पश्चिम बंगाल और बाबरी मस्जिद की राजनीति: विवादों के बीच उपासना स्थल के मायने
पिछले दशक में राज्य के भीतर एक ऐसी राजनीतिक हवा तैयार की गई है, जिसमें धर्म को बढ़ते हुए प्रत्यक्ष राजनीतिक साधन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर द्वारा बाबर के नाम पर मस्जिद निर्माण की घोषणा ने नई बहस को जन्म दिया।
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पश्चिम बंगाल की धरती सदियों से बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र रही है। बहुभाषी, बहुधर्मी और गहन समन्वयवादी सामाजिक संरचना ने इसे भारतीय पहचान के उस रूप का प्रतीक बनाया है, जहां विविधता को टकराव नहीं बल्कि शक्ति माना जाता है। किंतु पिछले दशक में राज्य के भीतर एक ऐसी राजनीतिक हवा तैयार की गई है, जिसमें धर्म को बढ़ते हुए प्रत्यक्ष राजनीतिक साधन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर द्वारा बाबर के नाम पर मस्जिद निर्माण की घोषणा ने नई बहस को जन्म दिया।
यह घोषणा केवल किसी धार्मिक संरचना के निर्माण का विषय नहीं है; यह राजनीतिक शतरंज की एक सोची-समझी चाल प्रतीत होती है। विशेष रूप से 6 दिसंबर वही दिन जब 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी को आधार-शिला के लिए चुना जाना, अपने आप में गहरे राजनीतिक सांकेतिक अर्थ रखता है। डेविड ओसबॉर्न और केविन रॉबिन्स अपनी कृति Politicisation of Cultural Symbols में लिखते हैं कि भावनात्मक सांस्कृतिक प्रतीक राजनीति में तुरंत जन-उत्तेजना उत्पन्न करने के प्रभावी उपकरण बन जाते हैं। मुर्शिदाबाद की यह घटना इसी सिद्धांत का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रतीत होती है।
सबसे मूल प्रश्न इतिहास का है क्या बाबर का बंगाल से कोई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या भौगोलिक संबंध रहा था?
विश्वसनीय इतिहासकारों का उत्तर स्पष्ट है नहीं।
प्रसिद्ध विद्वानों एलिएट और डॉसन की रचना History of India as Told by Its Own Historians तथा जदुनाथ सरकार की प्रामाणिक पुस्तक Babur दोनों यह प्रमाणित करती हैं कि बाबर का राज्य कभी बंगाल तक नहीं पहुंचा और न ही उसने इस दिशा की यात्रा की थी। ऐसे ठोस ऐतिहासिक साक्ष्यों के बीच मुर्शिदाबाद में बाबर के नाम पर मस्जिद बनाना न तो ऐतिहासिक रूप से उचित प्रतीत होता है, न सांस्कृतिक रूप से स्वाभाविक और न धार्मिक दृष्टि से आवश्यक।
इस्लामी परंपरा भी ऐसी उपासनाओं या संरचनाओं का प्रोत्साहन नहीं देती जो स्थानीय इतिहास, सामुदायिक आवश्यकता या धार्मिक संदर्भ से असंबद्ध हों। न्यायशास्त्रीय सिद्धांत स्थानीय परिस्थितियों, सामूहिक हित और वास्तविक धार्मिक आवश्यकता को प्राथमिकता देते हैं। यहां इन तीनों का अभाव स्पष्ट है, इसलिए यह प्रश्न और अधिक गंभीर हो उठता है बाबर ही क्यों? वर्तमान राजनीतिक माहौल में उनके नाम का क्या निहितार्थ है, और यह किस प्रकार साम्प्रदायिक तापमान को प्रभावित कर सकता है?
इस्लामी इतिहास स्वयं प्रमाण है कि जब कोई उपासना-स्थल विवाद, विभाजन या राजनीतिक चालों का केंद्र बन जाए, तो उसे सदैव नापसंद किया गया है। मस्जिद-ए-ज़़रार (क़ुरान, सूरा तौबा 107–108) इसका सर्वाधिक उल्लेखनीय उदाहरण है। इमाम इब्न-कसीर अपनी कृति अल-बिदाया वन्-निहाया में स्पष्ट लिखते हैं कि वह मस्जिद ईश्वरीय दृष्टि में स्वीकार्य नहीं रहती जो एकता के बजाय विघटन का माध्यम बन जाए। इस संदर्भ में मुर्शिदाबाद परियोजना की नीयत, भूमि-विवाद और राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर उठ रहे प्रश्न अत्यंत गंभीर और उचित हैं—क्या यह मस्जिद उपासना का स्थल बनेगी या केवल राजनीतिक लाभ के लिए प्रयोग किया जाने वाला प्रतीक?
बंगाल का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां धर्म-आधारित लामबंदी अत्यंत संवेदनशील विषय रहा है। कबीर की घोषणा के तुरंत बाद राज्य में ध्रुवीकरण की गतिविधियों में तेजी दिखी। सार्वजनिक धार्मिक पाठ, मोहल्ला-स्तर पर पहचान आधारित जुटान, रैलियां और राजनीतिक संदेशों से भरी सभाएं। प्रसिद्ध राजनीतिक वैज्ञानिक पॉल आर. ब्रास अपनी उत्कृष्ट कृति The Production of Hindu-Muslim Violence in Contemporary India में सिद्ध करते हैं कि कई बार साम्प्रदायिक तनाव राजनीतिक लाभ हेतु योजनाबद्ध रूप से निर्मित किया जाता है। बंगाल की मौजूदा परिस्थितियाँ इस सिद्धांत का सजीव रूप प्रतीत होती हैं।
कभी सांस्कृतिक उदारवाद, साझा “बंगाली अस्मिता” और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक रहा बंगाल आज पुनः पहचान-आधारित राजनीति के खतरे से घिरने लगा है। कई विश्लेषक आशंका व्यक्त करते हैं कि ऐसे कदमों का उद्देश्य बंगाल के मुस्लिम मतदाता की एक नई छवि गढ़ना भी हो सकता है। भावुक, प्रतिक्रियाशील और राजनीतिक रूप से आसानी से प्रभावित होने वाला। यह चिंता निराधार नहीं है; विश्व राजनीति, विशेषकर मध्य-पूर्व का इतिहास, बताता है कि धार्मिक विभाजन को अक्सर समुदायों को कमजोर करने की रणनीति के रूप में प्रयोग किया गया है।
हुमायूं कबीर का राजनीतिक सफर इस संदर्भ को और जटिल बना देता है। विभिन्न राजनीतिक दलों में उनका आना-जाना, बार-बार गठबंधनों में बदलाव और अचानक धार्मिक-भावनात्मक मुद्दों के प्रवक्ता के रूप में उभरना, वह पैटर्न दर्शाता है जिसे स्टेनली टैम्बिया Identity Mobilisation and Political Opportunism की अवधारणा में विस्तार से समझाते हैं। जब राजनीति प्राथमिक लक्ष्य बन जाए, तब धार्मिक भावनाओं का उपयोग अत्यंत प्रभावी राजनैतिक साधन में बदल जाता है। मुर्शिदाबाद की घोषणा धार्मिक समर्पण से अधिक इसी अवसरवादी राजनीति से मेल खाती प्रतीत होती है।
इतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक आयामों का संयुक्त विश्लेषण एक स्पष्ट निष्कर्ष की ओर ले जाता है। मुर्शिदाबाद में बाबर के नाम पर मस्जिद निर्माण का प्रस्ताव श्रद्धा से अधिक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। यह प्रवृत्ति न केवल जोखिमपूर्ण है बल्कि बंगाल जैसे बहु-सांस्कृतिक प्रदेश के लिए विशेष रूप से हानिकारक हो सकती है, जहाँ सामाजिक एकता सदैव मूल्यवान और नाज़ुक रही है।
बंगाल के नागरिकों विशेषकर मुस्लिम समाज को यह समझना होगा कि धर्म के नाम पर खेले गए राजनीतिक खेल कभी किसी समुदाय के लिए कल्याणकारी सिद्ध नहीं हुए हैं। यदि हुमायूं कबीर सचमुच समाज की सेवा करना चाहते हैं, तो उन्हें सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने और संवेदनशील वातावरण में नई चिंगारी पैदा करने से बचना चाहिए। समाज को भी सतर्क रहना होगा, ताकि उसकी भावनाएँ, आस्थाएँ और धार्मिक स्थल किसी गुप्त राजनीतिक एजेंडे का ईंधन न बनें।
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