर्शन
कई पंचायतों में महिला मुखिया ने बहुत अच्छा कार्य किया है। हिमाचल के काजा पूर्व पंचायत की प्रधान सोनम डोलमा ने बेहतरीन मिसाल पेश की हैं, जैसे जुआ व ताश पर प्रतिबंध लगाया, ये देश के अन्य पंचायतों के लिए एक अच्छा मॉडल हो सकता है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के सोनबरसा प्रखंड में सिंहवाहिनी पंचायत की पूर्व मुखिया ऋतु जायसवाल ने भी ने अच्छी पहचान बनाई है।
छवि राजावत, सुषमा भादु, मीना बहन, वंदना बहादुर, आरती देवी, अतराम पद्म बाई, भक्ति शर्मा और राधा देवी आदि जैसे महिला पंचायत प्रधान हर राज्य में मिल जाएंगी केवल जरूरत है कि महिला स्वयं फैसले लें, तभी महिला-पुरुष का फासला मिटेगा। गरीबमुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त व प्रधानपतिमुक्त पंचायतों से ही महिला सशक्तीकरण का संवैधानिक प्रयास सफल हो पायेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं।