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फिर नई सियासी मुश्किल में श्रीलंका? अलर्ट ना हुई मोदी सरकार तो बढ़ेंगी मुसीबतें

Thu, 20 Dec 2018 07:40 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Thu, 20 Dec 2018 07:40 PM IST
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mahinda rajapaksa sri lanka main opposition leader sri lanka and india relations pm modi
महिंद्रा राजपक्षे प्रधानमंत्री न बन सके तो संसद में प्रतिपक्ष के नेता पद पर नियुक्त कर दिए गए। - फोटो : Social Media

अंत भला तो सब भला। दशकों से यह कहावत सुन रहे हैं। लेकिन कभी कभी भला अंत भी डराता है। श्रीलंका के लिए अभी सब कुछ ठीक नहीं है। इसका अर्थ भारत अभी राहत की सांस नहीं ले सकता। रानिल विक्रमसिंघे एक बार फिर प्रधानमंत्री हैं। बहुमत उनके साथ था। उन्हें राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने उस अधिकार के तहत हटाया था, जो उनके पास था ही नहीं। अब एक बार फिर कुछ कुछ ऐसा ही हुआ है।

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महिंद्रा राजपक्षे प्रधानमंत्री न बन सके तो संसद में प्रतिपक्ष के नेता पद पर नियुक्त कर दिए गए। एक बार फिर असंसदीय निर्णय। स्पीकर कारू जयसूर्या ने उनकी नियुक्ति का ऐलान किया। जयसूर्या अब तक खुलकर राजपक्षे का विरोध करते रहे हैं और उनकी राय में  रानिल विक्रम सिंघे को हटाना ग़लत था। लेकिन अब उन्होंने राजपक्षे को विपक्ष का नेता बनाकर अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। 
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भारत को ऐसे लगा झटका 
दरअसल, 2015 से संसद में प्रतिपक्ष के नेता तमिलों के वरिष्ठ नेता आर संपंथन थे। वे भारत के  सहानुभूति रखते थे और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे से भी उनके मधुर रिश्ते थे। रानिल को भी भारत के भरोसे वाला माना जाता है, इसलिए यह जोड़ी तालमेल से काम कर रही थी। यही नहीं शुरुआत में तो राष्ट्रपति सिरिसेना भी भारत समर्थक माने जाते थे, लेकिन जैसे ही तमिलों के घोर विरोधी महिंद्रा राजपक्षे को रानिल विक्रमसिंघे को बर्ख़ास्त कर नया प्रधानमंत्री बनाया तो संदेह के घेरे में आ गए। वे राजपक्षे के दबाव में आ गए थे और राजपक्षे चीन के हाथों में खेल रहे हैं। जब सिरिसेना राजपक्षे को प्रधानमंत्री न बना सके तो स्पीकर को राजपक्षे के समर्थन में सिफ़ारिशी चिट्ठी लिखी और उन्हें विपक्ष का नेता बना दिया गया। पहेली है कि स्पीकर क्या दबाव में हैं अथवा देश में राजनीतिक स्थिरता के लिए उन्होंने संतुलन की नीति अख़्तियार की है। जो भी हो एक बार फिर भारत और तमिलों के लिए झटका है। 

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महिंदा राजपक्षे- रानिल विक्रमसिंघे - फोटो : File Photo

श्रीलंका में भी उठ रहे हैं सवाल 
स्पीकर के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ तमिल नेशनल एलाइंस और श्रीलंका मुस्लिम कांग्रेस ने आपत्ति दर्ज़ कराई है। स्पीकर इस पर शुक्रवार को निर्णय लेंगे। दोनों पार्टियों का आरोप है कि महिंद्रा राजपक्षे 2015 के चुनाव में यूनाइटेड पीपल्स फ्रीडम एलाइंस की ओर से संसद के लिए चुनाव जीते थे। इसके बाद इसे छोड़कर नई पार्टी श्रीलंका पीपुल्स पार्टी की सदस्यता ले ली। उसके सदस्य रहते वे विपक्ष का नेता कैसे बन सकते हैं।

दिखने में यह भी असंसदीय फ़ैसला लगता है। सिरिसेना का हालिया रवैया हैरत में डालने वाला है। उन्होंने रानिल विक्रमसिंघे की ओर से भेजी गई 36 मंत्रियों की सूची में से 8 नाम काट दिए।  अब रानिल विक्रमसिंघे केवल 28 मंत्रियों को शपथ दिलाने जा रहे हैं। यह सिद्ध करता है कि दोनों खेमों ने तलवारें म्यान में नहीं रखीं हैं। 

भारत और चीन के लिए सबक 
इस घटनाक्रम का सबक़ भारत और चीन के लिए है। मालदीव में चीन ने लोकतान्त्रिक ढांचे में दखल दिया। उसमें भी मुंह की खानी पड़ी। अब श्रीलंका में भी उसे बड़ा झटका लगा है। इसके बाद भी उसकी चालबाज़ी थम नहीं रही है। आर्थिक विस्तार की जल्दबाज़ी में चीन जिस तरह खिलवाड़ कर रहा है, उसे छोटे देश समझने लगे हैं। वे चीन से दूर रहना चाहते हैं और भारत से भरोसेमंद रिश्ते चाहते हैं। अफ़सोस कि भारतीय विदेश नीति को इन दिनों  लकवा लग चुका है। पास पड़ोस के घटनाक्रम से कोई पाठ सीखने की चाहत भारत के भीतर नहीं दिखाई दे रही है।

वर्तमान प्रधानमंत्री बार-बार चीन जा रहे हैं और अनौपचारिक चर्चाएं कर रहे हैं, लेकिन चीन के रवैए में कोई सुधार नहीं है। यह संकेत है कि भारत के साथ चीन के संबंध बीते बरसों में बहुत आगे नहीं बढे़ हैं। भारत को अभी भी सिरिसेना-राजपक्षे गठजोड़ पर बारीक़ नज़र रखनी होगी। उसे समझना होगा कि पाकिस्तान और चीन भारत विरोध को आधार बनाकर एशिया महाद्वीप की राजनीति को अस्थिर करने का कुचक्र रच रहे हैं। इसके दूरगामी परिणाम ख़तरनाक़ हो सकते हैं।  



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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