जम्मू-कश्मीर मामले के वैधानिक पक्ष को समझिए
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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने एक झटके में कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को तो हटा दिया लेकिन इसको लेकर देश व विदेश में तीखी बहस तेज हो गयी है। बहस करने वाले चाहे कोई-सा भी तर्क दे लें लेकिन कश्मीर के मामले में अब यह बात छुपी नहीं है कि भारत के ही पैसे पर घाटी के अलवाववादी समूह, अलगाववादी एजेंडा चलाकर भारत को ही अपमानित करने की कोशिश करते रहे हैं।
साथ ही कुछ मुट्ठीभर लोग पूरे कश्मीर को गुलाम बनाकर रखे हुए थे। अनुच्छेद 370 हो या फिर जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने वाली धारा 35ए, दोनों ही मामले में सर्वोच्च न्यायालय में पृथक-पृथक कई याचिकाएं विचारार्थ लंबित हैं। अनुच्छेद 370 की वैधता को चुनौती देते हुए सन् 2014 में रामेश्वर प्रसाद गोलय के नेतृत्व में ‘‘वी द जस्टिस’’ नामक संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। याचिका दाखिल करने वाले मुख्य अधिवक्ता बरुण कुमार ने बताया कि संविधानिक दृष्टि से दोनों धाराएं और उपधाराएं गलत है। यह अस्थिाई है और सरकार अपने अनुसार किसी भी वक्त इसे वापस ले सकती है।
वी द जस्टिस बनाम भारत सरकार का यह मामला, जिसकी याचिका संख्या 72 है, उसमें भारत सरकार को इन दोनों मामलों में स्थिति स्पष्ट करने, धारा को समाप्त करने और कश्मीर में भारतीय संविधान को पूर्णरूपेण लागू करने की मांग की गयी है। यहां बता दें कि उस वक्त संविधान सभा में उक्त अनुच्छेद को प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन मंत्रिपरिषद् के सदस्य गोपालस्वामी आयंगार ने कहा था कि यह अनुच्छेद सन् 1957 में राज्य में संविधान सभा के विलय के साथ ही समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस बात की भी चर्चा याची ने अपने आवेदन में किया है।
याची ने कहा है कि केशवचंद भारती और उसके बाद के अनेक वादों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों के आलोक में अनुच्छेद 370 भी भारतीय संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध है, अतः पोषणीय नहीं है। इसी प्रकार वेस्ट पाकिस्तान रिफ्यूजी एक्शन कमेटी तथा चारुवली खन्ना द्वारा दायर चाचिकाओं में भी क्रमशः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में वर्णित समानता के अधिकार और राज्य संविधान की धारा 6 की भावना के विपरीत बताते हुए 35ए को चुनौती दी गयी है। 35ए की वैधाानिकता की सुनवाई कर रही पीठ ने मामले को 3 सदस्यीय पीठ के पास भेज दिया। यह पीठ विचार करेगी कि क्या यह वाद संविधान पीठ को सौंपा जा सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि वर्तमान पीठ प्रथम दृष्टया 35ए की वैधानिक समीक्षा की आवश्यकता से सहमत है। 3 सदस्यीय पीठ के संतुष्ट होने पर 5 या उससे अधिक न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन का मार्ग खुल जाएगा।
मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है और यह समय ही बताएगा कि फैसला क्या है लेकिन जम्मू-कश्मीर की राजनीति में 35ए की संवैधानिक समीक्षा की संभावना भर से तूफान खड़ा होता रहा है। खैर अब सरकार ने तो इसे निरस्त ही कर दिया है। इसके पूर्व जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर, 2015 को एक फैसले में कहा था कि जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला अनुच्छेद 370 स्थाई है।
इसलिए इसमें कोई संशोधन या इसे हटाने की गुंजाइस नहीं बनती है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा था कि 35ए राज्य में लागू कानूनों को सुरक्षा प्रदान करती है। उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत के अन्य राज्यों की तहर नहीं है। इसे सीमित संप्रभुता प्राप्त है। इसलिए इसे विशेष राज्य का दर्जा दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं माना। जबतक ‘सरफेसी एक्ट’ का मामला जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में था, अलगाववादी निश्चित थे। उसमें भी मूल प्रश्न का संबंध 35ए से जोड़ने की कोशिश हुई थी लेकिन जैसे ही वह मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया तो सारा राजनीतिक कुचक्र तार-तार हो गया। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति जोसेफ कुरियन एवं न्यायमूर्ति रोहिंगटन नरीमन की दो सदस्यीय पीछ ने अपने फैसले में न केवल जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया बल्कि उच्च न्यायालय के निर्णय को परेशान करने वाला बताया।
जम्मू-कश्मीर न्यायालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय ने समानांतर नागरिकता देने वाला निर्णय करार दिया और कहा कि जम्मू-कश्मीर के नागरिक सर्व प्रथम भारतीय संघ के नागरिक हैं। यही नहीं संविधान के अनुच्छेद 3 के अनुसार जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, जिसे बदला नहीं जा सकता है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर में इसके विरोध के पीछे एक भय काम कर रहा है। कश्मीर में दशकों से एक झूठ का प्रचार किया जा रहा है। इसमें स्थानीय राजनीतिक दलों से लेकर अलगाववादी तत्व तक शामिल हैं। राज्य में विशेष दर्जे के नाम पर जो कुछ भी हुआ है उसका लाभ वहां के मुट्ठीभर लोग उठाते रहे हैं। वहीं भारतीय संविधान में प्रदत्त मूलभूत अधिकार से लाखों कश्मीरियों को बंचित रखा गया है।
अनुच्छेद 370 को लेकर घाटी में मचा हंगामा उन कारणों से नहीं है जो प्रत्यक्ष रूप से बताया जा रहा है। यह इसलिए भी नहीं है कि 35ए का क्या होगा। आने वाली पीढियों के भविष्य, उनकी नौकरियों और पढ़ाई की जो बात की जा रही है वह भी छलावा मात्र है। अगर उतनी ही चिंता होती तो रोज-रोज के बंद और नौजवानों को बंदूक थमाने की साजिश का विरोध किया गया होता। इस दोनों धारा और उपधारा के हट जाने से दशकों से जो वहां के नागरियों के साथ अन्याय हो रहा था वह झटके में समाप्त हो गया।
सच पूछिए तो जम्मू-कश्मीर में सक्रिय अलगावादी इतिहास से आंखें चुराते रहे हैं। जम्मू-कश्मीर और भारत दो पृथक इकाई नहीं है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। ऐतिहासिक सत्य हजारों वर्ष पुराना है। महाभारत, नीलमत पुराण और राजतरंगिणी जैसे ग्रंथ इसके प्रमाण हैं। मुगल काल हो या सिख राज, जम्मू-कश्मीर का राजनैतिक प्रशासन भारतीय इतिहास के बड़े कालखंड में देश की मुख्य भूमि से ही चली है। ललितादित्य और अभिनवगुप्त के समय अधिकांश भारत जम्मू-कश्मीर से प्रशासित था।
इस बात को अलगाववादी स्थानीय युवा पीढी को नहीं जानने देना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि राज्य का विशेष दर्जा इस योजना में सार्थक साबित होगा। इसलिए वे इस दर्जे को बनाए रखना चाहते हैं। अलगाववादियों के इस सोच के कारण अभी तक 1988 से अबतक राज्य में 50 हजार से अधिक आतंकी आक्रमण हुए हैं। इन आक्रमणों में लगभग इतने ही लोग मारे गए हैं। इन बारदातों में लगभग 24 हजार आतंकवादी मारे गए हैं जबकि 15 हजार निर्दोष नागरिक मारे गए। स्थानीय लोगों की सुरक्षा करते हुए लगभग 6 हजार सुरक्षाबलों को भी अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा है।
कश्मीर पहले शांत था। स्वतंत्रता के बाद कश्मीर में देश के अन्य हिस्सों की अपेक्षा ज्यादा शांति थी लेकिन 1971 में हार के बाद पाकिस्तान ने यह तय कर लिया कि अब भारत के साथ आमने-सामने की लड़ाई हम नहीं करेंगे। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ क्षद्म युद्ध प्रारंभ किया। इसके प्रणेता पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल जियाउल हक को माना जाता है। उन्होंने कश्मीर में अपने गुर्गे भेजने लगे। वर्ष 1988 तक यहां का माहौल खड़ाब हो गया और भारत सरकार को कश्मीर का प्रशासन अपने हाथ में लेना पड़ा।
उस समय से जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी और अलगाववादी सक्रिय हैं। यह तबतक सक्रिय रह सकते हैं जबतक राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है। अब जब दर्जा समाप्त हो गया है तो इन्हे भी वहां से भागना पड़ेगा। क्योंकि इसी कानून का वे फायदा उठाकर भारत के खिलाफ लड़ाई को अंजाम देते रहे हैं।
यहां धारा 370 को समझने के लिए उन दिनों जो संविधान सभा में चर्चा हुई वह जानना जरूरी है। भारतीय संविधान सभा के प्रस्तावना आने पर वर्तमान उत्तर प्रदेश से संविधान सभा के प्रतिनिधि मौलाना हजरत मोहानी ने प्रश्न पूछा कि कश्मीर को लेकर यह भेद-भाव वाला अनुच्छेद क्यों है? उस पर तत्कालीन मंत्रिपरिषद के सदस्य गोपालस्वामी आयंगार ने छह चरणों में इस उपबंध को समझाया था। पहला जम्मू-कश्मीर राज्य के अंतर्गत युद्ध चल रहा है। फिलहाल यह संभव नहीं है कि संविधान को वहां लागू किया जाए।
सामान्य स्थिति होते ही संविधान लागू कर दिया जाएगा और इस अनुच्छेद को हटा लिया जाएगा। दूसरा, राज्य का कुछ हिस्सा आक्रमणकारियों यानी पाकिस्तान के कब्जे में है। तीसरा, राज्य को लेकर सयुक्त राज्य संघ में हम उलझे हुए हैं, वहां कश्मीर समस्या का समाधान अभी बाकी है। चैथा, भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लोगों से वादा किया है कि सामान्य स्थिति होने के पश्चात जनता की इच्छाओं के अनुसार अंतिम निर्णय किया जाएगा। पांचवां, प्रजासभा का अब अस्तित्व नहीं है। हमने स्वीकार किया है कि राज्य की अलग से संविधान सभा द्वारा केन्द्रीय संविधान का दायना एवं राज्य के संविधान का निर्णय किया जाएगा। छठा, इन विशेष परिस्थितियों के कारण अस्थाई तौर पर इस अनुच्छेद-370 को संविधान में शामिल किया गया है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि न तो अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का स्थाई अंग है और न ही 35ए भारतीय संविधान की स्थाई धारा है। ये दोनों पहले से खत्म हो जाने चाहिए थे लेकिन कुछ गलतियों के कारण और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह आजतक बरकरार है। जबतक इस प्रकार की धाराएं रहेगी देश की एकता और अखंडता पर खतरे मंडराते रहेंगे। इसलिए आज नही ंतो कल सरकार को इसे हटाना ही पड़ता। यदि ऐसा नहीं होता तो भारत का हाल सोवित संघ वाला होता। वर्तमान सरकार ने इसे हटाकर बढ़िया काम किया है। इससे जम्मू-कश्मीर की जनता को स्वतः कई मौलिक अधिकार प्राप्त हो जाएंगे और घाटी के मुट्ठीभर लोगों का पूरे राज्य पर जो अनाधिकार कब्जा है वह भी समाप्त हो जाएगा।
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