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जम्मू-कश्मीर मामले के वैधानिक पक्ष को समझिए

Gautam Chaudharyगौतम चौधरी Updated Fri, 16 Aug 2019 03:16 PM IST
Article 370
Article 370 - फोटो : Amar Ujala
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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने एक झटके में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को तो हटा दिया लेकिन इसको लेकर देश व विदेश में तीखी बहस तेज हो गयी है। बहस करने वाले चाहे कोई-सा भी तर्क दे लें लेकिन कश्मीर के मामले में अब यह बात छुपी नहीं है कि भारत के ही पैसे पर घाटी के अलवाववादी समूह, अलगाववादी एजेंडा चलाकर भारत को ही अपमानित करने की कोशिश करते रहे हैं।
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साथ ही कुछ मुट्ठीभर लोग पूरे कश्मीर को गुलाम बनाकर रखे हुए थे। अनुच्छेद 370 हो या फिर जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने वाली धारा 35ए, दोनों ही मामले में सर्वोच्च न्यायालय में पृथक-पृथक कई याचिकाएं विचारार्थ लंबित हैं। अनुच्छेद 370 की वैधता को चुनौती देते हुए सन् 2014 में रामेश्वर प्रसाद गोलय के नेतृत्व में ‘‘वी द जस्टिस’’ नामक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। याचिका दाखिल करने वाले मुख्य अधिवक्ता बरुण कुमार ने बताया कि संविधानिक दृष्टि से दोनों धाराएं और उपधाराएं गलत है। यह अस्थिाई है और सरकार अपने अनुसार किसी भी वक्त इसे वापस ले सकती है।

वी द जस्टिस बनाम भारत सरकार का यह मामला, जिसकी याचिका संख्या 72 है, उसमें भारत सरकार को इन दोनों मामलों में स्थिति स्पष्ट करने, धारा को समाप्त करने और कश्मीर में भारतीय संविधान को पूर्णरूपेण लागू करने की मांग की गयी है। यहां बता दें कि उस वक्त संविधान सभा में उक्त अनुच्छेद को प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन मंत्रिपरिषद् के सदस्य गोपालस्वामी आयंगार ने कहा था कि यह अनुच्छेद सन् 1957 में राज्य में संविधान सभा के विलय के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस बात की भी चर्चा याची ने अपने आवेदन में किया है।

याची ने कहा है कि केशवचंद भारती और उसके बाद के अनेक वादों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों के आलोक में अनुच्छेद 370 भी भारतीय संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध है, अतः पोषणीय नहीं है। इसी प्रकार वेस्ट पाकिस्तान रिफ्यूजी एक्शन कमेटी तथा चारुवली खन्ना द्वारा दायर चाचिकाओं में भी क्रमशः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में वर्णित समानता के अधिकार और राज्य संविधान की धारा 6 की भावना के विपरीत बताते हुए 35ए को चुनौती दी गयी है। 35ए की वैधाानिकता की सुनवाई कर रही पीठ ने मामले को 3 सदस्यीय पीठ के पास भेज दिया। यह पीठ विचार करेगी कि क्या यह वाद संविधान पीठ को सौंपा जा सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि वर्तमान पीठ प्रथम दृष्टया 35ए की वैधानिक समीक्षा की आवश्यकता से सहमत है। 3 सदस्यीय पीठ के संतुष्ट होने पर 5 या उससे अधिक न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन का मार्ग खुल जाएगा। 
 
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