बांछड़ा समाजः एक कुप्रथा नहीं, खुलेआम होता हुआ सामाजिक अपराध
बांछड़ा बच्चियों को बचाना आसान काम नहीं है। पॉक्सो जैसा कड़ा कानून आ गया है लेकिन वह पूरी तरह लागू नहीं होता। कुछ ही ग्राहक हैं जो पुलिस के छापे में पकड़ में आते हैं उनपर पॉक्सो लगता है।
विस्तार
कभी-कभी समाज की सबसे भयानक क्रूरताएं खुलेआम होती हें। वे ना तो आम लोगों से छिपी होती हैं, ना ही अनजानी लेकिन हम उन्हें परंपरा, संस्कार, परिवार की मर्यादा की ओट में छिपाने का कुत्सिक प्रयास करते हैं। बांछड़ा समाज में वेश्यावृत्ति की परंपरा ऐसी ही कुप्रथा ही नहीं संगठित अपराध है। जिसके तहत पीढ़ियों से मासूम लड़कियों को देह व्यापार के अंधे कुएं में धकेला जा रहा है- जहां ना ही बचपन की मासूमियत है, ना शिक्षा ना स्वतंत्रता और ना ही इंसानियत।
क्या किसी परंपरा को चुपचाप इसलिए स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि वह वर्षों या सदियों से चली आ रही है। अगर परंपरा के तहत किसी 13-14 साल की मासूम बच्ची को कमाने की मशीन बनाकर देह बाजार में खड़ा कर दिया जाए तो ये परंपरा नहीं पैशाचिक संस्कृति है, जिसे नष्ट-भ्रष्ट हो ही जाना चाहिए। बांछड़ा समाज में आज भी कई गांवों में लड़कियों को महज इसलिए मिडिल स्कूल से आगे की शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है क्योंकि उनकी कमाने की उम्र गई है औऱ यह कृत्य उनके अपने ही करते हैं।
अक्सर वे अपनी लड़कियों का लालन-पालन ही इस तरह करते हैं कि वे इस कुत्सिक परंपरा का विरोध ना कर पाएं, कुछ कुछ ग्रूमिंग गर्ल्स गैंग की तरह। जहां उन्हें जन्म के बाद से ही यह समझाया जाता है कि उन्हें उनकी परंपरा का पालन करना है। परंपरा से जुड़ी हुई पुरानी कहानियां सुनाकर बच्चियों को बरगलाया जाता है। परंतु अब जब संचार के साधन बढ़ गए हैं, शिक्षा ने इन गांवों में भी दस्तक दे दी है, बच्चियां इस गलत परंपरा का विरोध करने के लिए उठ खड़ी हुई हैं।
बांछड़ा बच्चियों को जिस्मफरोशी के दलदल से निकाल समाज की मुख्यधारा में लाने का काम करने वाली उड़ान संस्था की संगीता कुंभाकर बताती हैं कि बांछड़ा समाज का ताना-बाना इतना जटिल है कि बच्चियों को इस दलदल से निकालना आसान नहीं होता। यहां के रीति-रिवाज हमारे समाजिक व्यवहार से बेहद अलग हैं।
इनकी पंचायत भी अलग होती है....जहां ये अपने रीति रिवाजों या कहूं कुरीतियों को बचाने का काम करते हैं। हमारी संस्था बच्चियों को ना सिर्फ देहव्यापार के दलदल से बाहर निकालती है बल्कि उन्हें इस दलदल में फंसने से भी रोकती है। हम इन बच्चियों में सेल्फ अवेयरनेस के साथ-साथ सेल्फ डिपेंड होने की स्किल भी सिखाते हैं।
हाल ही में घटे एक केस का जिक्र करते हुए संगीता जी बताती हैं, मंदसौर में एक बच्ची हमारे संपर्क में आई थी। वो आगे पढ़ना चाहती थी। घरवाले आठवीं के बाद उसे काम पर उतारना चाहते थे। उसकी मां औऱ बड़ी बहन दोनों ही देहव्यापार के दलदल में फंस चुकी थी। यह लड़की पढ़ना और आगे बढ़ना चाहती थी। लड़की की मां औऱ बहन उसे इमोशनल ब्लैकमेल कर रहे थे।
बहन का कहना था कि जब उसे इंकार नहीं तो यह कैसे मना कर सकती हैं। हमने उनके परिजनों को समझाने का दायित्व अपने हाथ में लिया। फिर साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपोयग किया। उन्हें पॉक्सो एक्ट से डराया साथ ही यह भी समझाया कि उनकी बच्ची के लिए क्या सही होगा। धीरे-धीरे घर के लोग तैयार हुए। आज वह लड़की पढ़ाई के साथ-साथ प्राइवेट जॉब भी कर रही है। उसका सपना एलएलबी करके वकील बनने का है।
संगीता जी आगे बताती हैं कि नई बच्चियां इस दलदल में फंसना नहीं चाहती लेकिन समाज और परिवार इन्हें बाहर निकलने नहीं देता। इसी तरह का एक ओर केस हमारे पास आया था। लड़की ने धंधे पर बैठने से साफ इंकार कर दिया। यह लड़की बेहद बहादुर थी। हमने उसे ब्यूटीपार्लर का कोर्स करवाया।
कोविड के समय जब देह व्यापार भी बंद था, इस लड़की ने अपने ही गांव में ब्यूटीपार्लर चलाकर परिजनों का पेटपाला। उसके बाद गांव, समाज और परिवार में लड़की की इज्जत बढ़ी। परिजनों ने लड़की की शादी तय कर दी। यहां बाछंड़ा परिवार में लड़के वाले दहेज देते हैं। लड़के वालों ने लड़की के परिजनों को आठ लाख रूपए दिए। शादी के कुछ दिन बाद ही लड़की को समझ में आ गया कि लड़का बहुत शराब पीता है, मारता-पीटता है। वह तंग आकर मायके आ गई।
इसके बाद ससुराल के लोगों ने पंचायत बैठा ली। शादी तोड़ने पर लड़की के परिवार को तीन गुना रकम चुकानी होती है। परिवार की यह हैसियत नहीं थी तो उन्होंने लड़की को फिर से ससुराल भेजना तय किया। वहां ससुराल के लोग इसे घर ना ले जाकर जंगल ले गए। यहां मैं एक और अमानवीय प्रथा बता रही हूं। यदि परिजनों को लगे कि लड़की झूठ बोल रही है तो वे खौलते पानी से लड़की को सिक्का उठाने को कहते हैं। यदि हाथ में फफोले ना आएं तो ही लड़की को निर्दोष माना जाता है।
इस लड़की के ससुराल के लोगों ने आरोप लगाया था कि वो मायके में धंधा कर रही थी। आरोप का कारण साफ था, ससुराल वाले भी उसे इस दलदल में फंसाना चाहते थे। यहां लड़की को पता था, इतने खौलते पानी में हाथ डालेगी तो फफोले आएंगे ही। उसने उड़ान संस्था औऱ पुलिस से संपर्क किया। पुलिस तुरंत एक्शन में आई और लड़की बच गई।
संगीता जी कहती हैं, बांछड़ा बच्चियों को बचाना आसान काम नहीं है। पॉक्सो जैसा कड़ा कानून आ गया है लेकिन वह पूरी तरह लागू नहीं होता। कुछ ही ग्राहक हैं जो पुलिस के छापे में पकड़ में आते हैं उनपर पॉक्सो लगता है। यदि इन बच्चियों को इस गंदगी में धकेलने वाले हर परिजन और ग्राहक पर पॉक्सो लगे तो हालात कुछ और ही होंगे।
इसी तरह बच्चों के सुधार की दिशा में काम करने वाले एक नाम ना बताने की शर्त पर बांछड़ा युवक ने बताया, स्थितियां जैसी दिखती हैं, उतनी सरल नहीं है। यह परंपरा नसों में समाई है। लोगों को आसान पैसे की लत लग चुकी है, इस लत को छुड़ाने के लिए हम लगातार प्रयासरत हैं लेकिन समाज के हर एक व्यक्ति को समझना होगा। उसके लिए बड़े स्तर पर सरकारी मदद और पॉक्सो एक्ट में कार्यवाही की जरूरत है।
कड़े कानून बने हैं। POCSO Act (2012), ITPA, Juvenile Justice Act, सबकी धाराएं इन बच्चियों के हक में हैं, मगर जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदलता। क्यों? क्योंकि प्रशासन की आंखों में पट्टी बंधी है और व्यवस्था के हाथ बंधे हैं — जातीय राजनीति, चुनावी लाभ, और पुलिस की मिलीभगत ने इस लड़ाई को और कठिन बना दिया है।
अतंतः यह सवाल सिर्फ बांछड़ा समाज से नहीं है। यह सवाल आपसे, हमसे, पूरे देश से है। कितनी और बच्चियों की अस्मिता नीलाम होगी? कब तक 'परंपरा' के नाम पर देह को बिकने दिया जाएगा? कब तक विकास की बातें सिर्फ शहरों में होंगी और गांवों की बच्चियां नर्क में धकेली जाती रहेंगी?
अब वक्त है — इस 'परंपरा' को तोड़ने का, समाज की आंखों में आंखें डालकर बोलने का, और यह कहने का कि "जिस परंपरा की नींव शोषण पर हो, वह परंपरा नहीं – पाप है!"
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