खतरनाक राह पर मणिपुर: हिंसा की सारी हदें हो रही हैं पार, सरकार को अब सख्ती बरतने की जरूरत
युद्ध के दौरान भी शत्रु पक्ष के एंबुलेंस पर हमला नहीं किया जाता है। पूर्वोत्तर में भी उग्रवादी समूहों ने कभी किसी बच्चे या महिला पर जान-बूझकर हमला नहीं किया है। लेकिन मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जारी हिंसा ने सारी हदें पार कर दी हैं। इनके लिए मानवता का कोई मतलब नहीं है। आज के समय में भी ये पाषाण काल में चले गए हैं।
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विस्तार
एक घायल बच्ची को लेकर जा रही दो महिलाओं के साथ तीन लोगों के एंबुलेस को भीड़ ने रोककर जला दिया। एंबुलेस को लेकर जा रहे कमांडो पुलिस अधीक्षक को जान बचाने के लिए साधारण कार से भागना पड़ा। इससे साफ है कि मणिपुर खतरनाक राह पर चल पड़ा है। कानून का राज चलाने के लिए अब सख्ती की जरूरत है। कूकी महिलाओं ने बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री के आवास के सामने प्रदर्शन किया। उन्हें अब राज्य सरकार पर भरोसा नहीं रहा है।
तीन घायलों को लेकर जा रहे एंबुलेंस को सरेराह जला दिया गया। उस पर सवार तीन लोग पूरी तरह जल गए। इस घटना को करीब दो हजार की भीड़ ने अंजाम दिया। यह घटना इस बात का संकेत है कि मणिपुर खतरनाक राह पर चल पड़ा है। जहां पर चिकित्सा के लिए एंबुलेंस से जा रहे लोगों की भी हत्या कर दी जाती है। मृतकों में एक घायल बालक और उसकी मां भी शामिल है।
युद्ध के दौरान भी शत्रु पक्ष के एंबुलेंस पर हमला नहीं किया जाता है। पूर्वोत्तर में भी उग्रवादी समूहों ने कभी किसी बच्चे या महिला पर जान-बूझकर हमला नहीं किया है। लेकिन मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जारी हिंसा ने सारी हदें पार कर दी हैं। इनके लिए मानवता का कोई मतलब नहीं है। आज के समय में भी ये पाषाण काल में चले गए हैं।
केंद्र और राज्य सरकार ने अपने स्तर पर संवाद की कोशिश की थी। बावजूद इसके इस तरह की भयानक हिंसा जारी है। मृतक जान बचाने के लिए सुरक्षाबलों के शिविर में थे, जहां पर हमला किया गया। ये लोग घायल हो गए थे। उन्हें सुरक्षाबलों की निगरानी में बेहतर चिकित्सा के लिए एंबुलेंस से ले जाया जा रहा था। इस दौरान भीड़ ने रास्ता रोक लिया। इतनी बड़ी भीड़ पर गोली चलाना सुरक्षाबलों के लिए संभव नहीं था। भीड़ ने एंबुलेंस में आग लगा दी। उस पर सवार तीनों लोग भस्म हो गए।
अब सख्ती बरतने की जरूरत
यह क्रूरता की हद है। इसलिए अब संवाद नहीं, सख्ती की जरूरत है। ऐसे लोग संविधान के खिलाफ हैं। विभिन्न नागरिक संगठनों की अपील के बाद पहली बार मणिपुर समेत समस्त पूर्वोत्तर में सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को हटाने की पहल आरंभ हुई थी। लेकिन मणिपुर में जो कुछ हो रहा है, उससे निपटने के लिए सुरक्षाबलों को विशेष अधिकार की जरूरत है, वरना मणिपुर में जंगल का कानून चलेगा। केंद्रीय गृह मंत्री के दौरे और विभिन्न संगठनों से संवाद के बावजूद ऐसी घटना का होना चिंतनीय है।
केंद्र सरकार को अब सख्ती बरतनी होगी। इसके लिए जरूरत पड़े तो अपनी ही सरकार को निलंबित करके वहां पर राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए, क्योंकि हालात बिगड़ते जा रहे हैं। मैतेई और कुकी समुदायों के बीच की खाई गहरी हो गई है, जिसे भरना फिलहाल तो संभव नहीं दिख रहा है। ऐसे में सुरक्षाबलों को अपना काम करने देना चाहिए।
यह संभव है कि सुरक्षाबलों की कार्रवाई से नागरिक संगठन नाराज हो जाएं, लेकिन वहां के निर्दोष और निरीह लोगों को बचाने के लिए सुरक्षाबलों को पूरी छूट चाहिए। इस बात की भी पड़ताल होनी चाहिए कि इस हिंसा के पीछे कौन लोग हैं?
इतना तो साफ है कि इस घटना के बाद मणिपुर के हालात और बिगड़ सकते हैं। इंटरनेट को बंद करने के बावजूद स्थिति बिगड़ रही है। सूचनाओं को रोककर स्थिति पर बहुत दिनों तक काबू नहीं पाया जा सकता है।
अब केंद्र सरकार के सामने सख्त कार्रवाई के बिना और कोई उपाय नहीं है। हिंसा में शामिल लोगों और समूहों पर सख्त कार्रवाई का समय आ गया है। पूरे मणिपुर में कर्फ्यू लगा देना चाहिए। जब आम लोग परेशान होंगे तो हिंसा फैलाने वाले समूहों पर हिंसा से दूर रहने का दबाव डालेंगे। इस पूरे मामले में मणिपुर की राज्य सरकार भी जिम्मेदार है।
मणिपुर बहुजातीय और बहुधर्मीय राज्य है। किसी एक धर्म के लोगों के पक्ष में काम करने से ही स्थिति बिगड़ी है। इसलिए अब कानून का राज स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। सुरक्षाबलों की पर्याप्त मौजूदगी, हिंसा के खिलाफ कार्रवाई और केंद्र सरकार की सजगता के बावजूद मणिपुर में स्थिति बहाल नहीं हो पाई है। सेना, केंद्रीय सुरक्षाबल तथा राज्य पुलिस का अभियान जारी है।
बावजूद इसके हिंसा की छिटपुट घटनाएं जारी हैं। अभी भी इंटरनेट सेवा बहाल नहीं हुई है। इसी बात से स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। राज्य सरकार को लगता है कि इंटरनेट सेवा जारी करते ही सोशल मीडिया पर आने वाली सूचनाएं स्थिति को और बिगाड़ सकती हैं। लगातार कर्फ्यू और हिंसा से आम लोगों का जीना मुहल हो गया है। जरूरी वस्तुओं की किल्लत हो गई है। अमन पसंद लोग परेशान हैं। जिनकी आर्थिक क्षमता है, वे मणिपुर से निकलकर गुवाहाटी या देश के दूसरे राज्यों की तरफ जा रहे हैं।
पलायन करने को मजबूर हैं लोग
कूकी समुदाय के लोगों का भी पलायन जारी है। काफी संख्या में लोग मिजोरम की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं। उनकी स्थिति पर नजर रखने के लिए मिजोरम में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। मणिपुर के पहाड़ी जिले की सीमा मिजोरम से सटती है। इसलिए काफी संख्या में लोग मिजोरम में प्रवेश कर चुके हैं। मिजोरम में उनके लिए राहत शिविर स्थापित किए गए हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तीन दिनों तक मणिपुर में रहकर स्थिति को समझने की कोशिश की। उन्होंने सभी मैतेई और कूकी समुदायों के नगारिक संगठनों से भी मुलाकात की और स्थिति को सामान्य बनाने में सहयोग मांगा। वे इंफाल से मोरे तक गए और हर समुदाय के लोगों से संवाद की कोशिश की। संघर्ष विराम कर चुके कूकी उग्रवादी संगठनों को अपने-अपने शिविरों में वापस लौटने की चेतावनी भी दी गई।
मैतई-कूकी कूकी समुदाय के बीच विश्वास का संकट
यह कहा जा सकता है कि मणिपुर में सुरक्षाबलों की मौजूदगी के कारण ही हिंसा रुकी है। जैसे ही सुरक्षा बलों की वापसी होगी, हिंसा फिर से शुरू हो सकती है।
दरअसल मैतेई और कूकी समुदाय के बीच विश्वास का संकट पैदा हो गया है। मैतेई बहुल इलाके में कूकी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो कूकी बहुल इलाके में रहने वाले मैतेई डरे हुए हैं। विडंबना यह है कि मणिपुर पुलिस में तैनात अधिकारी भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वे तबादला चाहते हैं। कूकी समुदाय के लोगों को मणिपुर पुलिस पर भरोसा नहीं है। इसलिए वह केंद्रीय पुलिस बल पर भरोसा कर रहे हैं।
स्थिति यह है कि भाजपा के कूकी विधायक भी भाजपा के मुख्यमंत्री के खिलाफ चले गए हैं। वे नेतृत्व परिर्वतन की मांग कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की सरकार, मैतेई के पक्ष में काम कर रही है। मणिपुर पुलिस में शामिल कूकी पुलिस अधिकारियों पर भरोसा नहीं किया जा रहा है। इसीलिए मणिपुर पुलिस के महानिदेशक पद पर त्रिपुरा कैडर के अधिकारी को नियुक्त किया गया है।
मैतेई समुदाय के लोग मणिपुर के क्षेत्रीय अखंडता के पक्ष में किसी भी हद तक जा सकते हैं। जबकि कूकी संगठन अपने इलाके के लिए अलग प्रशासनिक क्षेत्र की मांग कर रहे हैं।
ऐसे में केंद्र और राज्य सरकार की पहली जिम्मेदारी विश्वास बहाली करना है। कूकी समुदाय के लोगों को महसूस होना चाहिए कि सरकार उनके हितों के खिलाफ नहीं है। मैतेई समुदाय बहुसंख्यक है। उन्हें अल्पसंख्यक समुदायों की चिंता को महसूस करना होगा। मणिपुर का विभाजन संभव नहीं है, यह बात कूकी संगठनों को मानकर चलना होगा। केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया है। दोनों समुदायों के संगठनों को हिंदू-ईसाई का चक्कर छोड़, मिलकर बैठकर समस्या का समाधान करना होगा।
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