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महाकुम्भ 2025 : भव्यता के साथ स्नान, ध्यान और दान की मूल भावना बनी रहे

Mon, 30 Dec 2024 02:56 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 30 Dec 2024 02:56 PM IST
सार

महाकुम्भ मेला क्षेत्र इन दिनों दूधिया रोशनी में नहाया हुआ है। विशाल पंडाल, टेंट सिटी, अखाड़ों और संस्थाओं के साथ कल्पवासियों की तंबू नगरी आकार ले चुकी है। हर ओर भव्यता दिखाने की कोशिशें हो रही हैं।

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mahakumbh 2025 Preparations in full swing in prayagraj in hindi
महाकुंभ 2025 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक प्रयागराज में महाकुंभ मेले का आयोजन होने जा रहा है। केंद्र की नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार महाकुंभ मेले को दिव्य और भव्य बनाने के प्रयासों में दिन-रात जुटी है। महाकुंभ मेला क्षेत्र इनदिनों दूधिया रोशनी में नहाया हुआ है। विशाल पंडाल, टेंट सिटी, अखाड़ों और संस्थाओं के साथ कल्पवासियों की तंबू नगरी आकार ले चुकी है। हर ओर भव्यता दिखाने की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन क्या कुंभ भव्यता का पर्व है?

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इस विषय पर भिन्न मत हैं, क्योंकि कुंभ की परंपरा स्नान, ध्यान और दान के मेले के रूप में है। यह विश्व कल्याण के लिए वैचारिक मंथन का महापर्व है। ऐसा महापर्व, जिसमें बिना निमंत्रण के करोड़ों लोग पावन गंगा, यमुना और त्रिवेणी संगम में स्नान के लिए आते हैं। प्रश्न यह है कि क्या घोर बाजारवाद के इस दौर में कुंभ मेला अपनी मूल भावना से दूर हो गया है?  

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12 वर्ष में होता है कुंभ का आयोजन

प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में प्रत्येक 12-12 वर्ष में कुंभ का आयोजन होता है। हरिद्वार और प्रयागराज में प्रत्येक 6-6 वर्ष में अर्द्धकुंभ भी लगता है। हालांकि, कुंभ स्नान पर्व की परंपरा कब प्रारंभ हुई? इसका कोई निश्चित प्रमाण कहीं उपलब्ध नहीं है।

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वेदों में अवश्य कई स्थानों पर कुंभ शब्द का प्रयोग हुआ है। जल प्रवाह से उसका संबंध भी है। एक जगह कुंभ शब्द चार की संख्या भी निर्दिष्ट है, लेकिन न तो उसका संबंध अमृत मंथन की कथा से जुड़ पाता है, न ही हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक के चारों कुंभ पर्वों से कोई संगति बन पाती है। हां, पुराणों में कुंभ स्नान का सविस्तार उल्लेख है। स्पष्ट है कि कुंभ स्नान पर्व की परंपरा पुराणों की रचना के पूर्व से प्रचलित है। पुराणों का संकलन गुप्तकाल (320-510 ईस्वी) के मध्य माना जाता है। 

स्कंदपुराण के अनुसार जब बृहस्पति मेष राशि पर स्थित हो, सूर्य एवं चंद्र मकर राशि पर स्थित हों, माघ अमावस्या का दिन हो, तब इस विशिष्ट ग्रहयोग में प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर कुंभ स्नान पर्व का ग्रहयोग बनता है। कुंभ में तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं को दो मुख्य लाभ होते हैं, एक, संगम स्नान और दूसरा, संत-समागम। हमारे यहां देवी-देवताओं के दर्शन व पूजन के पूर्व स्नान की परंपरा रही है।

ग्रह-नक्षत्रों के योग के अनुसार जलस्रोतों में पवित्र स्नान की परंपरा विशेष रूप से है। स्नान पर्वों में कुंभ स्नान का महत्व सर्वोपरि है। साथ ही, कुंभ दर्शन प्रकारांतर से आत्म दर्शन का पर्याय बन गया है। जैसा, लेखक जगदीश गुप्त ने अपनी पुस्तक 'कुंभ-दर्शन' में लिखा है, 'देश-दुनिया के अन्य मेलों की तरह कुंभ मेले में मीना बाजार, घोड़ा बाजार, चिड़िया बाजार और काठ बाजार नहीं लगते और न संगीत-नृत्य के लिए वारांगनाएं सुलभ होती हैं। लीलाओं का प्रदर्शन अवश्य होता है।

रामकथा या भागवत कथा का ललित रूप भी सुनने में आता है। कुंभ मेले की प्रकृति दूसरे मेलों से भिन्न है। बाजारवाद के बावजूद कुंभ मेले की मूल भावना अभी तक जाग्रत है। यदि ऐसा न होता तो करोड़ों लोग कठिन परिस्थितियों के बावजूद बिना निमंत्रण एकत्र न होते।'

हालांकि, कुंभ को महान स्नान पर्व और विराट धार्मिक मेले के रूप में प्रसिद्धि दिलाने का श्रेय आदि शंकराचार्य (780-820 ईस्वी) को दिया जाता है। आदि शंकराचार्य ने ही धार्मिक वाद-विवाद और संवाद के लिए साधु-संन्यासियों को नियत समय पर एकत्र करके सनातन धर्म को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया था। धार्मिक चर्चा-परिचर्चा के लिए कुंभ उपयोगी सिद्ध हुआ है।

कुंभ के दौरान साधु-संन्यासी धर्म संसद में विमर्श के बाद समाज को नई दिशा देने का काम करते आए हैं। कुंभ मेला तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं को जहां स्नान-ध्यान और दान का मौका देता है, वहीं साधु-संन्यासियों के विचार रूपी अमृत के पान का अवसर भी मिलता है। हिंदू चेतना के प्रचार और प्रसार में कुंभ का योगदान अतुलनीय है। 

भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन

वर्ष 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रयास रहा है कि दुनिया को भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति से परिचित कराया जाए। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर हो या अयोध्या में भगवान राम का मंदिर या उज्जैन में महाकाल कॉरिडोर या देशभर में विकसित किए जा रहे अन्य धार्मिक स्थल व धाम, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अर्थशास्त्र को साथ लेकर चल रहे हैं।

यह सही है कि धार्मिक पर्यटन से देश में लाखों लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है, लेकिन सनातन धर्म में वैभवता से अधिक त्याग को महत्व दिया गया है। इसके उल्ट महाकुंभ प्रयागराज को भव्य दिखाने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। टेंट सिटी से लेकर डोम सिटी तक बनाई जा रही हैं, जिनमें फाइव स्टार होटल जैसी सुविधाओं मुहैया कराने के दावे हो रहे हैं। इनका किराया लाखों रुपए में है।

निश्चित ही सरकार प्रयागराज में महाकुंभ मेले को दिव्य के साथ भव्य भी बनाए, लेकिन कुंभ की मूल भावना स्नान, ध्यान और त्याग को साथ लेकर चला जाए। यह दायित्व सरकार के साथ साधु-संन्यासियों और समाज का भी है।




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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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