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मणिपुर हिंसा: त्योहार के सीजन में भी विषाद से जूझता मणिपुर अब खबरों से भी गायब

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Tue, 31 Oct 2023 02:16 PM IST
सार

सरकार, मीडिया और देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोगों ने भी इस छोटे-से खूबसूरत पर्वतीय राज्य के दुख-दर्द को भूल कर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया है। तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया में आपको या तो इजरायल और गाजा पट्टी की खबरें मिलेंगी या फिर दिल्ली के आसपास की।

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Manipur Violence Latest Issues Out Of News During Festive Season
मैतेई और कुकी बहुल इलाकों में विभाजन की दीवार बेहद मजबूत नजर आती है। आम लोगों की कौन कहे, बड़े नेता भी एक-दूसरे के इलाकों में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में बीती मई से शुरू हुई हिंसा और इसमें जान-माल के नुकसान की घटनाएं याद हैं? इस समय देश भले ही दुर्गा पूजा और नवरात्रि के उत्सव से बाहर आ चुका है और अब दिवाली व छठ पर्व की तैयारियां हैं। मणिपुर में रहने वाले लोगों को यह हिंसा उसी तरह याद है मानो कल की ही बात हो। उनकी आंखों में खौफ और आतंक की गहरी छाया अब भी देखी जा सकती है।

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दरअसल, अब लगता है सरकार, मीडिया और देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोगों ने भी इस छोटे-से खूबसूरत पर्वतीय राज्य के दुख-दर्द को भूलकर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया है। तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया में आपको या तो इजरायल और गाजा पट्टी की खबरें मिलेंगी या फिर दिवाली या अन्य दूसरे राज्यों की खबरें। 
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राज्य में मैतेई और कुकी समुदाय के बीच लंबे अरसे से जारी हिंसा में करीब दो सौ लोगों की मौत हो गई और 50 हजार से ज्यादा लोग बेघर होकर महीनों से राहत शिविरों में दिन काट रहे हैं। यह कहना ज्यादा सही होगा कि कुकी और मैतेई तबके के लोग अपने ही घर में बेघर हो गए हैं।

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हिंसा और हत्या के कई मामलों की जांच सीबीआई को सौंप दी गई है। वह अपनी गति से इनकी जांच कर रही है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी करीब डेढ़ दर्जन मामलों का संज्ञान लेकर केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है लेकिन मूल समस्या की ओर किसी का ध्यान नहीं है। राज्य में हालात पहले के मुकाबले कुछ बेहतर जरूर हैं। लेकिन कुकी और मैतेई तबके के बीच संदेह की खाई लगातार गहरी होती जा रही है।


अब भी राज्य में तस्वीर किसी युद्धक्षेत्र जैसी है। दोनों तबके के लोगों ने पुलिस और सुरक्षाबलों पर भरोसा करने की बजाय अपने इलाकों और लोगों की सुरक्षा का जिम्मा अपने कंधों पर ले लिया है।

 

मैतेई और कुकी बहुल इलाकों में विभाजन की दीवार बेहद मजबूत नजर आती है। आम लोगों की कौन कहे, बड़े नेता भी एक-दूसरे के इलाकों में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। बीती तीन मई को हिंसा की शुरुआत के बाद न तो मैतेई विधायक कुकी इलाकों में गए हैं और न ही कुकी विधायक राजधानी इंफाल, जो मैतेई-बहुल है, आने की हिम्मत कर पाए हैं। हिंसा शुरू होने के बाद मुख्यमंत्री ने कुछ दिन पहले ही पहली बार राजधानी फाल से कोई 80 किमी दूर उखरुल में मंत्रिमंडल की बैठक की लेकिन इस अहम बैठक में भी कुकी तबके के दो मंत्री, नेमचा किगपेन औऱ लेटपाओ हाओकिप गैरहाजिर रहे।

Manipur Violence Latest Issues Out Of News During Festive Season
केंद्र सरकार ने मणिपुर के कुकी बहुल पर्वतीय इलाकों में विवादास्पद अफस्पा कानून की मियाद छह महीने के लिए बढ़ा दी है। - फोटो : PTI

राज्य में इंटरनेट सेवाएं बंद हैं। इसके कारण राज्य में आम लोगों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की सरकार ने फिलहाल यह पाबंदी 21 अक्तूबर तक बढ़ा दी है। बीरेन सिंह ने भरोसा दिया है कि चार-पांच दिनों में यह पाबंदी हटा ली जाएगी लेकिन इंटरनेट से पाबंदी हटाने का सरकार का अनुभव अच्छा नहीं रहा है।

हालात सामान्य होते देख कर सरकार ने महीनों बाद बीते महीने इंटरनेट पर लगी पाबंदी हटा ली थी लेकिन उसके दो दिन बाद 25 सितंबर को ही 20 साल के एक युवक और 17 साल की एक युवती के शवों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। इंफाल के रहने वाले इन दोनों छात्रों को आखिरी बार छह जुलाई को एक साथ देखा गया था। इस वीडियो के सामने आते ही छात्र और युवक उबल पड़े और राज्य में नए सिरे से हिंसा भड़क गई थी।

हालात बिगड़ते देख कर केंद्र सरकार ने श्रीनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राकेश बलवाल को तुरंत मणिपुर भेज दिया। बलवाल का तबादला मणिपुर कैडर में कर दिया गया है। पुलवामा हमले की जांच उनके ही नेतृत्व में हुई थी।

केंद्र सरकार ने मणिपुर के कुकी बहुल पर्वतीय इलाकों में विवादास्पद अफस्पा कानून की मियाद छह महीने के लिए बढ़ा दी है। उसकी दलील है कि इसके नहीं होने से उग्रवादी विरोधी अभियान प्रभावित होगा। लेकिन सरकार के इस फैसले ने कुकी समेत तमाम आदिवासियों की नाराजगी की आग में घी डालने का काम किया है। आदिवासियों के संगठन जोमी काउंसिल ने सरकार के इस फैसले के प्रति कड़ा विरोध जताया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजे एक ज्ञापन में संगठन ने इसे एक पक्षपाती और भेदभावपूर्ण कदम बताया है।

राजनीतिक पर्यवेक्षक के. निपामाचा कहते हैं कि सरकार के पास शायद मौजूदा समस्या के समाधान की कोई ठोस नीति नहीं है। केंद्र सरकार को शायद इस समस्या पर काबू पाने का कोई ठोस उपाय नहीं सूझ रहा है या फिर शायद वह सोच रही है कि चुप्पी साधे रहने से यह समस्या खुद ब खुद हल हो जाएगी। मौजूदा हालात में मणिपुर में परिस्थिति सामान्य होने की उम्मीद कम ही है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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