नसबंदी को लेकर आखिर कब बदलेगी पुरुषों की मानसिकता?
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विश्व में जनसंख्या के स्तर पर भारत दूसरा बड़ा देश है। अगर जनसंख्या ऐसे ही बढ़ती रही तो आने वाले समय में भारत, चीन को भी पीछे छोड़कर नंबर वन की भूमिका में आ जाएगा। इसका कारण जनसंख्या विस्फोट और जनसंख्या को नियंत्रित करने वाला कोई पैमाना नहीं होना है। जनसंख्या का तेजी से बढ़ना भारत को सामाजिक, आर्थिक दोनों ही क्षेत्रों में पीछे कर रहा है। जनसंख्या के बढ़ते दबाव से हमारे सीमित प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से दोहन हो रहा है, बेरोजगारी का स्तर भी उसी तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ते जनसंख्या की वजह से सामाजिकता खत्म हो रही है और शहरों में एकल प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो यह जनसंख्या विस्फोट भारत के लिए हर दृष्टि से खतरनाक साबित होगा।
जनसंख्या के नियंत्रण के लिए सबसे जरूरी सामाजिक स्तर पर सोच में बदलाव लाना है। परिवारों में आज भी बच्चों के नियंत्रण का दबाव महिलाओं पर होता है। जबकि पुरुष अपने पुरुषार्थ के दंभ में इस पर विचार नहीं करते हैं। यदि विचार करते भी हैं तो नसबंदी के विकल्प को स्वीकार नहीं करते। क्योंकि नसबंदी उनकी समाज निर्मित मानसिक संरचना में पुरुषार्थ पर प्रश्न चिन्ह अंकित कर देती है। हालांकि विकल्प के तौर पर गर्भ निरोध गोलियां भी मौजद हैं लेकिन ये गोलियां किसी न किसी तौर पर महिलाओं के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। ये ही वजह है कि महिलाएं इन दवाओं की जगह नसबंधी के विकल्प को अपनाती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में 10 करोड़ से ज्यादा महिलाएं गर्भ निरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं। 1960 के दशक में गर्भनिरोधक गोलियों की शुरुआत के बाद से ही इसके इस्तेमाल से अलग-अलग तरह के साइड इफेक्ट्स देखने को मिले हैं। फैकल्टी ऑफ़ सेक्सुअल एंड रिप्रॉडक्टिव हेल्थकेयर के उप-निदेशक डॉ. सारा हार्डमैन कहती हैं कि गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल से प्रति दस हज़ार में से पांच से बारह महिलाओं में खून का थक्का जमने की शिकायत सामने आती है। और इनमें से कुछ महिलाओं की मौत होती है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि गर्भनिरोधक गोलियां महिलाओं के लिए असुरक्षित हैं।
2010-11 में भारत में 95.6 फीसदी महिलाओं ने नसबंदी को अपनाया। जबकि पुरुषों में यह दर काफी कम रही। यह विचारणीय है कि क्यों महिलाओं की अपेक्षा पुरुष नसबंदी से भागते हैं? यहां तक कि अस्थायी रूप से गर्भधारण को रोकने के लिए अपनी सेक्स लाइफ में कॉन्डोम तक का इस्तेमाल करने से परहेज करते हैं। जबकि यह दोनों ही साधन स्त्री और पुरुष दोनों के स्वास्थ्य और सुरक्षा का आधार है। इस संबंध में पुरुषों के समाज मनोविज्ञान को समझने की आवश्यकता है, यह भी समझने की जरूरत है कि परिवार और स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारियों से सजग, समाज का यह वर्ग नसबंदी के प्रति इतना आतंकित क्यों है?
इस सवाल के जवाब के लिए हमें वापस समाज की जड़ों की ओर देखना होगा। जिनसे समाज और उसकी मनोवृति की निर्मिती हुई है। समाज में पुरुषों की नसबंदी को सामाजिक प्रतिष्ठा, पुरुषार्थ, नामर्दगी (मर्दानगी कमज़ोर हो जाएगी) जैसे विचारों के साथ अमूमन देखा गया है। जहां महिलाओं में जनसंख्या और परिवार कल्याण नियोजन के प्रति जागरुकता में आशा कार्यकताओं और सही परामर्श दाताओं का महत्वपूर्ण योगदान है। वहीं पुरुषों के संदर्भ में सही परामर्श दाताओं का अभाव है।
पंचायत, जिलाधिकारी व अन्य कार्यकर्ता जिन्हें यह जिम्मेदारी सौपी भी जाती है, वह सभी अधिकांशत: समाज की उसी मानसिकता के पोषक होते हैं जिसमें उन्हें पुरुषार्थ की रक्षा का पाठ पढ़ाया जाता है। इस कारण वह पुरुष नसबंदी की खुशहाल परिवार में उपयोगिता के संदर्भ में सही से समझा पाने में अक्षम होते हैं। इसके विपरीत महिलाओं को समझाने, उनके और बच्चों के स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं को सुलझाने में महिलाएं स्वयं ही आगे आकर नसबंदी के विकल्प को अपनाती है। यह जानते हुए कि महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की नसबंदी की शल्य चिकित्सा अधिक सरल है।
ऊपर से महिलाओं की नसबंदी में घोर स्वास्थ्य लापरवाही अलग से देखने को मिलती हैं। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का मामला ही ले लीजिए यहां किस तरह नसबंदी के बाद महिलाओं को जमीन पर लिटाया गया। घटना के वीडियो के सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद प्रशासन चेता।
यह अच्छी बात है कि सरकारी स्तर पर पुरुषों में नसंबदी के खिलाफ जागरुकता के लिए 21 नवंबर से 4 दिसंबर तक पुरुष नसबंदी पखवाड़ा मनाया जा रहा है, क्योंकि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में नसबंदी को लेकर ज्यादा भ्रांतियां हैं। इन भ्रांतियों के लिए जरूरी है कि पुरुषों की उस सोच को बदला जाए जिसमें उन्हें लगता है कि नसबंदी के बाद शारीरिक कमजोरी आ जाती है। यौन क्षमता कमजोरी हो जाती है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। ऊपर से सही तथ्य तो यह है कि पुरुष नसबंदी की तुलना में महिला नसबंदी बेहद जटील है और इसके फेल होने की संभावना भी उतनी ही ज्यादा रहता है। इसके अलावा महिला नसबंदी की तुलना में पुरुष नसबंदी कम खर्चीली है।
हालांकि इस बीच भारतीय वैज्ञानिकों ने पुरुषों के लिए एक कॉन्ट्रासेप्टिव इंजेक्शन भी तैयार कर लिया है जिसके चलते अब पुरुषों को नसबंदी की जरूरत नहीं होगी। इस इंजेक्शन का क्लिनिकल ट्रायल भी हो चुका है। यह इंजेक्शन तेरह सालों तक प्रभावी रहेगा।
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