महात्मा गांधी 150वीं जयंतीः पीएम मोदी की इस चुनौती से कैसे निपटेगी कांग्रेस?
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जिस कांग्रेस को मोहनदास गांधी ने पल्लवित औऱ पुष्पित किया, लगता है वह 134 साल में हारने के बाद थक भी गई है। एक हताश पार्टी उस गांधी की साधना में लगी है जो पिछले कई दशकों से सैंकड़ों लोगों के लिए सत्ता की पारस पथरिया है जो स्पर्श होते ही किसी भी आम आदमी को सत्ता के गलियारों में गुलामनबी, सलमान खुर्शीद, प्रतिभा पाटिल औऱ मनमोहन सिंह बना सकता है। लेकिन बदले हुए वक्त में पारस खुद केवल पत्थर सा बनकर रह गया। नई पीढ़ी के गांधी ने अपनी कृपा को कछुए की तरह समेट रखा है फिलहाल।
कांग्रेस और गांधी के बीच दूरियां
दशकों तक कृपापात्र रहे सत्ता से हरियाए एलीट (अभिजन) दुबलाये जा रहे हैं क्योंकि नेहरु गांधी मतलब लुटियन्स का इंद्रलोक सरीखा वैभव, और बिन गांधी मोदी की निर्मम दुनिया, लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस में गांधी युग फिर से स्थापित होना चाहिए?
क्या वास्तव में गांधी से कोई वैचारिक सरोकार इस पार्टी के बचे हैं? बहुत गहरे में मत जाइए। गांधी का कांग्रेस से रिश्ता आजादी के बाद कभी रहा ही नहीं है। इंदिरा गांधी के आते-आते यह रिश्ता हिन्द महासागर में समाधि ले गया। आज जिस अस्तित्व के संकट का सामना 134 साल पुरानी पार्टी को करना पड़ रहा है उसकी बुनियाद भी गांधी ही हैं, लेकिन यह नेहरू गांधी नहीं महात्मा गांधी हैं। मोहनदास करमचंद गांधी।
मुद्दा यह है कि कांग्रेस की वीथिकाओं में लोग आजादी के बाद किस गांधी को अपने नजदीक महसूस करते हैं? स्वाभविक ही है नेहरु- गांधी को। दोनों में बड़ा बुनियादी फ़र्क है। एक सत्ता के जरिये सुशासन औऱ लोककल्याण की बात करता है दूसरा धर्मसत्ता की,भारतीय सनातन मूल्यों की वकालत करता है।एक आत्मा की बात करता है दूसरा शरीर की।
जाहिर ही है आत्मा की अनुभूति दुरुह ही होगी इसलिए पोरबंदर के गांधी का बोरिया बिस्तर तो 24 अकबर रोड से बंधना ही था। लेकिन हमें यह भी पता है शरीर की सीमा है। आज 134 साल बाद यह दम तोड़ रहा है। वैचारिकी के बिना कोई संस्थान आखिरी कब तक टिक पाता है। विचार भी खोखले औऱ सिर्फ हवाई आदर्श होंगे तो वही हाल होता है जो वाम विचार का पूरी दुनिया मे हुआ। कभी भी कहीं भी लाल क्रांति स्थाई नहीं हुई।
कहीं भी सत्ता सिर्फ बंदूक की नाल से निकली। कहीं निकली भी तो स्थाई नही हो सकी, क्योंकि कम्युनिज्म जमीन पर टिकाऊ नहीं है न ही मानवीय इतिहास से उसका कोई सरोकार।लेकिन यह हकीकत है कि गांधी यानी मोहनदास करमचंद गांधी की वैचारिकी न तो खोखली थी न हवाई आदर्श का मुजायरा, क्योंकि गांधी तो भारत के विचारों को ही आगे बढ़ा रहे थे जो इसी धरती से निकले हैं हजारों साल पहले।
कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद इसे कभी पकड़ा ही नहीं क्योंकि गांधी सत्ता की नहीं सत्य के अधिष्ठाता थे और वे रोम-रोम से भारतीयता के हामी थे। आजादी के बाद कांग्रेस ने सत्ता के माध्यम से जिस भारत की परिकल्पना को जमीनी आकार देना आरम्भ किया वह गांधी से ठीक उलट था।
गांधी-बीजेपी और पीएम मोदी
दरअसल, इस गांधी विरोधी सत्ता प्रतिष्ठान में 60 साल तक चार चांद लगे, लेकिन इस भवन की आयु पूरी हुई तो अब इसका कोई पैबंद समझ नहीं आ रहा किसी को। त्रासदी यही नहीं है। कांग्रेस की मूल समस्या तो गांधी विहीन हो जाने की है क्योंकि सामने नरेंद्र मोदी खड़े हैं दलबल के साथ कांग्रेस को गांधी मुक्त करने के लिए। अपने सांसदों के साथ बैठक कर प्रधानमंत्री मोदी ने सभी को निर्देशित किया है कि महात्मा गांधी की 150वीं जन्म जयंती पर 150 किलोमीटर पैदल यात्रा अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में करें।
यह पैदल यात्रा 2 अक्टूबर गांधी जयंती से 31 अक्टूबर पटेल जयंती तक चलेगी। इस पैदल यात्रा के मायने कोई छोटे-मोटे नहीं है। मोदी प्रतीकों की सियासत केअदभुत मास्टर हैं। वे पटेल को पहले ही गुजराती अस्मिता के साथ सयुंक्त कर खुद को पटेल का वारिस औऱ कांग्रेस को विरोधी के रूप में स्थापित कर चुके हैं।
इतिहास के सन्दर्भो के सहारे मोदी ने सरदार पटेल को लेकर यह धारणा तो बना ही दी कि नेहरु ने कभी पटेल को वास्तविक सम्मान नहीं मिलने दिया। नेहरु गांधी खानदान से उपजी व्यक्ति पूजा के चलते किसी कांग्रेसी में यह साहस कहां था कि वह सरदार साहब की वकालत कर पाता?
आज सरदार पटेल कांग्रेस से अलग हैं। अब बारी मोहनदास करमचंद गांधी की है। क्या अजब संयोग है कि सरदार पटेल की तरह गांधी भी उसी गुजरात की धरती से आते हैं जहां से मोदी और अमित शाह।इसमें किसी को शक नहीं मोदी न केवल भारत बल्कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ समकालीन कम्युनिकेटर हैं।
जाहिर है आज कांग्रेस का संकट वाकई बहुत बड़ा है। बीजेपी के सभी सांसद,विधायक 2 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक गांधीवाद का झंडा लेकर गांव-गांव घूम रहे होंगे, तब 134 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी अपने अंतर्विरोधों में घिरी उस नये गांधी की दण्ड प्रार्थना में बदहवास सी होगी जो खुद ही गांधी को नहीं जानता है।
नये जमाने का भारत सिर्फ इसलिए गांधी के नाम पर कांग्रेस और 10 जनपथ के पीछे नहीं खड़ा हो सकता कि साल में दो बार इस परिवार के लोग राजघाट पर जाकर गुलाब की पंखुड़िया चढ़ाते हैं या कांग्रेस अधिवेशनो में गांधी की तस्वीर टंगी हुई रहती है।
150 साल बाद भी गांधी भारत की अवचेतना में सबसे गहरे समाए हुए विचार की तरह हैं। प्रधानमंत्री मोदी इसे बहुत अच्छी तरह समझते हैं। वे यह भी जानते हैं कि मौजूदा कांग्रेस से मोहनदास करमचंद गांधी को अलग करना कितना आसान है क्योंकि गुजराती गांधी तो सत्ता दिला नहीं सकता है इसलिए कांग्रेस के लिए तो आनन्द भवन के गांधी ही गांधी हैं।
गांधी से दूर होती कांग्रेस जमीन से भी हो रही गायब
आज किसी कांग्रेसी में इतना आत्मबल नहीं है कि वह खड़ा होकर बगैर 10-जनपथ के कांग्रेस की वकालत कर सके। सच्चाई तो यह है कि भले ही कांग्रेस कार्यसमिति नया अध्यक्ष चुन भी ले पर यह भी तथ्य है कि गैर गांधी कभी 10 जनपथ से आगे नहीं जा पाएगा औऱ यही कांग्रेस की असली समस्या है। जब कभी कांग्रेस के मौजूदा थिंक टैंक पर विचार किया जाता है तो ऐसा लगता है कि इससे दरिद्र धनी कोई नहीं है। एक से बढ़कर एक विद्वान,मनीषी सरीखे व्यक्तित्व जिस पार्टी की पूंजी रहे हों आज वह भारत के न केवल राजनीतिक परिदृश्य बल्कि सामाजिक जीवन से भी गायब हो गई। उसका सामाजिक रिश्ता कहां है?
सिर्फ चुनाव में कांग्रेस के टिकट औऱ चॉपर से प्रचार यानी एक चुनावी प्लेटफॉर्म से अलग क्या रिश्ता भारत के लोकजीवन से मौजूदा कांग्रेस पार्टी का बचा है? आप सवाल उठा सकते हैं कि राजनीतिक दल के लिए सामाजिकी से पहले राजनीति जरूरी है। यह भी सच है लेकिन इस दौरान हम उस बुनियादी औऱ पीढ़ीगत अंतर को अनदेखा कर देते हैं जो मोहनदास करमचंद गांधी की वैचारिकी से जुड़ी है।
इसे एक उदाहरण से समझिए कि विदिशा मप्र के नामी वकील रहे तखतमल जैन ने मध्यभारत राज्य के मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव पहली बार मे इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि उनकी प्रैक्टिस सीएम बनने से प्रभावित होती। हालांकि जैन बाद में सीएम बने क्योंकि वे कांग्रेस के निष्ठावान गांधीवादी थे। मप्र में डीपी मिश्र जैसे अध्यवसायी औऱ विजनरी सीएम भी रहे हैं जो कृषणायनी जैसी कृति के रचनाकार भी हैं।
समझा जा सकता है कि गांधीवाद की जमीन पर खड़े उस दौर के कांग्रेसी सामाजिक,सांस्कृतिक, साहित्यिक औऱ भारतीय चेतना के प्रतिनिधि थे यही कांग्रेस की ताकत थी। लेक़िन आज की कांग्रेस गांधी विमुख कांग्रेस है जो जड़ता,व्यक्तिपूजा,खुशामदी, औऱ सुविधा के व्याकरण से सत्ता का खोखला ग्रन्थ ही बनाना जानती है।
कांग्रेस की किसी लायब्रेरी में आज गांधी नहीं है इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत के दो कदम आगे गांधी मुक्त कांग्रेस का भी अस्त्र चल दिया है। इस अचूक अस्त्र की मार क्या झेल पाएगी?10 जनपथ औऱ उनकी मंडली।
पुनश्च:जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपना कार्यकाल पूरा कर व्हाइट हाउस से जा रहे थे तब एक पत्रकार ने उनसे सवाल किया "मिस्टर प्रेसिडेंट आपकी ऐसी कौन सी हसरत थी जो आठ साल पद पर रहते हुए पूरी नहीं हुई और जिसका आपको मलाल है?" बराक ओबामा ने जवाब में कहा- मेरी हसरत थी काश महात्मा गांधी के साथ व्हाइट हाउस में मैं डिनर कर पाता।"
कांग्रेस और उसके मौजूदा गांधी काश महात्मा को पकड़ पाते। लेकिन फिलहाल भारत के युवा, मोदी के बताए बापू को जानने समझने के लिए तैयार हैं। आप उलझे रहिये अपने नाम के गांधी में क्योंकि भारत का युवा अब परंपरागत् जकड़नों से आजाद है और वह अपनी पहचान और हिन्दू अस्मिता पर गर्व करता है। वह निर्द्वन्द होकर निर्णय करता है। जैसा 2104 औऱ फिर 2019 में आप देख चुके हैं। उसे संघ से निकले अपने प्रधानमंत्री में अपनी मां, माटी,मानुष का अक्स दिखता है। उसे चौकीदार चोर नहीं प्योर दिखता है। संसदीय राजनीति इसी परसेप्शन पर चलती है।
(लेखक राजनीति विज्ञान के फैलो हैं और संसदीय राजनीति के जानकार हैं। )
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