मानसून की कहानियां: सावन की बूंदों में गुंथी यादों की लड़ियां और बचपन के दिन
मौसम मन पर प्रभाव डालते हैं। जीवन के कैनवास पर हर ऋतु के अपने रंग उतरते हैं। फिर बात यदि मानसून और बारिश की हो तो रिमझिम फुहारों को देखकर किसका मन बचपन की यादों में नहीं खो जाता होगा।
पढ़िए स्वाति शैवाल का बारिश की यादों में भीगा हुआ ये लेख..!
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छठी या सातवीं कक्षा की ही तो बात है। बारिश का आना मतलब कम से कम दो बार जानबूझकर भीगना, गड्ढों में भरे पानी मे कूदना, सुबह सुबह स्कूल के प्रिमाइसिस में मौजूद हरसिंगार के फूलों को इकट्ठा कर अपने पेंसिल बॉक्स में बंद कर लेना और निमाड़ के उस छोटे से कस्बे में पूर पर आई नर्मदा को देखने जाना। इनमे से कुछ काम रचनात्मक थे तो कुछ रोमांच से भरपूर।
यादों की बारिश और बचपन के दिन
जब बाढ़ से उफनती नर्मदा मैया किसी धड़धड़ाती ट्रेन की तरह आवाज़ करती सामने से गुजरती तो कुछ सेकेंड्स के लिए ऐसा लगता जैसे हम भी उसके साथ भाग रहे हैं। बड़े-बड़े लकड़ी के लट्ठे बहकर नदी के साथ चले आते और उनको इकट्ठा करने के लिए किनारे पर मुस्तैद खड़े होते थे गांव के कुछ नौजवान, कुछ मल्लाह। उन्हें नदी के उफनते वेग से डर नहीं लगता था। आखिर तो मां रेवा उनकी पालनहार ठहरीं। बस किनारे से पानी और घाट की सीढ़ी को हाथ के किनारे से छूकर वे माथे से लगाते और किनारे पर लगी चेन पकड़कर पानी में उतर जाते।
फिर हाथ से बंटी हुई जूट की रस्सी से बांधकर लट्ठे खींचकर किनारे पर जमा किये जाते। हम बच्चे किनारे पर खड़े उन बिना किसी सप्लीमेंट के नैचुरली बनी मजबूत भुजाओं वाले सुपरहीरोज़ को आश्चर्य से देखते। उनका काम किसी लय में चलता। जैसे माँ नर्मदा अपने बच्चों को कोई वीरता गीत सुना सुनाकर प्रोत्साहित कर रही हो। 'संगठन में शक्ति है' का इससे अच्छा उदाहरण और क्या होता भला।
घाट की सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते पापा सीढ़ियों पर लिखे वर्ष के बारे में 'फैक्टीपीडिया' बताते चलते। जब ऊपर वाली सीढ़ी पर आते आते पापा बताते कि एक बार नर्मदा मैया इस कस्बे में अंदर तक आ गई थीं तो हमारी आंखें उस सीन की कल्पना करके हैरत के मारे खुली रह जातीं।
नदी-बारिश और हम
ऐसे ही एक दिन जब झिरमिर गिरती बारिश की बूंदों के बीच हमने मां और दादी को नदी किनारे के शिव मंदिर जाने के बारे में चर्चा करते सुना तो बिना कारण जाने ही हम भी साथ हो लिए। वह सावन का पहला सोमवार था। हमारे लिए लालच का कारण था नदी और बारिश।
मां ने पूजा की थाली सजाई। बाई यानी दादी ने तांबे के लोटे में जल भरा और अपने हाथ के बनाये क्रोशिये के थालपोश से पूजा की थाली को ढंका और हम चल पड़े। नदी किनारे पीली प्लास्टिक से ढंकी पूजन की छोटी सी दुकान से हमने नारियल और बिल्वपत्र लिए। मां ने बताया कि नदियां हमेशा अपने किनारों पर जीवन और पोषण के स्रोत खड़े करती हैं। इसका मतलब बड़े होने पर मुझे समझ आया। हम बच्चों के लिए घर में ट्रेडिशनल विकिपीडिया के लिए दादी, सोशल विकिपीडिया के लिए मम्मी और फैक्चुअल जानकारी के लिए 'पापा पीडिया' मौजूद रहे ही।
हमने नीचे घाट पर जाकर शिवजी की पूजा की। बीच रास्ते से दादी ने कोई मंत्र बुदबुदाते हुए बैंगनी और सफेद आभा लिए हुए आंकड़े के फूल और कलात्मक सादगी से साध्वी की सी रौशनी से सज्जित धतूरे के फूल तोड़े। दादी ने बताया कि भोले भंडारी सामान्य प्राकृतिक श्रृंगार और साधनों से प्रसन्न हो जाने वाले हैं। आडम्बर रहित, बाघाम्बर धारी शिव हमें जीवन को सरलता से जीने और अपने सिद्धांतों से समझौता न करने की प्रेरणा भी देते हैं।
दादी ने ही यह भी बताया कि आंकड़े के फूलों से निकलने वाला दूध जैसा पदार्थ जहरीला होता है और इसके पत्तों का इस्तेमाल दवाई के तौर पर भी होता है। आंकड़े के अलावा धतूरे के बार में 'कनक कनक....' वाली बात तो हमने बाद में पढ़ी और समझी।
घर आते ही खाने की सुगन्ध ने मन मोहा और हम बच्चों ने तय किया कि हम भी सावन सोमवार के व्रत करेंगे। भरपेट खाना खाने के बाद माँ और दादी को अपने इरादे अवगत करवाया गया और पूछा कि व्रत का मतलब क्या है। माँ ने बताया कि व्रत मतलब एक समय का भोजन।
लेकिन हम तो सुबह नाश्ता और फिर स्कूल में लंचबॉक्स में आचार पराठे भी खा चुके थे। तो अब.... क्या हमारा व्रत पूरा नहीं होगा? तब माँ ने समझाया बच्चों के लिए सब छूट है। बस उस दिन से हमारा सावन सोमवार का व्रत शुरू हो गया। यह हमारे लिए टेस्टी व्यंजनों के लुत्फ के साथ ही कई सारी रचनात्मक चीजों को जानने का भी दौर था।
बिना इंटरनेट के हम और हमारी दुनिया
यह वह दौर था जब घर में बिना इंटरनेट भी हम दुनिया जहान की रोचक जानकारी पा लिया करते थे। उस समय व्रत का असली लालच तो ख़ैर, फलाहार और घर मे बने आलू चिप्स, मिल्क शेक का ही था। ऊपर से हर एक-दो घन्टे में दादी का 'छोरियां उपासी हैं' का सांत्वना से भरपूर गुणगान जैसे दुनिया में अकेली उनकी पोतियां ही व्रत रख रही हों। तो हमारा पूरा दिन खाते हुए ही गुजरता। जब अपनी गृहस्थी में आये तब ये समझ आया कि हमारे लिए दिनभर तरह तरह के फलाहार तैयार करने वाली माँ और दादी का तो भोजन एक ही समय का होता था।
वो भी दोपहर ढलने पर। पिताजी व्रत उपवास में यकीन नहीं करते थे सो वे कोशिश करते कि मां दादी कम से फल ही खा लें सुबह लेकिन बिना नहाए दोनों सिर्फ चाय सुड़कती रहतीं। मन में एक प्रश्न हमेशा से है, क्यों परिवार की सलामती, पति और बच्चों की लंबी उम्र के नाम पर हर व्रत त्योहार को महिलाओं के नाम पर लिख दिया गया है?
हालांकि महिलाएं कभी भी शिकायत नहीं करतीं। शायद इसलिए क्योंकि वाकई वो ताकतवर होती हैं, शरीर से भी और मन से भी। या कि उनके लिए परिवार से बढ़कर कुछ नहीं होता इसलिये? हम सिर्फ इस बात को समझ कर भावनात्मक संबल भी दें तो उनके लिए काफी होगा।
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